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चाह कर भी इतिहास को नहीं झुठला सकते खुशवंत सिंह

By   /  July 21, 2011  /  7 Comments

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हिंदी के एक कथाकार हैं- प्रेमचंद सहजवाला। जब हमने इस सीरीज़ की पहली कहानी प्रकाशित की तो उनका कमेंट आया जिसमें एक किताब का जिक्र था। हमने उनसे संपर्क साधा तो पता चला कि उन्होंने भगत सिंह के कई अनछुए पहलुओं पर एक अनोखी किताब लिख रखी है। किताब का नाम है, ‘ भगत सिंह, इतिहास के कुछ और पन्ने ‘  हमने अनुरोध किया तो उन्होंनें हमें वह किताब भिजवा दी।

करीब सवा सौ पन्नों की इस किताब में 20 से भी अधिक इतिहास की पुस्तकों और अभिलेखों के संदर्भ लिए गए हैं। जहां तक मैंने इस किताब को समझा है, इसमें कांग्रेस के भीतर नरमदल और गरम दल के भीतर चले टकराव की ओर इशारा किया गया है, लेकिन भगत सिंह के जीवन और उनके विचारों का काफी तथ्यपूर्ण चित्रण है। जिस दिन भगत सिंह ने असेंबली में बम फेंका था उस दिन के बारे में विस्तार से बताया गया है। किताब के मुताबिक शोभा सिंह ने न सिर्फ गवाही दी थी, बल्कि भगत सिंह को पकड़वाया भी था।

किताब मे प्रमुख इतिहासकार ए जी नूरानी के हवाले से लिखा गया है, शोभा सिंह, जो कि नई दिल्ली के निर्माण में प्रमुख ठेकेदार थे, अभी-अभी गैलरी में प्रविष्ट हुए थे। वे अपने चंद मित्रों के चेहरे खोज रहे थे जिनके साथ उन्हें बाद में भोजन करना था….. ठीक इसी क्षण धमाक-धमाक की आवाज से दोनों बम गिरे थे। सभी भागने लगे, लेकिन शोभा सिंह दोनों पर नजर रखने के लिए डटे रहे…. जैसे ही पुलिस वाले आए शोभा सिंह ने दो पुलिसकर्मियों को उनकी ओर भेजा और स्वयं भी उनके पीछे लपके… पुलिस जब नौजवानों के निकट पहुंची तब किसी भी अपराध बोध से मुक्त अपने किए पर गर्वान्वित दोनों वीरों ने खुद ही अपनी गिरफ़्तारी दी…

हालांकि खुशवंत सिंह ने यह तो कुबूल किया था कि उनके मरहूम पिता ने भगत सिंह की शिनाख्त की थी, लेकिन शायद यह छिपा गए थे कि उनके पिता इस हद तक अंग्रेजी सरकार के पिट्ठू बन गए थे कि सिपाहियों के मददगार बन कर क्रांतिवीरों की गिरफ्तारी का इनाम लेने में जुट गए थे। खुशवंत सिंह ये बता पाएंगे कि इतिहास उनके परिवार पर लगा दाग कभी धो पाएगा?

प्रेमचंद सहजवाला

सहजवाला का भी कहना हैं, ” जब खुद खुशवंत सिंह भी भली भाति जानते हैं कि सर शोभा सिंह का नाम आते ही इतिहास का एक अप्रिय पन्ना खुल जाएगा और किसी को भी उस सड़क पर पहुंचते ही भगत सिंह की याद आने लगेगी तो उन्हें खुद ही ऐसा करने से बचना चाहिए जिससे उनके पिता को और कोसा जाए।” यही उनकी देशभक्ति का परिचायक होगा और प्रायश्चित भी।

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

7 Comments

  1. J.P.sehrawat says:

    जब खुद खुशवंत सिंह भी भली भाति जानते हैं कि शोभा सिंह का नाम आते ही इतिहास का एक अप्रिय पन्ना खुल जाएगा और किसी को भी उस सड़क पर पहुंचते ही भगत सिंह की याद आने लगेगी तो उन्हें खुद ही ऐसा करने से बचना चाहिए जिससे उनके पिता को और कोसा जाए।

  2. hargovind says:

    jisane jeevan sharab aur sharab ki masti me hi bitaya ho wah kyaa jane desh par mar mitana kya hota hai. vaise to Khushwant Singh apane ap ko sikh kehata hai, par kya wah kesh rakhane ke alawa guruon ki aur kisi agya kaa paalan karata hai? Nehru Gandhi parivar ke talawe chaatanaa aur jhoota itihas likhana usaka shagal raha hai. Wah chaheta hai to kewal page 3 sanskriti ke logon ka.

  3. दारू पीकर… पेज-3 की औरतों पर लिखने वाले ठरकी को इतना भाव क्यों दिया गया है, यह मुझे आज तक समझ नहीं आया…

  4. mumtaz naza says:

    सही कहा

  5. ePandit says:

    बहुत अच्छा लेख। बहुत से लोगों को तो पता ही नहीं मसालेदार लिखने वाले खुशवंत सिंह के खून पर क्या दाग लगा है।

  6. wo ek Afsos ka din hoga Jab bhi aisa hoga ,,,Yeh ek widambana hi hai K Hum aaj is kadar selfish ho gaye hai ki ab humare dilo`n mai shahdat ke liye Koi samman hi nahi raha hai . Waise bhi Kitney shahid hue or kitne logo ko yaad rakha or jin logo ko yaad rakh bhi liya Ab os wajood e shahadat ko Gaali deney ki tayari hai . Afsos Kab Humahre desh ke litrate hongey or kab samman deney kabil hongey .

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