/क्यों ना अपने अंदर से भ्रष्टाचार का सफाया करें..

क्यों ना अपने अंदर से भ्रष्टाचार का सफाया करें..

-राजेश कुमार गुप्ता||
भ्रष्टाचार हमारे अंदर बस गया है. हम सभी अपने अपने तरीके से भ्रष्ट हैं. और इसका कारण है हमारे अन्दर का लालच, विलासिता, आरामदेह और सुखकर जिन्दगी जीने कि चाह. और जब तक हम भ्रष्ट रहेंगे, हमारी मानसिकता भ्रष्ट रहेगी तो एक क्या सैकड़ों अन्ना, भ्रष्टाचार मिटाना तो दूर, कम तक नहीं कर सकते.

हर आदमी भ्रष्ट है (अगर ये बात किसी को बुरी लगी हो तो मैं माफ़ी चाहूँगा), अपने अपने तरीके से और भ्रष्टाचार करने कि अपनी क्षमता से. एक रिक्शे वाला 10 रुपये के वाजिब भाड़े की जगह 12 या 15 रुपये लेकर भ्रष्टाचार करता है, एक छोटा बनिया 10 प्रतिशत मुनाफे की जगह 25 प्रतिशत मुनाफा कमा कर भ्रष्टाचार करता है और एक बड़ा व्यापारी या उद्योगपति अपनी क्षमता के मुताबिक लाखों या करोड़ों का भ्रष्टाचार करता है. ठीक इसी प्रकार छोटे ओहदे का कर्मचारी सैकड़ों में, क्लर्क/मुंशी वर्ग का हज़ारों में, अफसर लाखों, करोड़ों में और मंत्री/नेता अरबों खरबों में भ्रष्टाचार करते हैं. जिसकी जितनी पहुँच और ताकत है, वो उसी मुताबिक गलत काम करता है. एक रिक्शा वाला या मजदूर लाखों, करोड़ों में भ्रष्टाचार नहीं कर सकता और एक अफसर या नेता कुछ सौ की हेरा फेरी नहीं करेगा.

हम हर काम व्यवस्था से हट कर और तेजी के साथ कराना चाहते हैं, जिसके लिए काम करने वाले को लालच देकर अपना काम कराते हैं और इस प्रक्रिया में हम उसे भ्रष्ट बना देते हैं. लाइन में खड़े हो कर कोई काम नहीं करना चाहता है. कभी ये तकलीफदेह होती है तो कभी शान के खिलाफ़. सिनेमा घर में टिकट की लाइन हो, रेलवे टिकट का काउंटर हो, अस्पताल में डॉक्टर को दिखाने की लाइन हो या फिर मैक डोनाल्ड में अपने बारी का इन्तजार, हमारी कोशिश लाइन को तोड़ कर आगे निकलने की होती है और इसके लिए हम कोई भी भ्रष्ट तरीका अपनाने को तैयार होते हैं.

बच्चा फेल हो गया हो तो उसको पास करने का उपाय, बिजली/टेलीफोन बिल में कमी करने का जुगाड़, मकान को मापदंड/नक़्शे से ज्यादा बनाने कि जुगत, अपने दूकान के सामने अतिक्रमण करने का प्रयास, लाल बत्ती पर चौराहे को पार करने की तीव्र इच्छा, पड़ोसी से बड़ा मकान, बड़ी गाड़ी का लालच और इसी तरह के कितने ही छोटे बड़े लालच, ख़्वाहिशें और दिखावा हमें भ्रष्ट बना देती है और इन सभी चीजों को हासिल करने के लिए हम सामने वाले को भ्रष्ट बना देते हैं.

आज नेता/मंत्री, अफसर, नौकरशाह, कर्मचारीगण, व्यापारी, उद्योगपति, शिक्षक, विद्यार्थी, डॉक्टर, वकील, सीए, जज, पुलिस सब भ्रष्ट कार्यप्रणाली के हिस्से हैं. उस पर जब इन्हीं में से लोकपाल और लोकायुक्त चुन कर आयेंगे तो या तो भ्रष्ट होंगे या भ्रष्ट बना दिए जायेंगे. इसे आप मेरी निराशावादी प्रवृति न समझें, यह आज के मानवजाति कि मूल प्रवृति बन गयी है, जिसका मैं भी हिस्सा हूँ. कितने होंगे जो अपनी यात्रा स्थगित कर देंगे या खड़े खड़े या अपने सामानों पर बैठ कर जायेंगे लेकिन टीटी को रिश्वत देकर जगह/बर्थ नहीं लेना चाहेंगे? ऐसे में अगर टीटी पैसे लेकर आपको बर्थ दे देता है तो क्या सिर्फ वही भ्रष्ट है?

हम आपने बच्चों को बचपन से भ्रष्टाचार की आदत डाल देते हैं. जब वह खाना नहीं कहा रहा होता, हम उसे लालच देकर खाना खिलाते हैं, जब वो पढ़ाई नहीं कर रहा होता, तो पढ़ने के लिए लालच देते हैं और देखते देखते हमारा यह मामूली और मासूम सा दिखने वाला रवैया बच्चे के अन्दर भ्रष्टाचार कि नीवं डाल देता है.

ज्यादातर लोग रामलीला मैदान में या जंतर मंतर में पहले पहले भ्रष्टाचार से त्रस्त एक उम्मीद और नई आशा से इकट्ठे हुए थे, पर बाद में उसी जगह पिकनिक का केंद्र बन गया. मीडिया को तो बिलकुल दोष न दें. अन्ना के आन्दोलन को इतना सफल और इन ऊँचाइयों तक पहुंचाने वाला मीडिया ही है. बल्कि यह कहिये कि अन्ना और उनकी टीम इस अभूतपूर्व सफलता और ख्याति को संभाल न सकी क्योंकि यह सफलता उनके हाथों वैसे ही लगी जैसे कि “अंधे के हाथ बटेर”. और आज की दुर्दशा का कारण अन्ना के टीम में कुछ मतलब परस्त, दोमुंहे, और आस्तीन के सांप का होना है, जिससे मीडिया का कोई लेना देना नहीं है. पिछले आन्दोलन में स्वामी अग्निवेश बे नकाब हुए थे और इस आन्दोलन में केजरीवाल और भूषणद्वै (शांति और प्रशांत).

भ्रष्टाचार हटाने की जिम्मेदारी सिर्फ अन्ना की नहीं है और न ही इस आन्दोलन पर उनका एकाधिकार है. अगर भ्रष्टाचार उन्मूलन को हम जन आन्दोलन बनाना चाहते हैं तो यह समस्त नागरिकों का सामूहिक प्रयास होगा जिसे हम अपने अन्दर के भ्रष्टाचार को ख़त्म करके शुरू कर सकते हैं. इसके लिए हम सब को सही मायनों में दिल और दिमाग से अन्ना बनना पड़ेगा. सिर्फ “मैं अन्ना हूँ” कि टोपी पहन लेने से कुछ नहीं होने वाला.

ऊपर दिए हुए सारे कथन और विचार मेरे निजी हैं और किसी व्यक्ति या समूह के तरफ़ संकेत या इशारा नहीं करते और जो नाम लिए गए हैं वह किसी को बदनाम करने के लिए नहीं हैं और सिर्फ उदाहरण मात्र हैं. अगर उपरोक्त कथन या विचारों से किसी को कष्ट पहुंची हो या आपत्तिजनक लगे तो मैं क्षमा प्रार्थी हूँ.

Facebook Comments

संबंधित खबरें:

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.