/जूत्ते पहनाते पहनाते टोपी पहनाने लगे कांडा और अरबपति बन गए..

जूत्ते पहनाते पहनाते टोपी पहनाने लगे कांडा और अरबपति बन गए..

गोपाल कांडा की सफलता की कहानी भी सपनों सरीखी है। 29 दिसंबर 1965 को जन्मे गोपाल कांडा केवल स्कूल लेवल तक पढ़े हैं। उनके पिता मुरलीधर कांडा एडवोकेट थे तो मां मुन्नी देवी गृहिणी हैं। पिता के देहांत के बाद घर-परिवार की जिम्मेदारी गोपाल कांडा और उनके भाई गोबिंद कांडा के कंधों पर आ गई।

दोनों भाइयों ने जूतों की दुकान खोली। यह वो समय था जब सिरसा शहर में गोपाल कांडा नामक युवक को बहुत कम लोग जानते थे। और जो जानते थे वह भी केवल इतना कि यह युवक अपने छोटे भाई के साथ जूते-चप्पल की दुकान चलाता है। इसके बाद दोनों भाइयों ने जूतों की फैक्ट्री खोल ली। आज वो फैक्ट्री तो नहीं है मगर जूतों का शोरूम आज भी हिसारिया बाजार में है। यही शोरूम आज कांडा बंधुओं का कैंप कार्यालय है।
ऐसा खड़ा किया एंपायर : कांडा के पास बिजनेस की कोई डिग्री नहीं है लेकिन किसी कारोबार को करने से नफा होगा या नुकसान, यह वे तुरंत भांप लेते हैं। एक बारगी तो उनकी संपत्ति कुर्क करने की नौबत भी आ गई थी लेकिन आज कांडा बंधु अकूत संपत्ति के मालिक हैं। फिर धीरे-धीरे दोनों राजनीति में आ गए। शुरू में दोनों इनेलो के करीब आए लेकिन जब वहां ज्यादा समय तक दाल नहीं गली तो दोनों भाइयों ने इनेलो छोड़ दी। 1998-99 में गोपाल कांडा गुड़गांव गए और प्रॉपर्टी डीलिंग के कारोबार से जुड़ गए। यह धंधा उन्हें खूब रास आया। एक के बाद एक संपत्ति जोड़कर वह आम से खास आदमी की श्रेणी में पहुंच गए।
एयरलाइंस बनाई : गोपाल कांडा ने 14 मार्च 2007 को एमडीएलआर एयरलाइंस बनाई। तीन साल घाटा उठाने के बाद डेढ़ साल पहले उन्होंने इसे बंद कर गोवा में कैसिनो खोला।
तारा बाबा के भक्त : गोपाल कांडा खुद को तारा बाबा का अनन्य भक्त बताते हैं और कहते हैं कि उन्हीं की कृपा और आशीर्वाद से वह आज इस मुकाम पर हैं। तारा बाबा सिरसा के ही संत थे। कांडा ने 2004-05 में करोड़ों रुपये खर्च कर तारा बाबा कुटिया का पुनर्निर्माण कराया और उसे धार्मिक स्थल का रूतबा दिला दिया। गोपाल कांडा श्री तारा बाबा चैरिटेबल ट्रस्ट के चेयरमैन हैं। उनके भाई गोबिंद कांडा कुटिया के मुख्य सेवक हैं।
2010 में बना महल : सिरसा में रानियां रोड पर तारा बाबा कुटिया से लगती जमीन में कांडा ने अपना आलीशान महल बनवाया है। यह महल देखने में किसी राजा का किला लगता है। इसकी दीवारें इतनी ऊंची हैं कि अंदर क्या चल रहा है, ये कोई देख तक नहीं सकता। कुटिया से लगती जमीन पर कांडा बंधुओं ने इसी सत्र से एमडीके इंटरनेशनल स्कूल भी शुरू किया है। यहां अस्पताल भी बनाया जा रहा है।
(भास्‍कर)
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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.