Loading...
You are here:  Home  >  मीडिया  >  Current Article

अब जायज़ लग रहा है सोशल मीडिया पर लगाम कसना

By   /  August 20, 2012  /  No Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

उत्तर पूर्व के लोगों को धमकाने पर चेती सरकार, फेसबुक यूजर्स में भी आई जागृति

आज जब सोशल मीडिया के दुरुपयोग की वजह से उत्तर पूर्व के लोगों का देश के विभिन्न प्रांतों से बड़े पैमाने पर पलायन हो रहा है और सरकार की ओर से सुरक्षा की बार-बार घोषणा का भी असर नहीं हो रहा तो लग रहा है कि वाकई सोशल मीडिया पर नियंत्रण की मांग जायज है। इससे पूर्व केन्द्रीय दूरसंचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री कपिल सिब्बल ने जैसे ही यह कहा था कि उनका मंत्रालय इंटरनेट में लोगों की छवि खराब करने वाली सामग्री पर रोक लगाने की व्यवस्था विकसित कर रहा है और सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स से आपत्तिजनक सामग्री को हटाने के लिए एक नियामक व्यवस्था बना रहा है तो बवाल हो गया था। अभिव्यक्ति की आजादी के पैरोकार बुद्धिजीवी इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश के रूप में परिभाषित करने लगे, वहीं मौके का फायदा उठा कर विपक्ष ने इसे आपातकाल का आगाज बताना शुरू कर दिया था। अंकुश लगाए जाने का संकेत देने वाले केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल को सोशल मीडिया पर जम कर गालियां बकी जा रही थीं कि वे नेहरू-गांधी परिवार के तलुए चाट रहे हैं। सिब्बल के बयान को तुरंत इसी अर्थ में लिया गया कि वे सोनिया व मनमोहन सिंह के बारे में आपत्तिजनक सामग्री हटाने के मकसद से ऐसा कर रहे हैं। एक न्यूज चैनल ने तो बाकायदा न्यूज फ्लैश में इसे ही हाइलाइट करना शुरू कर दिया, हालांकि दो मिनट बाद ही उसने संशोधन किया कि सिब्बल ने दोनों का नाम लेकर आपत्तिजनक सामग्री हटाने की बात नहीं कही है। हालांकि सच यही था कि नेहरू-गांधी परिवार पर अन्ना हजारे व बाबा रामदेव के समर्थकों सहित हिंदूवादी संगठन अभद्र और अश्लील टिप्पणियां कर रहे थे और अब भी कर रहे हैं, इसी वजह से अंकुश लगाए जाने का ख्याल आया था। यह बात दीगर है कि बीमार मानसिकता के लोग अन्ना व बाबा को भी नहीं छोड़ रहे। सांप्रदायिक विद्वेष फैलाने वाली सामग्री के साथ अश्लील फोटो भी खूब पसरी हुई है।
असल में ऐसा प्रतीत होता है कि सोशल मीडिया के मामले में हम अभी वयस्क हुए नहीं हैं। हालांकि इसका सदुपयोग करने वाले भी कम नहीं हैं, मगर अधिसंख्य यूजर्स इसका दुरुपयोग कर रहे हैं। केवल राजनीतिक टिप्पणियां ही नहीं, बल्कि अश्लील सामग्री भी जम कर परोसी जा रही है। लोग बाबा रामदेव और अन्ना तक को नहीं छोड़ रहे। लोगों को लग रहा है कि जो बातें प्रिंट व इलैक्ट्रॉनिक मीडिया पर आचार संहिता की वजह से नहीं आ पा रही, सोशल मीडिया पर बड़ी आसानी से शेयर की जा सकती है। और शौक शौक में लोग इसके मजे ले रहे हैं। साथ ही असामाजिक तत्व अपने कुत्सित मकसद से उसका जम कर दुरुपयोग कर रहे हैं। आपको याद होगा कि चंद माह पहले ही भीलवाड़ा में भी एक धर्म विशेष के बारे में घटिया टिप्पणी की वजह से सांप्रदायिक तनाव उत्पन्न हो गया था। मगर चूंकि कोई बड़ी वारदात नहीं हुई, इस कारण न तो सरकार चेती न ही इंटरनेट कंपनियां। उलटे अभिव्यक्ति की आजादी की पैरवी करने वाले हावी हो रहे थे कि सरकार केवल नेहरू-गांधी परिवार को बचाने के लिए ही अंकुश की बातें कर रही है। आज जब इसी सोशल मीडिया का उपयोग  उत्तर पूर्व के लोगों को धमकाने के लिए किया जा रहा है और वे अखंड भारत में अपने राज्य की ओर पलायन करने को मजबूर हैं तो राजनीतिक दलों को भी लग रहा है कि इस पर अंकुश लगाया जाना चाहिए। समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता रामगोपाल यादव सहित अन्य ने तो बाकायदा संसद में मांग उठाई। सरकार ने भी इंटरनेट कंपनियों को नफरत फैलाने वाली सामग्री हटाने को कहा है। गृह मंत्रालय ने फेसबुक, ऑरकुट व ट्विटर जैसे सोशल साइट पर भी नजर रखने को कहा है। कुछ जागरूक फेसबुक यूजर्स भी दुरुपयोग नहीं करने की अपील कर रहे हैं।
आपको याद होगा कि पूर्व में जब सोशल मीडिया पर लगाम कसने की खबर आई तो उस पर देशभर के बुद्धिजीवियों में जम कर बहस छिड़ गई थी। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की दुहाई देते हुए जहां कई लोग इसे संविधान की मूल भावना के विपरीत और तानाशाही की संज्ञा दे रहे थे, वहीं कुछ लोग अभिव्यक्ति की आजादी के बहाने चाहे जिस का चरित्र हनन करने और अश्लीलता की हदें पार किए जाने पर नियंत्रण पर जोर दे रहे थे।
वस्तुत: पिछले कुछ सालों में हमारे देश में इंटरनेट व सोशल नेटवर्किंग साइट्स का चलन बढ़ रहा है। आम तौर पर प्रिंट और इलैक्ट्रॉनिक मीडिया पर जो सामग्री प्रतिबंधित है अथवा शिष्टाचार के नाते नहीं दिखाई जाती, वह इन साइट्स पर धड़ल्ले से उजागर हो रही है। किसी भी प्रकार का नियंत्रण न होने के कारण जायज-नाजायज आईडी के जरिए जिसके मन जो कुछ आता है, वह इन साइट्स पर जारी कर अपनी कुंठा शांत कर रहा है। अश्लील चित्र और वीडियो तो चलन में हैं ही, धार्मिक उन्माद फैलाने वाली सामग्री भी पसरती जा रही है।
जहां तक अभिव्यक्ति की आजादी का सवाल है, मोटे तौर पर यह सही है कि ऐसे नियंत्रण से लोकतंत्र प्रभावित होगा। इसकी आड़ में सरकार अपने खिलाफ चला जा रहे अभियान को कुचलने की कोशिश कर सकती है, जो कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए घातक होगा। लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या अभिव्यक्ति की आजादी के मायने यह है कि फेसबुक, ट्विटर, गूगल, याहू और यू-ट्यूब जैसी वेबसाइट्स पर लोगों की धार्मिक भावनाओं, विचारों और व्यक्तिगत भावना से खेलने तथा अश्लील तस्वीरें पोस्ट करने की छूट दे दी जाए? व्यक्ति विशेष के प्रति अमर्यादित टिप्पणियां और अश्लील फोटो जारी करने दिए जाएं? किसी के खिलाफ भड़ास निकालने की खुली आजादी दे दी जाए? सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर इन दिनों जो कुछ हो रहा है, क्या उसे अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर स्वीकार कर लिया जाये?
राजनीतिक दृष्टिकोण से हट कर भी बात करें तो यह सवाल तो उठता ही है कि क्या हमारा सामाजिक परिवेश और संस्कृति ऐसी अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर आ रही अपसंस्कृति को स्वीकार करने को राजी है? माना कि इंटरनेट के जरिए सोशल नेटवर्किंग के फैलते जाल में दुनिया सिमटती जा रही है और इसके अनेक फायदे भी हैं, मगर यह भी कम सच नहीं है कि इसका नशा बच्चे, बूढ़े और खासकर युवाओं के ऊपर इस कदर चढ़ चुका है कि वह मर्यादाओं की सीमाएं लांघने लगा है। अश्लीलता व अपराध का बढ़ता मायाजाल अपसंस्कृति को खुलेआम बढ़ावा दे रहा है। जवान तो क्या, बूढ़े भी पोर्न मसाले के दीवाने होने लगे हैं। इतना ही नहीं फर्जी आर्थिक आकर्षण के जरिए धोखाधड़ी का गोरखधंधा भी खूब फल-फूल रहा है। साइबर क्राइम होने की खबरें हम आए दिन देख-सुन रहे हैं। जिन देशों के लोग इंटरनेट का उपयोग अरसे से कर रहे हैं, वे तो अलबत्ता सावधान हैं, मगर हम भारतीय मानसिक रूप से इतने सशक्त नहीं हैं। ऐसे में हमें सतर्क रहना होगा। सोशल नेटवर्किंग की  सकारात्मकता के बीच ज्यादा प्रतिशत में बढ़ रही नकारात्मकता से कैसे निपटा जाए, इस पर भी गौर करना होगा।
-तेजवानी गिरधर

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

About the author

अजमेर निवासी लेखक तेजवानी गिरधर दैनिक भास्कर में सिटी चीफ सहित अनेक दैनिक समाचार पत्रों में संपादकीय प्रभारी व संपादक रहे हैं। राजस्थान श्रमजीवी पत्रकार संघ के प्रदेश सचिव व जर्नलिस्ट एसोसिएशन ऑफ राजस्थान के अजमेर जिला अध्यक्ष रह चुके हैं। अजमेर के इतिहास पर उनका एक ग्रंथ प्रकाशित हो चुका है। वर्तमान में अपना स्थानीय न्यूज वेब पोर्टल संचालित करने के अतिरिक्त नियमित ब्लॉग लेखन भी कर रहे हैं।

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

You might also like...

एक जज की मौत : The Caravan की सिहरा देने वाली वह स्‍टोरी जिस पर मीडिया चुप है..

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: