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भाई बहिन के प्यार पर लगा है सीमाओं का पहरा

By   /  August 1, 2012  /  No Comments

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-जैसलमेर से सिकंदर शेख||

ऐसा केवल भारत में ही संभव है कि एक महीन रेशम के धागे से दिन की अनंत गहराईयों में छिपे प्यार को बयां किया जा सके। भाई और बहन के अनमोल रिश्ते को समर्पित यह त्यौहार मन में उमंग की सुरीली घंटियां बजा देता है। और यही कारण है कि कलाई पर बंधने वाली राखी का सौन्दर्य रिश्ते की सादगी पर जीत जाती है। मन के किसी कच्चे कोने में बचपन से लेकर युवा होने तक की, स्कूल से लेकर बहन से विदा होने तक की और एक दूजे लडने और फिर प्यार करने तक की असंख्य स्मृतियां परत दर परत रखी होती है और राखी के इस त्यौहार के शीतल छींटे पडते ही फिर से ताजा हो कर सुगंधित कर देती है जीवन को। लेकिन उन बहनों व भाईयों की व्यथा इससे कुछ अलग होती है जिनके भाई बहिनों से दूर है और जिनकी बहने भाई से दूर हैं ऐसे में त्यौहारों की सुगन्ध उनके जेहन में दर्द और पीडा का अहसास करा जाती है।

ऐसा ही कुछ नजारा जैसलमेर जिले के पाक विस्थापित भील समुदाय के कई परिवारों में देखने को मिल रहा है जहां पर कई भाई ऐसे हैं जिनकी बहनें पाकिस्तान ब्याही हुई हैं और राखी पर भारत आ नहीं सकती और कई बहिनें ऐसी है जिनके भाई पाकिस्तान में बसर कर रहे हैं और बहिने इस पावन त्यौहार पर भाई का फोटो देख कर ही काम चला रही है। रक्षा बंधन के इस सौन्दर्य से परिपूर्ण त्यौहार का यह पहलू जैसलमेर की पाक विस्थापित भील बस्ती में किसी दर्द से कम नहीं हैं और जब इस दर्द को जानने हम पहुंचे इन परिवारों के बीच तो नजारा वास्तव में पीडा से भरा था जहां एक बहिन ने पिछले छः सालों से अपने भाई को नहीं देखा है क्योंकि वह पाकिस्तान में निवास कर रहे हैं। रक्षा बंधन पर राखियों को देखकर अपना मन मसोस कर रह जाने वाली पातू से जब इस त्यौहार को लेकर हमने बात करनी चाही तो कैमरे के सामने ही रो पडी इस महिला की दर्द अपने आप ही बयां हो गया। पातू बताती है कि वह 6 भाईयों की बहिन है और शादी से पहले हर रक्षा बंधन पर वह अपने भाईयों की कलाई पर राखी बांधती थी और इस त्यौहार की खुशियां मनाती थी लेकिन शादी के बाद भारत आकर बसी इस बहिन के प्यार पर देश की सीमाओं का पहरा होने के चलते न तो यह पाकिस्तान जा पाई है और न ही इसके भाई भारत आ पाये हैं ऐसे में रक्षा बंधन पर औरों की कलाई पर राखी देख कर इस बहिन के पास आंसु बहाने के सिवा कुछ भी शेष नहीं रहता है। पातु रोते हुए कहती है की भाई बहुत लाड प्यार से रखते थे राखी पर पाकिस्तान में खूब उपहार देते थे प्यार से सर पर हाथ फेरते थे मगर यहाँ भारत आने के बाद वो सिलसिला रुक गया है वीजा नहीं मिल रही है जैसे ही यहाँ की वीजा मिले तो वो यहाँ आकर मुझसे मिले तो में सबसे पहले उनको राखी बांधुंगी.

जैसलमेर में बसे भील परिवारों में पातू केवल एक उदाहरण नहीं है जो अपने भाईयों के लिये आंसू बहा रही है। इसी बस्ती के प्रेम चंद  भील की कहानी भी ऐसी ही है जिसकी बहिन की शादी पाकिस्तान में की हुई है और वीजा और अन्य अनुमतियों के पचडे के चलते न तो ये भाई पिछले कई वर्षों से अपनी बहिन से मिल पाये है और न ही वो बहिन अपने भाईयों के पास भारत आ पाई है। ऐसे में रक्षा के बंधन के त्यौहार पर बहिन की तस्वीर देख कर आंखे नम करते भाईयों के लिये यह त्यौहार किसी पीडा से कम नहीं है। रंग बिरंगी राखियों से सजी कलाईयां देख कर बचपन की यादों के सहारे इस त्यौहार को मनाने को मजबूर ये परिवार ही असल में पीडा भोग रहे हैं सीमाओं पर खींची दरारों की और उम्मीद भर नजर से देख रहे हैं कि कोई तो दिन ऐसा अवश्य ही आयेगा जब ये दरारें भरेंगी और प्यार के रंग इन सीमाओं पर भारी पडेंगे और भाई बहिनों से व बहिनें भाईयों बेखौफ मिल सकेंगी और त्यौहारों के रंग इनकी दुनियां में भी खुशियां बिखेरने वाले हो सकेंगे, 6 साल से मशीन पर कपडे सील सील कर अपने परिवार का पेट पाल रहे प्रेम चंद को अपनी बहन की बहुत याद आती है फोटो  दिखाते हुए उसकी आँखें नम  हो जाती है प्रेम चंद  भील बताता है की आज उसकी बहन यहाँ नहीं है यहाँ हम उसको बहुत याद करते हैं सूनी कलाई देख कर रोना आता है भगवान् से प्रार्थना करते हैं की वीजा मिल जाए तो वो यहाँ आ सके या हम उसके पास जाकर उससे मिल सके.

त्यौहार रिश्तों की खूबसूरती को बनाये रखने का एक बहाना होते हैं। यूं तो हर रिश्ते की अपनी एक महकती पहचान होती है लेकिन भाई बहिन का रिश्ता एक भावुक अहसास होता है जिस पर रक्षाबंधन के त्यौहार के छींटे पडते ही एक ऐसी सौंधी सुगंधित बयार लाता है जो मन के साथ साथ पोर पोर को महका देती है लेकिन भील बस्ती के इन परिवारों की पीडा देख कर ये शब्द बेकार से लगते हैं जहां भाई बहिन के प्यास पर सीमाओं का पहरा लगा है और मजबूर है ये भाई और बहिन राखी पर राखी बांधने व बंधवाने के लिये अपने पाकिस्तान में निवास कर रहे भाई बहिनों से.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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