/गरीबी उन्मूलन को सर्वोच्च प्राथमिकता! असम समझौता लागू करने पर जोर दिया जाये – प्रणब मुखर्जी

गरीबी उन्मूलन को सर्वोच्च प्राथमिकता! असम समझौता लागू करने पर जोर दिया जाये – प्रणब मुखर्जी

-एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास||

भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को खारिज करते हुए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने लोकतांत्रिक संस्थाओं कोबचाने पर जोर दिया और अर्थ व्यवस्था के लक्ष्य बतौर समाजवादी जमाने की याद दिलाते हुए गरीबी उन्मूलन की सर्वोच्च प्राथमिकता तय की। उन्होंने कहा कि भूख, रोग और गरीबी से मुक्ति के लिए दूसरे स्वाधीनता संग्राम की जरूरत है।  जबकि योजना आयोग के अध्यक्ष मंटेक सिंह आहलूवालिया ने निवेशकी की आस्था लौटाने की प्रथमिकता बतायी। विवादास्पद सामान्य कर परिवर्जन रोधी नियम (गार) से जुड़े सभी मुद्दों की जांच परख के लिए गठित विशेषज्ञ समिति अपनी सिफारिशों का मसौदा 31 अगस्त तक और अपनी अंतिम रिपोर्ट 30 सितंबर तक सरकार को सौंप सकती है।प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जनरल एंटी अवॉयडेंस रूल्स (गार) के क्रियान्वयन के मामले की देखरेख की खातिर एक समिति का गठन किया। पिछले बजट में कर चोरी रोकने की खातिर गार का प्रावधान किया गया था। स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्यो पर वित्तीय प्रबंधन के सर्वेसर्वा और देस के प्रथम नागरिक के बयानों का यह अंतर्विरोध हैरतअंगेज  है। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर टीम अन्ना और बाबा रामदेव के आंदोलनों को लोकतंत्र के लिए खतरनाक बताते हुए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने उन पर तीखा प्रहार किया है।  मुखर्जी ने राष्ट्र के नाम अपने संदेश में भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करने की अपील की है। राष्ट्रपति का पद संभालने के बाद राष्ट्र के नाम अपने पहले संबोधन में प्रणब मुखर्जी ने कहा कि देश की अर्थव्यवस्था सुदृढ़ है। पिछले दो दशक के आर्थिक सुधार के कारण शहर और गांव के लोगों की आमदनी बढ़ी है। उन्होंने कहा कि नयी आर्थिक बेहतरी के लिए क्षेत्र में शांति जरूरी है जो हिंसा की प्रतिस्पर्धी वजहों को शांत कर सकती है। देश में सूखे और बाढ़ की मौजूदा स्थिति की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि मुद्रास्फीति विशेषकर खाद्य मुद्रास्फीति चिन्ता की वजह बनी हुई है। राष्ट्रपति ने कहा कि खाद्य उपलब्धता अच्छी है लेकिन हम उन लोगों की हालत को नहीं भूल सकते, जिन्होंने सुस्त हालात वाले वर्ष में भी इसे संभव कर दिखाया यानी कि हमारे किसान। वे देश की जरूरत के वक्त उसके साथ खड़े हुए। उनके संकट में देश को भी उनके साथ खडा होना चाहिए।असम में हाल में हिंसा पर चिंता व्यक्त करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा लिए गए असम समझौते को प्रभावी ढंग से और मौजूदा समय के परिप्रेक्ष्य में लागू करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यकों को साथ लेकर चलने और उन्हें समझने की जरूरत है। कोई भी हिंसा विकल्प नही हो सकती। अलबत्ता यह बड़े हिंसा को आमंत्रित करती है।

मुखर्जी ने कहा कि इस बार मानसून सामान्य नहीं रहा है, जिसके कारण कई क्षेत्र सूखे की चपेट में है और कई स्थानों पर बाढ आ गई है। इस कारण मंहगाई खासतौर से खाद्यान्नों की कीमतें बढ़ना चिंता का विषय है। ऐसे में किसानों की समस्याओं पर भी पूरा ध्यान देने की जरूरत है।राष्ट्रपति ने कहा कि अगर अपेक्षाओं के अनुरूप प्रगति नहीं होती तो युवाओं में भारी निराशा होगी। युवाओं की ज्ञान की पिपासा को पूरी करके हम उनकी क्षमता बढ़ा सकते हैं तथा इसके साथ भारत को प्रगति के पथ पर तेजी से आगे ले जा सकते हैं। बेहतर शिक्षा पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि शिक्षा बीज है तो अर्थव्यवस्था फल है। अच्छी शिक्षा से अर्थव्यवस्था भूख, रोग और गरीबी कम होगी।

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने संसद को सर्वोच्च बताते हुए आगाह किया कि अगर लोकतांत्रिक संस्थाओं पर प्रहार हुआ तो देश में अव्यवस्था फैल जाएगी। राष्ट्र के नाम अपने पहले सम्बोधन में मुखर्जी ने कहा, भ्रष्टाचार  का विरोध जायज है लेकिन यह लोकतांत्रिक संस्थाओं पर आक्रमण करने का बहाना नहीं बन सकता। मुखर्जी ने चेतावनी दी है कि अगर देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं पर हमला होगा तो इससे अव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा।  उन्होंने कहा कि हमें आजादी के दूसरे संघर्ष की आवश्यकता है। इस बार यह सुनिश्चित करने के लिए दूसरा स्वतंत्रता संग्राम लड़ना होगा कि भारत भूख, बीमारी और गरीबी से हमेशा के लिए मुक्त हो जाए। मुखर्जी ने पूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन के हवाले से कहा कि आर्थिक प्रगति लोकतंत्र की परीक्षाओं में से एक होती है। हिंसाग्रस्त असम में लोगों के जख्मों पर मरहम रखने की प्रक्रिया शुरू करने पर जोर देते हुए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा कि ऐतिहासिक असम समझौते पर फिर से विचार करने की आवश्यकता है और इसे न्याय एवं राष्ट्रहित की भावना से मौजूदा परिस्थितियों के अनुकूल बनाया जाना चाहिए। स्वतंत्रता दिवस की पूर्वसंध्या पर राष्ट्र के नाम अपने पहले संबोधन में मुखर्जी ने कहा कि असम के जख्मों को भरने के लिए ठोस प्रयास किये गये, जिनमें असम समझौता भी शामिल है, जो हमारे युवा एवं प्रिय पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का विचार था। हमें उस पर दोबारा चर्चा करनी चाहिए और न्याय एवं राष्ट्रहित की भावना से उसे मौजूदा परिस्थितियों के अनुकूल बनाया जाना चाहिए।जातीय समूहों के बीच तनाव पर चिन्ता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि हमारे देश की स्थिरता के लिए खतरा बनने वाली पुरानी आग पूरी तरह बुझी नहीं है. उसमें से अभी भी धुआं निकलना जारी है। मुखर्जी ने कहा कि हमारे अल्पसंख्यकों को आघात से सुरक्षा, तसल्ली और समझ की जरूरत है। हिंसा कोई विकल्प नहीं है बल्कि हिंसा अपने से कहीं बडी हिंसा को आमंत्रित करती है।

वहीं भले ही योग गुरू कांग्रेस हटाओ देश बचाओ का नारा लगा रहे हैं, लेकिन आने वाले दिनों में खुद उनका संगीन इल्जामों से बच पाना मुश्किल है। सीएनएन आईबीएन को सेंट्रल एक्साइज इंटेलिजेंस की एक खुफिया रिपोर्ट हाथ लगी है। इस रिपोर्ट के मुताबिक बाबा रामदेव के दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट ने करोड़ों रुपए का सर्विस टैक्स नहीं चुकाया है। तो क्या केंद्र सरकार बाबा के गले में टैक्स चोरी का फंदा डालने को तैयार है?

राष्ट्रपति के तौर पर प्रणब मुखर्जी के पहले संबोधन में टीम अन्ना और बाबा रामदेव के आंदोलनों पर सख्त टिप्पणी हुई। हालांकि उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन भ्रष्टाचार और कालेधन के ख़िलाफ़ चल रहे आंदोलनों को लेकर चेतावनी दे डाली। उन्होंने माना कि लोगों में इन मुद्दों पर गुस्सा है, लेकिन इस ग़ुस्से के बहाने लोकतांत्रिक संस्थाओं पर हमला ज़ायज़ नहीं है। लोकतांत्रिक संस्थाएं संविधान की महत्वपूर्ण स्तंभ हैं और इनमें दरार आने पर संविधान के आदर्श कमजोर होंगे। बात-बात पर आंदोलन देश में अव्यवस्था फैला सकते हैं। संसद देश की आत्मा है और उसे क़ानून बनाने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र को स्वतंत्र चुनावों के जरिए शिकायतों के समाधान के लिए बेहतरीन अवसर का वरदान प्राप्त है।

देश के 66वें स्वतंत्रता दिवस की पूर्वसंध्या पर राष्ट्र के नाम अपने संदेश में मुखर्जी ने कहा कि भ्रष्टाचार की महामारी के खिलाफ गुस्सा और आंदोलन जायज़ है क्योंकि यह महामारी हमारे देश की क्षमता का ह्रास कर रही है. उन्होंने कहा कि कभी कभार जनता अपना धैर्य खो देती है लेकिन इसे हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं पर प्रहार का बहाना नहीं बनाया जा सकता.

राष्ट्रपति ने कहा कि ये संस्थाएं संविधान के दर्शनीय स्तंभ हैं और यदि इन स्तंभों में दरार आयी तो संविधान का आदर्शवाद नहीं रह सकता। उन्होंने कहा कि सिद्धांतों और जनता के बीच ये संस्थाएं ‘मिलन बिंदु’ का काम करती हैं। हो सकता है कि हमारी संस्थाएं समय की सुस्ती का शिकार हों लेकिन इसका जवाब यह नहीं है कि जो निर्मित किया गया है, उसे ध्वस्त किया जाए. बल्कि करना यह चाहिए कि उन्हें फिर से तैयार किया जाए ताकि वे पहले के मुकाबले अधिक मजबूत बन सकें. संस्थाएं हमारी आजादी की अभिभावक हैं।

मुखर्जी ने कहा कि विधायिका से कानून बनाने का काम नहीं छीना जा सकता. जनता को अपना असंतोष व्यक्त करने का अधिकार है। उन्होंने कहा कि जब अधिकारी सत्तावादी बन जाए तो लोकतंत्र पर असर होता है लेकिन जब बात बात पर आंदोलन होने लगें तो अव्यवस्था फैलती है. राष्ट्रपति ने कहा कि लोकतंत्र साझा प्रक्रिया है। हम साथ-साथ ही जीतते या हारते हैं.

लोकतांत्रिक प्रकृति के लिए व्यवहार की मर्यादा और विरोधाभासी नजरियों को बर्दाश्त करना आना चाहिए. संसद अपने कैलेंडर और लय से चलेगी. उन्होंने कहा कि कभी कभार यह लय बिना तान की लग सकती है लेकिन लोकतंत्र में हमेशा फैसले का दिन आता है और वह होता है चुनाव. संसद जनता और भारत की आत्मा है. हम इसके अधिकारों और कर्तव्यों को अपने जोखिम पर चुनौती देते हैं।

मुखर्जी ने कहा कि वह उपदेश देने की भावना से यह बात नहीं कह रहे हैं बल्कि वह उन अस्तित्वपरक मुद्दों की बेहतर समझ की अपील कर रहे हैं, जो सांसारिक मुखौटे के पीछे छिपे रहते हैं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र को जवाबदेही की महान संस्था ‘स्वतंत्र चुनावों’ के जरिए शिकायतों के समाधान के लिए बेहतरीन अवसर का वरदान प्राप्त है।

मुखर्जी ने कहा कि सीमाओं पर सतर्कता की आवश्यकता है और वह अंदरूनी सतर्कता से मेल खाती होनी चाहिए। हमें अपने राजतंत्र, न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका के उन क्षेत्रों में विश्वसनीयता बरकरार रखनी चाहिए जहां शायद संतोष, थकान या जनसेवक के गलत आचरण के कारण काम रुका हुआ हो। अर्थव्यवस्था का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि विकास दर 1947 में एक प्रतिशत की वाषिर्क औसत दर से पिछले सात सालों में आठ प्रतिशत तक जा पहुंची है।

उन्होंने अपने भाषण में दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ (दक्षेस) के महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि 27 साल पहले बना यह मंच आतंकवादियों के खिलाफ लडाई का उपयुक्त जवाब है। मुखर्जी ने कहा कि दक्षेस को अपना जनादेश पूरा करने के लिए जोश हासिल करना चाहिए. आतंकवादियों के खिलाफ साझा लड़ाई में इसे एक बड़े हथियार के रूप में काम करना चाहिए।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.