/‘कथा सरिता’ और ‘कथा दर्शन’ में याद किया प्रेमचंद की परंपरा को!

‘कथा सरिता’ और ‘कथा दर्शन’ में याद किया प्रेमचंद की परंपरा को!

जयपुर में 31 जुलाई 2012 को जवाहर कला केन्‍द्र और राजस्‍थान प्रगतिशील लेखक संघ, द्वारा  प्रेमचंद की 132वीं जयंती पर ‘कथा सरिता’ और ‘कथा दर्शन’ कार्यक्रम के जरिये प्रेमचंद की साहित्यिक विरासत और परंपरा को याद किया गया। ‘कथा सरिता’ में राजस्‍थान के सात कथाकारों का कहानी पाठ आयोजित किया गया। समारोह की शुरुआत में राज. प्रलेस के महासचिव प्रेमचंद गांधी ने अतिथियों का स्‍वागत करते हुए कहा कि तीन वर्ष पहले इस समारोह की संकल्‍पना इस रूप में की गई थी कि प्रदेश के कहानीकार राजधानी में प्रेमचंद की कथा परंपरा की विरासत और परंपरा को आम-अवाम के साथ साझा करें। उन्‍होंने कहा कि यह उल्‍लेखनीय है कि इस क्रम में अब तक प्रदेश के 16 कथाकार इस मंच पर अपनी कहानियां पढ़ चुके हैं और आज यह संख्‍या 24 हो जाएगी। अभी भी हमारे पास इससे अधिक लेखक हैं, जो इस मंच पर प्रस्‍तुत किये जाने हैं। उन्‍होंने बताया कि अब इस समारोह को लेकर लेखकों में ही नहीं आम साहित्‍य प्रेमियों में भी खासी उत्‍सुकता पैदा हो चुकी है। लोग हर साल पूछते हैं कि इस बार कौन-कौन कहानीकार आ रहे हैं। उन्‍होंने आगे बताया कि इस समारोह की खासियत ही यह है कि इसमें अभी तक जो लेखक बुलाये जा चुके हैं, उन्‍हें फिर से कहानी पाठ के लिए नहीं बुलाया गया, हर बार हम हिंदी, राजस्‍थानी और उूर्द के नए कहानीकारों को बुलाते हैं। इसके पश्‍चात राजस्‍थान प्रलेस के अध्‍यक्ष और वरिष्‍ठ कथाकार डॉ. हेतु भारद्वाज की अध्‍यक्षता में ‘कथा सरिता’ में आए लेखकों का स्‍वागत किया गया। इस बार आने वाले कथाकारों में राधेश्‍याम तिवारी, ईशमधु तलवार और रमेश खत्री जयपुर से थे तो जोधपुर से मीठेश निर्मोही, बीकानेर से मदन गोपाल लढ़ा, टोंक से शहनाज फातिमा और सीकर से संदीप मील थे। समारोह की शुरुआत में मुंशी प्रेमचंद के चित्र पर माल्‍यार्पण और पुष्‍पांजलि अर्पित की गई।

कार्यक्रम की शुरूआत प्रेमचंद की कहानी ईदगाह के वाचन से हुई। युवा रंगकर्मी  अभिषेक गोस्‍वामी ने ईदगाह का प्रभावी वाचन किया। उसके बाद ईशमधु तलवार ने अपनी कहानी ‘दफन नदी’ का पाठ किया। तलवार की कहानी प्रेम की प्रभावशाली अभिव्‍यक्ति करती है। नदी का दफन होना प्रेम का दफन होना है। उनकी कहानी संस्‍मरण और यात्रावृतांत की मिली जुली शैली में थी, जिसे श्रोताओं ने बालमन के चुटीले अंशों और लोक संवेदना के कारण बेहद पसंद किया। इनके बाद रमेश खत्री ने अपनी कहानी ‘खालीपन की परतें’ का पाठ किया। कहानी बहुत ही प्रभावशाली रही, जिसमें अकेलेपन की उदासी का चित्रण है। उनकी कहानी में मध्‍यवर्गीय महिला के जीवन के खालीपन को अंतर्मन में उमड़ती उथलपुथल के माध्‍यम से उकेरा गया, जिसका उपस्थित दर्शक-श्रोताओं पर गहरा प्रभाव पड़ा। इनके पश्‍चात बीकानेर से आए युवा कहानीकार मदन गोपाल लढ्ढा ने अपनी राजस्‍थानी कहानी ‘शुक्‍ल पक्ष’ का हिंदी में पाठ किया।  उनकी कहानी एक लड़की की स्‍वतंत्रता और अपने फैसले खुद करने की कहानी है।  डायरी शैली में लिखी गई इस कहानी में एक युवती से औरत बनने की प्रक्रिया में ही नायिका के सपने कुचल जाते हैं और वहीं यह लड़की अपने पक्ष में फैसला करती है और अपने जीवन के शुक्‍ल पक्ष में प्रवेश करती है। वरिष्‍ठ कथाकार राधेश्‍याम तिवारी ने व्‍यंग्‍यात्‍मक कहानी ‘लिटरेरी फेस्टिवल का भूत’ पढ़ी। यह कहानी जयपुर लिटरेचर फैस्टिवल जैसे आयोजन पर है, जिसमें बहुत करारा व्‍यंग्‍य किया गया है। कहानी में साहित्‍य के बाजारीकरण और सस्‍ते साहित्‍य की आलोचना है। एक लेखक कैसे फेस्टिवल के खुमार में अपना मूल व्‍यक्तित्‍व भूल जाता है और कैसी हास्‍यास्‍पद परिस्थितियां पैदा होती हैं, यही कहानी में बहुत रोचक ढंग से बताया गया है। इस कहानी पर दर्शक-श्रोताओं ने खूब ठहाके लगाए।

इसके बाद जोधपुर से आए हिंदी व राजस्‍थानी के कवि-कथाकार मीठेश निर्मोही ने  कहानी ‘बंधन’ का पाठ किया। यह एक औरत की मुक्ति की कहानी है, जिसमें वह स्‍त्री अपनी नियति के साथ समझौता करती है और अपने दात्‍पत्‍य जीवन को जैसा भी है स्‍वीकार करती है। सामाजिक जीवन की विद्रूपताओं और लोभ्‍-लालच को बयान करती इस कहानी ने बहुत अच्‍छा प्रभाव पैदा किया। टोंक से आई उर्दू की नई नस्‍ल की कथाकार शहनाज फातिमा ने अपनी कहानी ‘वासना का पुजारी’ का पाठ किया। यह  पुरूषवादी समाज में पुरूष के झूठ और फरेब की कहानी है, जिसमें एक पुरूष वासना का शिकार होता है और अपने अच्‍छे-भले दाम्‍पत्‍य जीवन को ठुकरा कर नया रास्‍ता चुनता है, लेकिन बाद में पश्‍चाताप में जीता है। सीकर से आए युवा कहानीकार संदीप मील ने बहुत अच्‍छी कहानी ‘बाकी मसले’ का पाठ किया। संदीप की कहानी एक फौजी की कहानी है, जिसमें भारत पाक की दोस्‍ती को बहुत ही संवेदनशील ढंग से उठाया गया है।   कहानी अपने समय के तमाम मुद्दों को उठाती चलती है। सीमा के टावर पर बैठे भारत-पाक फौज के दो सिपाहियों के बहाने कहानी में मानवीय संवेदना और दो देशों की आपसी जंग को बहुत खूबसूरत ढंग से उठाया गया है। इस कहानी ने श्राेताओं को गहराई तक झकझोर दिया। अध्‍यक्षता करते हुए आलोचक एवं कहानीकार डॉ. हेतु भारद्वाज ने अपनी कहानी ‘पंच परमेश्‍वर’ का पाठ किया। यह कहानी बहुत ही प्रभावशाली रही, जिसमें हंसों के जोड़े और उल्‍लू के माध्‍यम से जीवन की वास्‍तविकता को उजागर किया गया। कैसे उल्‍लू हंसिनी को पंचायत के दम पर अपनी पत्‍नी घोषित करवा लेता है और बेचारा हंस ही नहीं हंसिनी तक इसकी चालों के आगे कुछ नहीं कर पाते। समारोह के अंत में ‘कथा दर्शन’ कार्यक्रम के अंतर्गत प्रेमचंद की कहानी ‘ईदगाह’ पर गुलजार की बनायी फिल्‍म दिखायी गई। समारोह के अंत में संयोजक प्रेमचंद गांधी ने सभी उपस्थित दर्शक-श्रोताओं एवं अतिथियों का हार्दिक आभार प्रकट किया।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.