/यह खेल बहुत खतरनाक है…

यह खेल बहुत खतरनाक है…

– सतीश चन्द्र मिश्र
शनिवार 18 अगस्त को देर शाम कुछ न्यूज चैनलों पर चल रही ब्रेकिंग न्यूज में बताया जा रहा था कि पूर्वोत्तर भारतीयों को धमकी वाला एसएम्एस पाकिस्तान से भेजा गया था.
अतः इससे यह स्पष्ट हो गया कि एक सोची समझी रणनीति के तहत 4-5 दिनों तक देश को सह्माने की साज़िश रचने वाला शायद अब कभी पकड़ में नहीं आएगा.
यह खेल बहुत खतरनाक है और खूब सोच समझ कर भारी भरकम तैय्यारियों के साथ शुरू किया गया है.
इस खेल की शुरुआत करने वालों को इसमें जोरदार प्रारम्भिक जीत भी मिली है.
अपने षड्यंत्र, अपनी साज़िश में वे पूरी तरह सफल हुए हैं.
पिछले तीन चार दिनों में जेट गति से घटे राजनीतिक सामाजिक घटनाक्रमों के तार जोड़कर उनपर नज़र दौड़ाइए तो स्थिति स्पष्ट होने लगती है.
पिछले वर्ष एक प्रमुख साप्ताहिक समाचार पत्र चौथी दुनिया ने विस्तृत तर्कों-तथ्यों के साथ बीस लाख करोड़ से भी अधिक के कोयला घोटाले का सनसनीखेज रहस्योदघाटन किया था.
देश में हडकम्प मच गया था. परिणामस्वरूप सक्रिय हुई सीएजी ने भी अपनी जांच की प्रारम्भिक रिपोर्ट में दस लाख करोड़ से अधिक के घोटाले की पुष्टि की थी.
बीते मई माह में सीएजी ने कोयला घोटाले से सम्बन्धित अपनी फाइनल रिपोर्ट सरकार को सौंप दी थी लेकिन सरकार ने उस समय चल रहे सत्र में संसद से झूठ बोलकर उस फाइनल रिपोर्ट को संसद के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया था.
लेकिन ये बात छुप नहीं पायी थी. परिणामस्वरुप केंद्र सरकार यह जान गयी थी कि इन दिनों चल रहे मानसून सत्र में उसे वो रिपोर्ट संसद में प्रस्तुत करनी ही होगी.
क्योंकि कोयले की आड़ में लाखों करोड़ की जो लूट पिछले आठ सालों के दौरान हुई उसमे 5 साल से अधिक समय तक कोयला मंत्रालय का कार्यभार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पास ही था.
अतः इस रिपोर्ट पर पूरे देश में जोरदार ऐतिहासिक हंगामा मचना, सरकार और उसके “सरदार” की थू थू होना निश्चित था.
अतः रणनीति बनी कि इस रिपोर्ट पर से देश का ध्यान कैसे हटाया जाया..? इस रिपोर्ट की देशव्यापी चर्चा को कैसे रोका जाए.?
और इस रणनीति पर अमल की शुरुआत हुई रिपोर्ट सदन में रखने से ठीक एक हफ्ते पहले.
मुंबई में एक गुमनाम साम्प्रदायिक संगठन ने “असम दंगों” को लेकर हिंसा का नंगा नाच किया.
देश का ध्यान उस तरफ केन्द्रित हुआ. निकट भविष्य में देश में ऐसी और घटनाओं कि पुनरावृत्ति की आशंका से सहमा देश अभी संभल भी नहीं सका था कि गुमनाम फोन कालों से मिली रहस्यमय संदिग्ध धमकियों से सिहरे पूर्वोत्तर भारतीयों द्वारा मुंबई,पुणे,बैंगलोर, हैदराबाद से हजारों की संख्या में बदहवास पलायन के समाचारों से समूचे देश में सनसनी फ़ैल गयी. इस देशव्यापी सनसनी में पेट्रोल डालने का काम किया कुछ चुनिन्दा न्यूज चैनलों ने.
संभवतः इस पूरी रणनीति में उनकी भी भूमिका पूर्व निर्धारित थी. इस देशव्यापी सनसनी की सिहरन जब चरम पर पहुंची तो उसी दौरान 17 अगस्त को वो रिपोर्ट संसद में प्रस्तुत की गयी,
संयोग देखिये की जिस समय ये रिपोर्ट सदन में प्रस्तुत की जा रही थी. उसी समय देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ समेत कानपुर, इलाहाबाद जैसे तीन बड़े महानगरों में गुमनाम संगठनों के गुंडों ने “असम हिंसा” के विरोध की आड़ में सड़कों पर बेख़ौफ़ होकर साम्प्रदायिक हिंसा का नंगा नाच प्रारम्भ कर दिया था.
आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि तीनों शहरों में घंटों तक होते रहे तालिबानी तांडव में मीडियाकर्मी और पुलिसकर्मी सड़कों पर सरेआम बुरी तरह पीटे गए सैकड़ों लोग घायल हुए, लूटे गए लेकिन तीनों शहरों में ना तो किसी को गिरफ्तार किया गया न किसी कि खिलाफ रिपोर्ट लिखी गयी. बाद में जबर्दस्त चौतरफा आलोचनाओं के दबाव में इस पूरे घटनाक्रम के खिलाफ लगभग 30 घंटे बाद जो रिपोर्ट लिखी गयी वह 15000 अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ लिखी गयी.
जबकि प्रतिबन्ध की धज्जियां उड़ाते हुए इन दंगाइयों का जुलूस निकलने वाली संस्था और उसके संचालक मौलाना से राजधानी लखनऊ की पुलिस बखूबी परिचित थी. आश्चर्यजनक रूप से लखनऊ कानपूर इलाहाबाद में दंगाइयों के प्रति उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा दिखाई गयी इस जबर्दस्त दरियादिली का कोई भी गलत सही स्पष्टीकरण खुद सरकार भी नहीं दे सकी है. लेकिन सौभाग्य से इसके बावजूद साम्प्रदायिक हिंसा और तनाव भड़काने के प्रयास सफल नहीं हो सके.
हाँ इतना अवश्य हुआ कि कोयला घोटाले की सीएजी रिपोर्ट पर इन दंगों की खबरें बहुत भारी पडीं.
कोयला घोटाले को जनता की अदालत से पहले ही सरकारी जांचों की फाइलों के कब्रिस्तान में दफ़न करने की रणनीति के प्रारम्भिक दौर में इस रणनीति के निर्माताओं को फिलहाल भारी सफलता मिली है.
कुछ चुनिन्दा न्यूज चैनलों ने भी रणनीति के अनुरूप ही अपनी भूमिका का जबर्दस्त निर्वाह किया, परिणामस्वरूप इन दिनों केंद्र सरकार जिस सोशल मीडिया से बुरी तरह भयभीत दिख रही है उस सोशल मीडिया पर भी असम के दंगों, पूर्वोत्तर भारतीयों के पलायन तथा मुंबई एवं उत्तरप्रदेश की साम्प्रदायिक हिंसा के समाचार ही छाए हुए हैं. कोयला घोटाले में हुई लूट और उसके जिम्मेदार लुटेरों की चर्चा उस सोशल मीडिया में भी बहुत कम है.
अब क्या यह केवल संयोग ही है कि, उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार है और इनदिनों केंद्र में समाजवादी पार्टी केंद्र सरकार के सर्वाधिक विश्वसनीय राजनीतिक मित्रों के समूह की सर्वाधिक चर्चित सदस्य है.
इसका फैसला देश की उस जनता के विवेक पर जिसकी गाढ़ी कमाई के लाखों करोड़ रुपये कोयला घोटाले और एयरपोर्ट घोटाले की आड़ में लूट लिए गए.?

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.