/आखिर नरेंद्र मोदी का कसूर क्या है..?

आखिर नरेंद्र मोदी का कसूर क्या है..?

– राजीव गुप्ता||

भारत एक लोकतांत्रिक देश है ! अतः संविधान ने भारत की जनता को स्वतंत्र रूप से  अपना प्रधान चुनने की व्यवस्था दी है ! स्वतंत्रता प्राप्ति से लेकर अब तक  हर राज्य की बहुसंख्यक  जनता अपनी मनपसंद का अपने राज्य का मुखिया चुनती है और संवैधानिक व्यवस्था द्वारा वहा की जनता की भावनाओ का सम्मान किया जाता है ! लोकतान्त्रिक देश होने के कारण भारत में हर किसी को कर्तव्यो के साथ अपनी बात कहने की पूर्ण स्वतंत्रता है और इसीलिये भारत की मीडिया को लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ तक की संज्ञा जैसे शब्दों से अलंकृत किया जाता है पर अंतिम निर्णय का अधिकार भारतीय संविधान द्वारा यहाँ की सर्वोच्च न्यायालय को दिया गया है ! पर अगर लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कही जाने वाली मीडिया, कुछ  राजनेता  और तथाकथित भारत के कुछ बुद्धिजीवी आपसी तालमेल से किसी एक राज्य की जन – भावनाओ के दमन पर उतारू हो जाये तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर उन्हें अपनी इस तानाशाही का अधिकार किसने दिया ? आये दिन उत्तरी गुजरात के वादनगर के साधारण मध्यम परिवार में जन्मे गुजरात के मुख्यमंत्री का सुनियोजित तरीके से मान-मर्दन कर सस्ती लोकप्रियता और टीआरपी प्राप्त करने की पराकाष्ठा से भारत के सामने अब यह प्रश्न चिन्ह खड़ा हो गया है कि क्या ऐसे लोगो का भारत के संविधान में विश्वास नहीं है ? आखिर नरेंद्र मोदी का कसूर क्या है ?

 

27 फरवरी 2002 को अयोध्या से वापस आ रहे 59 कारसेवको को साबरमती एक्सप्रेस के एस – 6 डिब्बे में जिन्दा जलाने की घटना से उत्पन्न हुई तीखी साम्प्रदायिक – हिंसा भारत के इतिहास में कोई पहली सांप्रदायिक – हिंसा की घटना नहीं थी ! इससे पहले भी 1947 से लेकर अब तक भारत में कई सांप्रदायिक – हिंसा की घटनाएं हुई है ! बात चाहे 1961 में  मध्यप्रदेश के जबलपुर में हुए साम्प्रदायिक-हिंसा की हो अथवा 1969 में गुजरात के दंगो  की हो , 1984 में सिख विरोधी हिंसा की हो, 1987 में मेरठ के दंगे हो , 1989 में हुए भागलपुर – दंगे की बात हो, 1992 – 93 में बाबरी काण्ड के बाद मुंबई में भड़की हिंसा की हो,  2008 में कंधमाल की हिंसा की हो या फिर अभी पिछले दिनों ही उत्तर प्रदेश के बरेली में फ़ैली सांप्रदायिक हिंसा की हो अथवा इस समय सांप्रदायिक हिंसा की आग में सुलगते हुए  असम  की हो जिसमे अब तक करीब तीन लाख लोगों ने अपना घर छोड़ा दिया ! हर साम्प्रदायिक-हिंसा के बाद राजनीति हावी हो जाती है ! परन्तु मीडिया का राजनीतिकरण हो जाने से निष्पक्ष कही जाने वाली मीडिया एक तरफ़ा राग अलापते हुए अपने – अपने तरीके से वह घटना की जांच कर जनमानस पर अपना निर्णय थोपते हुए अपने को संविधान के दायरे में रहने का खोखला दावा करती है जो कि निश्चय ही दुर्भाग्य पूर्ण है ! कोई भी देश वहा के संविधान द्वारा प्रदत्त व्यवस्था से चलता है ! सभी नागरिको का यह कर्तव्य है कि वो एक दूसरे की भावनाओ का ध्यान रखते हुए देश की एकता और विकास में अपना योगदान दे ! यह एक कटु सत्य है कि विभिन्न समुदायों के बीच शांति एवं सौहार्द स्थापित करने की राह में सांप्रदायिक दंगे एक बहुत बड़ा रोड़ा बन कर उभरते है और साथ ही मानवता पर ऐसा गहरा घाव छोड़ जाते है जिससे उबरने में मानव को कई – कई वर्ष तक लग जाते है !

 

भारत जैसे शांति प्रिय देश में हर सांप्रदायिक – हिंसा की घटना निश्चित रूप से किसी व्यक्ति विशेष पर न होकर  सम्पूर्ण देश के ऊपर एक कलंक के समान है  ! ध्यान देने योग्य है प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह  पिछले शनिवार को असम में फ़ैली सांप्रदायिक – हिंसा की घटना को देखने के लिए गए थे और उन्होंने असम की सांप्रदायिक – हिंसा की घटना को देश का कलंक कहा था ! अभी तक का यह सच है कि देश में हुए हर आतंकवादी घटना, सांप्रदायिक – हिंसा, जाति अथवा भाषाई झगडे निम्नस्तर की राजनीति की भेट चढ़ते देर नहीं लगती जो कि दुर्भाग्य-पूर्ण है  ! धर्मनिरपेक्षता की आड में अपने को साम्यवादी एवं समाजवादी कहने वाले  राजनेताओं और तथाकथित सेकुलर बुद्धिजीवियों ने अपने वाकपटु मुहफट बयानों के चलते  भारत की एकता और अखंडता को सदैव ही नुक्सान पहुचने में कोई कसर नहीं छोडी ! अवसरवादी राजनीति के चलते ये तथाकथित लोग मीडिया के सहारे विभिन्न आयोगों और माननीय न्यायालयों के निर्णयों को भी अपने वोट-बैंक के तराजू पर तौलते हुए देश में एक भ्रम की स्थिति पैदा करने में भी कोई कमी नहीं छोड़ते और अपने आपको न्यायाधीश समझते हुए फैसले देते हुए भी नहीं हिचकिचाते ! इसका उदाहरण हम कांग्रेस की जयंती नटराजन के उस बयान में देख सकते है जिसमे उन्होंने गोधरा – काण्ड पर आये न्यायालय को फैसले को बिना पढ़े अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि गोधरा – काण्ड के बाद हुए दंगो के लिए नरेंद्र मोदी ही दोषी है, इसके अलावा हम उत्तर प्रदेश में चुनाव के समय कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह के उस बयान को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता जिसमे उन्होंने दिल्ली के जामिया एंकाउन्टर में मोहन चन्द्र शर्मा की शहादत पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिल्ली पुलिस के मनोबल को नेस्तनाबूत करने का दुस्साहस किया था !  इन्ही वाकपटुओ के बयानों के चलते  देश ने हमेशा सामाजिक सौहार्द, एकता , सुरक्षा जैसे राष्ट्रहित का अभाव महसूस किया है ! बात चाहे  1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के पश्चात् दंगो के बाद  हुई हिंसा को सही ठहराने के लिए कांग्रेस पार्टी के उन लोगो की हो जिन्होंने एक कहावत का सहारा लेते हुए कहा था कि जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती ही है अथवा  अन्ना टीम के प्रशांत भूषण का कश्मीर पर बयान हो या फिर अभी असम के मुख्यमंत्री का वह बयान जिसमे उन्होंने कहा कि असम में हाल में हुई यह सांप्रदायिक – हिंसा “अस्थायी” थी !   

 

2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में प्रस्तुत किया ही न जा सके इसकी तैयारी के लिए अभी से राजनीतिक पंडितो ने मीडिया के सहारे अपने  – अपने मोर्चे खोलकर जनमानस में नरेंद्र मोदी एक साम्प्रदायिक – हिंसा को बढ़ावा देने वाला व्यक्ति है ऐसी उनकी “ब्रांडिंग” की जा रही है ! इसी के चलते नरेंद्र मोदी से मिलने वाला हर व्यक्ति साम्प्रदायिक – हिंसा को समर्थन करने वाला होगा ऐसा प्रचार अभियान चलाया जाना वास्तव में भारतीय राजनीति के लिए एक अक्षम्य अपराध है जिसे इतिहास कभी माफ़ नहीं करेगा ! अन्ना हजारे से लेकर बाबा रामदेव तक जिस किसी ने नरेंद्र मोदी की तारीफ की उसे इन बुद्धिजीवियों का दंश झेलना ही पड़ा , एक तरफ जहा शीला दीक्षित और कांग्रेस के राज्यसभा सांसद विजय दर्डा को चेतावनी देकर छोड़ दिया गया तो वस्तानवी से लेकर शाहिद सिद्दकी इतने खुशनसीब नहीं रहे उन्हें उनके पद से मुक्त ही  कर दिया गया ! भारत की राजनीति नरेंद्र मोदी के साथ ऐसी छुआछूत का व्यवहार क्यों कर रही है और साथ ही  माननीय न्यायालयों ने भी गोधरा – दंगो का दोषी उन्हें नही माना और न ही जनता से माफी मागने के लिए कहा तो फिर ये मीडियाकर्मी और तथा कथित सेकुलर बुद्धिजीवी अपने अहम् के चलते संविधान की किस व्यवस्था के अंतर्गत उनसे माफी मागने के लिए लगातार कह रहे है ? मात्र चंददिनों में गोधरा – दंगो को नियंत्रण में लाने वाले और पिछले दस वर्षो में गुजरात में एक भी कही भी दंगा न होने देने वाले नरेंद्र मोदी भारतीय राजनीति में क्या एक अछूत है ?  

 

परन्तु इसका एक दूसरा पहलू भी है ! एक तरफ जहां ये सेकुलर बुद्धिजीवी और मीडिया की आड़ में राजनेता अपनी राजनीति की रोटियां सेकने में व्यस्त है तो वही इससे कोसो दूर गुजरात अपने विकास के दम पर भारत के अन्य राज्यों को दर्पण दिखाते हुए उन्हें गुजरात का अनुकरण करने के लिए मजबूर कर रहा है ! नरेंद्र मोदी पर लोग साम्प्रदायिकता की आड़ में जो भेदभाव का आरोप लगाया जाता है वह निराधार है ! एक आंकड़े के अनुसार गुजरात में मुसलमानों की स्थिति अन्य राज्यों से कही ज्यदा बेहतर है ! ध्यान देने योग्य है कि भारत के अन्य राज्यों की अपेक्षा गुजरात के मुसलमानों की प्रतिव्यक्ति सबसे अधिक है और सरकारी नौकरियों में भी गुजरात – मुसलमानों की 9.1 प्रतिशत भागीदारी के साथ अव्वल नंबर पर है ! इतना ही नहीं पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद के 84वे स्थापन दिवस के मौके पर  गुजरात के कृषि विकास को देखते हुए कहा कि जलस्तर में गिरावट , अनियमित बारिश और सूखे जैसे समस्याओ के बावजूद गुजरात 9 प्रतिशत की अभूतपूर्व कृषि विकास दर के माध्यम से भारत के अन्य राज्यों पर अपना परचम लहरा है जबकि भारत की कुल कृषि विकास दर मात्र 3 प्रतिशत है ! विश्व प्रसिद्द ब्रोकरेज मार्केट सीएलएसए ने  गुजरात के विकास विशेषकर इन्फ्रास्ट्रक्चर , ऑटोमोबाइल उद्योग तथा डीएमईसी प्रोजेक्ट की सराहना करते हुए यहाँ तक कहा कि नरेंद्र मोदी गुजरात का विकास एक सीईओ की तरह काम कर रहे है ! यह कोई नरेंद्र मोदी को पहली बार सराहना नहीं मिली इससे पहले भी अमेरिकी कांग्रेस की थिंक टैंक ने उन्हें ‘किंग्स ऑफ गवर्नेंस’ जैसे अलंकारो से अलंकृत किया ! नरेंद्र मोदी को  टाइम पत्रिका के कवर पेज पर जगह मिलने से लेकर ब्रूकिंग्स के विलियम एन्थोलिस, अम्बानी बंधुओ और रत्न टाटा जैसो उद्योगपतियों तक ने एक सुर में सराहना की है !

 

नरेंद्र मोदी की प्रशासनिक कुशलता के चलते फाईनेंशियल टाइम्स ने हाल ही में लिखा था कि देश के युवाओ के लिए नरेंद्र मोदी प्रेरणा स्रोत बन चुके है ! पाटण जिले के एक छोटे से चार्णका गाँव में सौर ऊर्जा प्लांट लगने से नौ हजार करोड़ का निवेश मिलने से वहा के लोगो का जीवन स्तर ऊपर उठ गया ! ध्यान देने योग्य है कि अप्रैल महीने में  नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी काउंसिल जनरल पीटर तथा एशियाई विकास बैंक के अधिकारियों की मौजूदगी में एशिया के सबसे बड़े सौर ऊर्जा पार्क का उद्घाटन किया था जिससे सौर ऊर्जा प्लांट से 605 मेगावाट बिजली का उत्पादन किया जा सकेगा जबकि शेष भारत का यह आंकड़ा अभी तक मात्र दो सौ मेगावाट तक ही पहुंच पाया है ! भले ही कुछ लोग गुजरात का विकास नकार कर अपनी जीविका चलाये पर यह एक सच्चाई है कि गुजरात की कुल मिलाकर 11 पंचवर्षीय योजनाओं का बजट   भारत की 12वीं पंचवर्षीय योजना के बजट के लगभग समकक्ष है ! अपनी इसी दूरदर्शिता और नेतृत्व क्षमता के चलते आज भारत ही नहीं विश्व भी नरेंद्र मोदी को भारत का भावी प्रधानमंत्री के रूप में देखता है जिसकी पुष्टि एबीपी नील्‍सन ,  सीएनएन-आईबीएन और इण्डिया टुडे तक सभी के सर्वेक्षण करते है और तो और नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का अनुमान कई सोशल साइटो पर  भी देखा जा सकता है ! बावजूद इन सब उपलब्धियों के गुजरात को विकास के शिखर पर पहुचाने वाले नरेंद्र मोदी से छुआछूत – सा व्यवहार करना कहाँ तक  सार्थक  और तर्कसंगत है यह आज देश के सम्मुख विचारणीय प्रश्न है !

 

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.