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हिमाचल में कैसे बनेगी तीसरे राजनीतिक विकल्प की सम्भावना

By   /  August 21, 2012  /  2 Comments

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-विनायक शर्मा||
देव भूमि हिमाचल प्रदेश की विधानसभा का कार्यकाल यूँ तो 13 जनवरी 2013 को समाप्त होने जा रहा है व इसके साथ ही नई विधानसभा के लिए चुनाव भी निश्चित ही हैं. सूत्रों की मानें तो यह चुनाव इस वर्ष अक्टूबर या नवम्बर माह में संपन्न करवाए जा सकते हैं. प्रदेश के दोनों बड़े दलों, भाजपा व कांग्रेस में चल रही अंतर्कलह व आन्तरिक सर-फुट्टवल के मध्य तीसरे राजनीतिक विपल्प के रूप में तीसरे मोर्चे या गठबंधन के उदय की प्रबल सम्भावना राजनीतिक हलकों में व्यक्त की जा रही हैं.
हिमाचल में 1977 तक कांग्रेस के एकछत्र शासन के कई मोर्चों पर विफल रहने के फलस्वरूप ही पहले जनतापार्टी और बाद में भाजपा को प्रदेश की जनता ने कांग्रेस के विकल्प के रूप में सत्ता के सिंहासन पर बैठाया था.

प्रदेश के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए सर्वप्रथम यह प्रश्न उठता है कि क्या वास्तव में प्रदेश की जनता भाजपा और कांग्रेस से निजात पाना चाहती है ? यदि हाँ, तो क्या प्रदेश में इस दोनों दलों के अतिरिक्त ऐसा कोई तीसरा बड़ा दल या सशक्त और विश्वसनीय गठबंधन है जो जनाकांक्षाओं पर खरा उतरे सके ? भाजपा व कांग्रेस के असफल होने की स्थिति में तीसरे राजनीतिक विकल्प के अस्तित्व में आने की सम्भावना पर चर्चा करने से पूर्व जरा देश के पहले और दूसरे मोर्चे के ईतिहास पर भी नजर दौड़ते चलें.

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही केंद्र व प्रदेशों पर शासन करनेवाली कांग्रेस की गलत नीतियों और विफलताओं के चलते जनता में बढते विरोध के कारण ७० के दशक तक आते-आते अमेरिका और ब्रिटेन की भांति भारत में भी दो-दलीय राजनीतिक व्यवस्था की सम्भावना तलाशते हुए, कांग्रेस के विकल्प के रूप में प्रदेशों के साथ-साथ केंद्र में भी दूसरे विकल्प की सम्भावना तलाशी जाने लगी थी जो न केवल कांग्रेस को टक्कर दे सके बल्कि एक सशक्त विकल्प के रूप में शासन-सत्ता संभाल कर विकास और उन्नति की बयार का लाभ समान रूप से सभी देशवासियों तक पहुंचा सके. परन्तु राष्ट्रीय स्तर पर किसी सशक्त दल के नहीं होने के कारण ही समान विचारधारा वाले दलों का गठबंधन या दलों का विलय कर एक नए दल के बनाये जाने की सम्भावना तलाश की जाने लगी.

यूँ तो 60 के दशक में  उत्तरप्रदेश में संयुक्त विधायक दल के नाम से कई दलों का गठबंधन बना कर दूसरे राजनीतिक विकल्प का प्रयोग तो अवश्य किया गया, परन्तु संविद की सरकार अधिक दिनों तक चल नहीं पाई थी. 70 के दशक में कांग्रेस के प्रति बढते विरोध के उस दौर में ही जेपी आन्दोलन, इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध घोषित करनेवाला इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय और देश में आपातकाल की घोषणा आदि के  चलते देश की  राजनीतिक  घटनाक्रम ने कुछ इस कदर पल्टा खाया जिसने देश के राजनीतिक परिदृश्य का वर्तमान व भविष्य ही बदल कर रख दिया. आपातकाल के दौरान ही जेलों में जनतापार्टी नाम के राजनीतिक दल को जन्म देने का विचार पैदा हुआ और 1977 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के सपनों को साकार करने के लिए भारतीय जनसंघ, कांग्रेस ( ओ ), सोशलिस्ट पार्टी व लोकदल आदि चार बड़े दलों का विलय कर जनतापार्टी  का गठन हुआ. जनतापार्टी ने 1977 को संपन्न हुए लोकसभा के चुनावों में अप्रत्याशित रूप  से  295 सीटों पर विजय प्राप्त कर 24 मार्च 1977 को मोरारजीभाई देसाई के प्रधानमंत्रित्व में पहली बार केंद्र में गैरकांग्रेसी सरकार ने लोकतान्त्रिक परिवर्तन के तहत सत्ता का अधिग्रहण किया. विचारधारा व नेताओं के अहम् के टकराव व पूर्व जनसंघ के सदस्यों पर दोहरी सदस्यता के नाम पर जुलाई 1979 में जनतापार्टी के विघटन के साथ ही केंद्र में मोरारजीभाई देसाई के प्रधानमंत्रित्व में बनी जनता पार्टी की सरकार भी 28 जुलाई 1979 को धराशाही हो गई.

समाजवादियों द्वारा उठाये गए दोहरी सदस्यता के प्रश्न पर जनतापार्टी से निकाले गए पूर्व भारतीय जनसंघ के सदस्यों ने भारतीय जनता पार्टी के नाम से एक नया दल बना देश के समक्ष स्वयं को कांग्रेस के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया. दूसरी ओर हिमाचल में शांता कुमार के मुख्यमंत्रित्व वाली अंतरद्वन्द्ध में उलझी विभिन्न विचारधाराओं के 53 विधायकों वाली जनतापार्टी की सरकार का भी 14 फरवरी 1980 को पतन हो गया. इस सब उथल-पुथल के मध्य देश व अन्य राज्यों की तरह हिमाचल में भी भारतीय जनता पार्टी के रूप में कांग्रेस के स्थापित एकाधिकार में सेंध लगाते हुए राष्ट्रीय स्तर का एक सशक्त दल विकल्प के रूप में जनता के समक्ष खड़ा हो गया. देश की राजनीति में चल रहे संक्रमण काल व गठबंधन के दौर में भाजपा ने जिस तेजी से विकल्प के रूप में कांग्रेस का स्थान अधिग्रहण करने का काम किया उसी तेजी से उसने कांग्रेस को खोखला  कर  रहीं सत्ता की तमाम बिमारियों व बुराइयों को भी विरासत के रूप में अपनाने व अपने आचरण में समाहित करने में तनिक भी गुरेज नहीं किया. इन्हीं सब कारणों के परिणामस्वरूप ही आज भाजपा को कांग्रेस से अधिक अंतर्द्वंद और अंतर्कलह से भी जुझना पड़ रहा है. हिमाचल की भारतीय जनता पार्टी के लिए यह विडम्बना ही कहा जायेगा कि विपक्षियों के साथ-साथ स्वदलियों द्वारा वंशवाद-परिवारवाद व भ्रष्टाचार के साथ ही चरम सीमा की गुटबाजी और अनुशासनहीनता आदि सत्ता की तमाम बुराइयों व बीमारियों के आरोप लगाये जा रहे हैं जिसके कारण ही जनता ने कांग्रेस से निजात पाने के लिए एक सशक्त विकल्प के रूप में भाजपा को सत्ता तक पहुँचाया था.
राजीव गांधी की हत्या के बाद से ही केंद्र में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने पर भाजपा ने कांग्रेस विरोद्धी कुछ दलों के साथ एक साँझा कार्यक्रम के आधार पर चुनाव पूर्व समझौता कर एनडीए का गठन किया और केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व में सरकार चलाई. 2004 के आम चुनावों के बाद कांग्रेस के नेतृत्व में भी इसी प्रकार से यूपीए का गठन किया गया जो केंद्र में लगातार अपनी दूसरी सरकार का कार्यकाल पूरा कर रही है. एनडीए और यूपीए की तर्ज पर केंद्र में तीसरे विकल्प की चर्चा यदा-कदा चल पड़ती है. कांग्रेस और भाजपा की कार्यप्रणाली में कोई विशेष अंतर न पाकर या यूँ कहा जाये कि इन दोनों दलों से निराश होकर ही देश के साथ-साथ हिमाचल में भी तीसरे राजनीतिक विकल्प की सम्भावना को प्रबुद्ध चिंतकों की चर्चाओं में स्थान मिलना स्वाभाविक ही है.
हिमाचल प्रदेश में तीसरे राजनीतिक विकल्प की सम्भावना की चर्चा करने से पूर्व प्रदेश के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में यह आवश्यकता किस प्रकार से मूर्तरूप ले सकती है इस सम्भावना पर निष्पक्ष रूप से चर्चा करना आवश्यक है. निष्पक्ष व इमानदारी से यदि आंकलन किया जाये तो वर्तमान में ऐसी कोई सम्भावना दूर-दूर तक नजर नहीं आती जिसके चलते कोई भी दल या गठबंधन तीसरा विकल्प बन कर उभर सके. हाँ, इतना तो स्पष्ट है कि यदि भाजपा और कांग्रेस जैसे बड़े और राष्ट्रीयदल अपनी कार्यप्रणाली को सुधारते हुए जनआकांक्षाओं और अपेक्षाओं पर सही नहीं उतरेंगे तो कांग्रेस के विकल्प के रूप में भाजपा को मान्यता देनेवाली जनता-जनार्दन अन्तोगत्वा भविष्य में बिना किसी संशय के इन दोनों दलों को दरकिनार करते हुए किसी तीसरे सक्षम दल, मोर्चे या गठबंधन के हाथ सत्ता की चाबी देने में तनिक भी गुरेज नहीं करेगी. कुछ प्रदेशों में राष्ट्रीय दलों को नकारते हुए क्षेत्रीय या प्रादेशिक दलों या उनके गठबंधन का बढता जनाधार और सत्ता पर काबिज होना इस बात का प्रमाण है और उत्तरप्रदेश इसका ज्वलंत उदाहरण.

क्रमशः

(विनायक शर्मा, मंडी, हिमाचल से प्रकाशित साप्ताहिक अमर ज्वाला के संपादक हैं)

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 Comments

  1. we will come back with honourable…raja sahab…..we can say with proud……

  2. no comment about the elections..only wait.

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