Loading...
You are here:  Home  >  मीडिया  >  Current Article

आखिर न्यूज चैनल्स कब देश के प्रति कुछ जिम्मेदारी समझेंगे?

By   /  August 1, 2012  /  1 Comment

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

देश के सात राज्य ‘नार्थन ग्रिड’ के फेल हो जाने के कारण बिजली गुल हो जाने से अंधेरे में डूब गये, सरकार भी ‘अंधेरे’ में हैं। देश का मीडिया इन दोनो अंधेरे से जनता को उजाले में लाने का कुछ कार्य कर सकता था। वह भी राष्ट्र के प्रति अपने दायित्व निभाने में असफल होकर अंधकार को और अंधेरे की ओर बढ़ाने में सहायक सिद्ध हो रहा है। जब न्यूज चैनल्स यह समाचार देते है कि ट्रेनों के एसी कोच में बिजली न होने के कारण यात्रियों का दम घुटे जा रहा है (सामान्य कोच के यात्रियों का खयाल नहीं आया?)। सरकार कुछ नहीं कर रही है। क्या सरकार को इस घटना के होने की पूर्व कल्पना थी? क्या न्यूज चैनल्स आरोप प्रत्यारोप के बजाय जनता को इस अचानक हुई बिजली गुल होने की दुर्घटना से निपटने के लिए कुछ सकारात्मक सुझाव नहीं दे सकते है? यह सही है कि सरकार के पास हर स्थिति से निपटने के लिए एक आपात योजना अवश्य होनी चाहिए। इसकी चर्चा न्यूज चैनल्स बाद में भी कर सकते है। लेकिन तुरंत तो उनका दायित्व है कि आशंका के बादलों को हटाकर स्थिति का सामना करने के लिये सकारात्मक जानकारी व सुझाव दें। आजकल न्यूज चैनल्स न्यूज परोसने का कार्य नहीं करते है, बल्कि उनका ब्रेकिंग न्यूज पर ज्यादा ध्यान रहता है। न्यूज जितनी ज्यादा ‘ब्रेक’ होगी उतना ही ज्यादा उनका न्यूज चैनल ‘तेज‘ ‘फास्ट’ कहलाएगा और उनकी टीआरपी भी उतनी ही बढ़ेगी, ऐसा न्यूज चैनलों का मानना होता है। टीआरपी की भी एक अलग कहानी है जिसका आधार भी वैज्ञानिक न होकर जन सामान्य को न समझने वाला आधार है जिसके पीछे न्यूज चैनल दौड़ते है। अधिकांश दर्शक वर्ग भी उस पर विश्वास करता है।
 आज सुबह से बिजली फेल हो जाने का समाचार जिस प्रकार न्यूज चैनल दे रहे है। उसमें कुछ भी नयापन नहीं है। नार्थन ग्रिड का फेल होना मेकेनिकल गड़बड़ी है जो न तो सरकार की साजिश है और न ही सरकार उक्त स्थिति के लिए तैयार थी। इसलिए उसके परिणाम का सामना करने के लिए भी सरकार का तुरंत कार्यवाही करने के लिए तैयार न होना लाजमी था। स्थिति का जायजा लेने के बाद ही शासन-प्रशासन कुछ निर्णय लेने की स्थिति में होते है, जिसमें कुछ समय लगना स्वाभाविक है। लेकिन न्यूज चैनल्स उस आवश्यक, न्यूनतम, सामान्य लगने वाले समय को भी शासन-प्रशासन को देने को तैयार नहीं होते है। घटना घटते ही तुरंत खबर चलती है ‘जनता परेशान है और सरकार के द्वारा अभी तक कुछ नहीं किया जा रहा है।’ न्यूज चैनलो के भोपू शासन और प्रशासन की तीव्र गति से आलोचना में लग जाते है। यदि कोई हत्या हो गई है तो उनका यह समाचार ‘अभी तक अपराधी पकड़े नहीं गये है।’ यदि कोई एक्सिडेंट हो जाए तो उनका यह कथन ‘घायलों को अभी तक अस्पताल नहीं पहुचाया गया।’ यदि ट्रेन दुर्घटना हो जाए तो उनका यह कथन ‘कि राहत कार्य अभी तक प्रारंभ नहीं हुआ।’ आसाम जैसे कोई छेड़छाड़ की सामुहिक घटना हो जाए तो ‘अभी तक मात्र एक ही अपराधी पकड़ा गया।’ ऐसे अनेक बहुत से उदाहरण दिये जा सकते है जहां न्यूज चैनल्स ‘अभी तक’ पर ही जोर देते है जिन पर नेताओं के आरोप-प्रत्यारोप बयान भी आने शुरू हो जाते है। ये न्यूज चैनल्स, संवाददाता और एंकरिंग करने वाले शासन और प्रशासन को स्थिति से निपटने के लिए थोड़ा भी समय देने को तत्पर नहीं होते है। क्योंकि वे तेज चैनल कहलाने की होड़ में शासन प्रशासन से भी उतनी ही तेजी की एक्शन की उम्मीद करते है। तुरंत एक्शन होना चाहिए इसकी उम्मीद भी की जानी चाहिए लेकिन एक्शन लेने के लिए आवश्यक सामान्य समय की भी कल्पना चैनल वालो को करके शासन-प्रशासन को देना चाहिए। किसी भी चैनल द्वारा कोई भी घटना दुर्घटना पर उनकी भी कोई सकारात्मक जिम्मेदारी होती है उस पर उन्होने कभी विचार ही नहीं किया। आसाम छेड़छाड़ के प्रकरण में जनता के बीच वीडियो जारी होने एवं अंततः लगभग समस्त अपराधियों के गिरफ्तार होने के बावजूद कोई भी चैनल का कोई भी संवाददाता उन पकड़े गये अपराधियों के मोहल्ले में जाकर उन अपराधियों के पड़ोसियों से इंटरव्यू नहीं लिया। उनसे यह नहीं पूछा कि इतने दिन से ये अपराधी आपके पड़ोस में रहते थे, घुमते-फिरते थे, क्या आपको मालूम नहीं था? आपने पुलिस में सूचना क्यूं नहीं दी? ऐसा करके वे उन नागरिकों को भी अपनी जिम्मेदारी से विमुख होने की गलती का अहसास करा सकते थे। पत्रकारिता में खोजी पत्रकारिता महत्वपूर्ण होती है। इलेक्ट्रानिक चैनल स्टिंग आपरेशन के जरियें यह करते है। लेकिन ये स्टिंग ऑपरेशन भी ब्लेकमैल और कमाई के साधन बन जाते है। इस संबंध में यह आमचर्चा का विषय है कि संबंधित चैनल के स्वार्थ की पूर्ति हो जाये तो स्टिंग सिक्र्रेट बन जाता है अन्यथा वह ब्रेकिंग न्यूज बन जाता है। न्यूज चैनल्स सामान्य रूप से घटना और दुर्घटना के कारणों का पता लगाने का प्रयास क्यों नहीं करते है? जनता, शासन और प्रशासन प्रत्येक के उत्तरदायित्व को बोध कराने का प्रयास सकारात्मक रूप से क्यूं नहीं करते है? यह प्रश्न अक्सर कौंधता है। लोकतंत्र में मीडिया की बहुत ही प्रभावशाली और महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वह स्वयं भी यह बहुत अच्छी तरह जानता है। यदि मीडिया सकारात्मक नहीं है, तो वह निश्चिंत ही देश के विकास के आड़े आएगी। इसलिए मीडिया को सनसनीखेज घटनाओं को दिखाने के साथ अपनी सकारात्मकता भी सिद्ध करना चाहिए ताकि न केवल उनकी विश्वसनीयता, स्वीकारिता बनी रहे बल्कि वे समाज में चाहे वह राजनैतिक हो, सामाजिक हो, धार्मिक हो या अन्य कोई क्षेत्र हो अपनी सकारात्मक भूमिका का निर्वाह कर सके, जिसकी जनता उनसे अपेक्षा करती है और यही उनका देश के प्रति कर्तव्य भी है।
Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

About the author

मध्य प्रदेश के बैतूल जिले में भारतीय जनसंघ के संस्थापक स्वर्गीय श्री गोवेर्धन दास जी खंडेलवाल, जो कि संविद शासन काल में मंत्री एवं आपातकाल में मीसाबंदी रहे ! जिनके नेतृत्व में न केवल पार्टी का विकास हुआ अपितु बैतूल जिले में प्रगति के जो भी आयाम उभरे उन्हें आज भी जनता भूली नहीं है, के पुत्र हैं राजीव खंडेलवाल, वर्ष १९७९-८० में एलएलबी पास करने के बाद पहले सिविल, क्रिमिनल एवं आयकर, विक्रयकर की वकालत प्रारम्भ की । अब आयकर वाणिज्यकर की ही वकालत करते है। सरकार, समाज और संगठन के विभिन्न जिम्मेदरियो को सम्भालते हुए समाज सेवा के करने के दौरान सामने आने वाली समाज की विभिन्न समश्याओ को जनता एवं सरकार के सामने उठाने का प्रयास करते है.साथ ही पिछले १० वर्षो से देश, समाज के ज्वलंत मुद्दो पर स्वतंत्र लेखन कर रहे है व तत्कालिक मुद्दो पर त्वरित टिप्पणी लिखते है जो दैनिक जागरण, नव भारत, स्वदेश, समय जगत, पीपूल्स समाचार, राष्ट्रीय हिन्दी मेल, अमृत दर्शन समस्त भोपाल, जबलपुर एक्सप्रेस छिन्दवाड़ा, बी.पी.एन. टाईम्स ग्वालियर, प्रतिदिन अमरावती, तीर्थराज टाईम्स इलाहाबाद एवं स्थानीय समाचार पत्र एवं पत्रिकोओं में ओपन आई न्यूज भोपाल, पावन परम्परा नागपुर आदि में छपते रहे है। M : 9425002638 Email:[email protected]

1 Comment

  1. vipin says:

    इसमें कोई शक नहीं की बिजली चले जाने पर एयर कंडीशन्ड कोच ज्यादा ख़राब हो जाती हैं क्योंकि कोई वेंटिलेशन नहीं होता है

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

You might also like...

एक जज की मौत : The Caravan की सिहरा देने वाली वह स्‍टोरी जिस पर मीडिया चुप है..

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: