/एक अकेली आशा और सामने दाउद इब्राहीम गैंग, फिर भी जीत गई..

एक अकेली आशा और सामने दाउद इब्राहीम गैंग, फिर भी जीत गई..

हाल ही में एक अख़बार के किसी कोने में खबर छपी थी “रोमेश शर्मा जेल से रिहा.”

इसी के साथ याद आ गयी जयप्रकाश नारायण आन्दोलन के कोर ग्रुप की सदस्य आशा पटेल. जिन्होंने चौदह बरस पहले उन्नीस सौ सितानवे में अपने अख़बार वाणिज्य सेतु में दाउद इब्राहीम के दिल्ली दूत रोमेश शर्मा, जो कि उन दिनों लालू यादव तक अपनी पहुँच बना कर राजद का हिस्सा बन गया था, के कारनामों पर विस्तार से लिखा था. आशा पटेल ने लगातार एक साल तक रोमेश शर्मा मामले को उठाये रखा और तत्कालीन प्रधान मंत्री देवगौड़ा से ले कर इंद्र कुमार गुजराल के शासनकाल तक इस प्रकरण को ढीला नहीं छोड़ा नतीजतन उन्नीस सौ अट्ठानबे में रोमेश शर्मा के खिलाफ मामला दर्ज़ कर उसे गिरफ्तार कर लिया गया. मज़ेदार बात यह है कि रोमेश शर्मा के गिरफ्तार होने के बाद यह मामला सभी अख़बारों की सुर्खियां बना, मगर रोमेश शर्मा को गिरफ्तार करवाने के लिए सबूत देने और सरकार को नींद से जगाने वाली खबरें पहले से सिर्फ आशा पटेल ही प्रकाशित कर रही थी. दुःख तो इस बात का है की बड़े मीडिया संस्थानों ने आशा पटेल को इसका श्रेय भी नहीं दिया.

गौरतलब है कि रमेश चन्द्र मिश्र उर्फ़ रोमेश शर्मा सत्तर के दशक से दिल्ली में कुख्यात माफिया बतौर अपनी मौजूदगी दर्ज़ करवा रहा था. रोमेश शर्मा अपराध जगत के सरताज दाउद इब्राहीम के दिल्ली के कारोबार का प्रबंधक बतौर कार्य कर रहा था. रोमेश शर्मा अपने आपराधिक कारनामों के साथ साथ राजनीति में भी अपना दखल बढ़ा रहा था. राजनीति में अपने धन व बाहुबल के चलते स्व. चौधरी चरण सिंह से लेकर लालू यादव तक का चहेता बन चुका था. इसके अलावा रोमेश शर्मा मेनका गांधी तक का खास-म-खास बन गया. इसके बाद तो रोमेश शर्मा के हौंसले इतने बुलंद हो गए कि उसने दिल्ली में कई जगह लोगों की कोठियां तक हडपना शुरू कर दिया. और तो और एक बार उसने कुछ घंटों के लिए एक हेलीकाप्टर किराये पर लिया और उसपर कब्जा जमा कर बैठ गया. हेलीकाप्टर किराये पर देने वाली किसी कम्पनी के साथ ऐसा पहली बार हुआ था कि कोई कुछ घंटों के लिए हेलीकाप्टर किराये पर लेकर उसे हड़प जाये. उड्डयन क्षेत्र के इस ऐतिहासिक मामले में जब कम्पनी ने मामला पुलिस के सामने रखा तो पुलिस ने भी हाथ खड़े कर दिए.

 

रोमेश शर्मा एक तरफ अपना राजनीतिक कद इतना बढ़ा चुका था कि 1996 में कांग्रेस से इलाहाबाद लोकसभा क्षेत्र से टिकट की दावेदारी तक कर रहा था. इसीके साथ दाउद इब्राहीम और छोटा शकील के साथ मिलकर मुंबई बम कांड की तर्ज़ पर दिल्ली में भी बम विस्फोट की योजना पर काम कर रहा था. दिल्ली बम विस्फोट की योजना क्रियान्वित हो पाती इससे पहले ही रोमेश शर्मा आशा पटेल की नज़रों में आ गया और आशा पटेल ने बड़ी होशियारी से रोमेश शर्मा पर निगाह रखना शुरू किया. धीरे धीरे आशा ने रोमेश शर्मा, दाउद इब्राहीम और छोटा शकील के बीच जिन फोन नम्बरों से बात चीत होती थी वे नम्बर भी जुटा लिए तथा पूरे मामले को लगातार अपने अख़बार में छापकर प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और बड़े राजनेताओं के साथ साथ सीबीआई और दिल्ली पुलिस के उच्चाधिकारियों तक को रोमेश के कारनामों की मय सबूतों के असलियत बताती रही.

नतीजे में इस अपराधी को गिरफ्तार होना ही पड़ा. तेरह साल बाद कोर्ट ने उसे दस साल के कठोर कारावास की सजा सुनायी. जबकि वह तेरह साल से जेल में था. ऐसे में कोर्ट ने उसे गत तेईस जुलाई को रिहा कर दिया.

मीडिया दरबार ने इस विषय में आशा पटेल से बात की तो उनका कहना था कि मैं न्यायालय का सम्मान करती हूँ पर इस फैसले से कत्तई संतुष्ट नहीं हूँ. रोमेश शर्मा जैसे आतंकवादी को इस तरह खुला छोड़ देना निहायत घातक सिद्ध हो सकता है.

आशा पटेल के अनुसार रोमेश शर्मा के अपराधों की लिस्ट बड़ी लम्बी है, गुलशन कुमार हत्याकांड में भी इसका हाथ रहा है, तो नकली नोटों के कारोबार में भी इसने हाथ आजमायें हैं, इसके अलावा दाउद इब्राहीम की सेवा लेने को आतुर फ़िल्मी हस्तियों का दाउद इब्राहीम से मिलाने या बात करवाने की जिम्मेवारी भी दाउद इब्राहीम ने इसे ही दे रखी थी. क्या दस साल जेल में रहकर रोमेश शर्मा सुधर गया होगा? उसके पिछले कारनामों तथा राजनैतिक संबंधों को देखते हुए उन्हें लगता है कि रोमेश शर्मा फिर कोई बड़ा गुल खिला सकता है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.