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हिमाचल में कैसे बनेगी तीसरे राजनीतिक विकल्प की सम्भावना-भाग 2

By   /  August 23, 2012  /  1 Comment

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-विनायक शर्मा||

आज हिमाचल में तीसरे राजनीतिक विकल्प की तलाश अवश्य ही प्रबुद्ध मतदाताओं को चिंतन पर मजबूर करती होगी कि क्या भाजपा और कांग्रेस पार्टी  जनआकांक्षाओं की कसौटी पर पूर्ण रूप से विफल हो गए है ? या फिर इस सम्भावना की तलाश के पीछे कहीं इन बड़े दलों के बागियों व शिमला महापौर के पद पर विजय पताका फहरानेवाली मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी का अति आत्मविश्वासी होना तो नहीं है ?  तीसरे विकल्प की आवश्यकता के लिए उठ रही आवाज को समझने के लिए इसकी सम्भावना और इसको मूर्तरूप देने के लिए कुछ आवश्यक तत्वों पर भी चिंतन करना आवश्यक है.
हिमाचल प्रदेश में तीसरे विकल्प के उद्गम की सम्भावना व्यक्त करने वालों को प्रदेश के निकट भविष्य में होने वाले विधानसभा के चुनावों में तीसरे मोर्चे के नाम से खड़े हो रहे दलों की पृष्ठभूमि, प्रदेश की जनता और राजनीति में इन दलों और इनके नेताओं का प्रभाव, पिछले चुनावों में इन दलों द्वारा प्राप्त किये गए मतों की संख्या और प्रतिशत के साथ-साथ आनेवाले चुनावों में प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में गठबंधन के रूप में उनके पक्ष में प्राप्त होने वाले संभावित मतों के पूर्वानुमान पर एक नजर दौड़ानी होगी. शिमला के महापौर और उप-महापौर के पद के लिए माकपा के उम्मीदवारों की हाल में हुई अप्रत्याशित विजय के बाद से ही हिमाचल में तीसरे मोर्चे या गठबंधन के उदय की सम्भावना व्यक्त की जा रही है. परन्तु हमें यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि शिमला के स्थानीय निकाय के चुनावों में कांग्रेस की अंतर्कलह और भीतरघात व महापौर व उपमहापौर पद पर प्रत्याशियों के गलत चयन के कारण ही २५ पार्षदों के चुनावों में जहाँ भाजपा, कांग्रेस व माकपा ने क्रमशः १८८४८, १७६२४ और १०२९७ मत प्राप्त किये थे वहीँ महापौर व उप-महापौर के चुनाव में माकपा ने  २१९०३ व २११९५ मत प्राप्त कर अपनी जीत सुनिश्चित की थी. भाजपा और कांग्रेस के महापौर व उप-महापौर पद के प्रत्याशियों को इस दौड़ में दूसरे व तीसरे नंबर पर ही संतोष करना पड़ा था. २५ पार्षदों के चुनाव में कुल १८८४८ मत हासिल करनेवाली भाजपा को महापौर व उप-महापौर पद के लिए क्रमशः १४०३५ व १६४१८ मत ही प्राप्त हुए जबकि कांग्रेस को जहाँ २५ पार्षदों के चुनाव में कुल १७६२४ मत मिले वहीँ महापौर व  उप-महापौर के चुनावों में क्रमशः १३२७८ व १३२०५ मतों पर ही संतोष करना पड़ा था.  कांग्रेस को केवल १० वार्डों में समेटते हुए भाजपा ने जहाँ एक ओर १२ वार्डों में पहली बार अपनी विजय पताका फहराने में सफलता प्राप्त की थी वहीँ महापौर व उप-महापौर पद के प्रत्याशियों के चयन में अपने पुराने व कर्मठ कार्यकर्ताओं की अनदेखी करते हुए नए व्यक्तियों को इन पदों के लिए प्रत्याशी बनाने पर कार्यकर्ताओं के असंतोष के कारण ही उसको इन पदों पर पराजय का मुहँ देखना पड़ा था. चूँकि भाजपा व वामदलों का केडर वोट किसी भी सूरत में एक दूसरे के पक्ष को नहीं जाता है इस लिए कोई अन्य विकल्प नहीं होने के कारण भाजपा का रुष्ट वोट कांग्रेस के पक्ष में डाला गया.

कमोवेश कुछ ऐसी ही परिस्थिति से कांग्रेस पार्टी भी झूझ रही थी सो कांग्रेस पार्टी में वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहे मुख्यमंत्री पद के दावेदारों ने पराजय का ठीकरा एक दूसरे के सर फोड़ने के लिए कांग्रेस के प्रत्याशी को हराने के लिए अपने समर्थकों के मत बड़ी संख्या में माकपा के पक्ष में स्थानांतरित करवा दिए ऐसी प्रबल सम्भावना दिखाई देती है. अन्यथा इसके अतिरिक्त और कोई कारण हो ही नहीं सकता जिसके चलते मात्र तीन वार्डों में विजय प्राप्त करनेवाली माकपा की महापौर व उप-महापौर पद पर अप्रत्याशित विजय सुनिश्चित हुई थी. २५ वार्डों वाले शिमला के स्थानीय निकाय के चुनावों में मात्र ३ वार्डों पर जीत हासिल करनेवाली माकपा की महापौर व उप-महापौर पद पर, भाजपा और कांग्रेस की अंतर्कलह व भीतरघात के चलते, हुई विजय को किस दृष्टि से तीसरे मोर्चे के आगास का नाम दिया जा रहा है यह समझ से परे है.
सत्ता व संगठन में अनदेखी के कारण भाजपा को त्याग कर हिमाचल लोकहित पार्टी बनानेवाले भाजपा के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष व पूर्व सांसद महेश्वर सिंह अब वामदलों व भाजपा के रुष्ट कार्यकर्ताओं के सहारे प्रदेश के आगामी विधानसभा के चुनावी अखाड़े में तीसरे विकल्प के रूप में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करवाने को आतुर नजर आ रहे हैं. अपने लक्ष्य में वह कितने सफल हो पाएंगे यह तो भविष्य के गर्भ में छिपा हुआ है, परन्तु यदि निष्पक्ष आंकलन किया जाये तो यह स्पष्ट है कि इस बनाये जा रहे साँझा मोर्चे के लिए अभी शिमला दूर है.
राजनितिक विश्लेषकों की नजर में महेश्वरसिंह का अपने गृह जिले कुल्लू में अवश्य ही एक बड़ा जनाधार है परन्तु भाजपा के बड़े नेता के रूप में उनको वह स्थान कभी प्राप्त नहीं हुआ जो स्थान शांता कुमार, प्रो० धूमल या डा० राजन सुशांत का है. शांता कुमार की पिछले दिनों नाराजगी के चलते शायद महेश्वरसिंह को यह आशा रही होगी कि यदा-कदा रोष-बाण दागनेवाले शांताकुमार भी सत्ता व संगठन में अनदेखी से दुखी होकर भाजपा से नाता तोड़ते हुए हिलोपा में शामिल हो जायेंगे, परन्तु ऐसा हुआ नहीं. दूसरी ओर भले ही कांगड़ा-चंबा के निलंबित भाजपा सांसद राजन सुशांत के बागी और धूमल विरोधी तेवरों को देखते हुए उनके हिलोपा में शामिल होने की सम्भावना से कांगड़ा-चंबा जिलों में भाजपा के कमजोर होने व हिलोपा को मजबूती मिलने की आशा लगती हो, परन्तु पहली बार सांसद बने राजन सुशांत भाजपा से स्वयं त्यागपत्र देकर अपना राजनीतिक भविष्य इतनी जल्दी धूमिल करना कतई नहीं चाहेंगे. इसलिए वह जल्दबाजी में कोई भी आत्मघाती कदम उठाने से अवश्य ही परहेज करेंगे. वैसे भी पार्टी से स्वयं अलग होकर राजन सुशांत का जिला कांगड़ा-चंबा के १७ विधानसभा क्षेत्रों के साथ-साथ प्रदेश के अन्य भागों में कितना प्रभाव रहता है यह भी परखने का विषय है. प्रभाव से मेरा तात्पर्य जीतने की सम्भावना व भाजपा को हरवाने की क्षमता दोनों से है.
अब बड़ा प्रश्न यह उठता है की महेश्वर सिंह की हिलोपा व वाम दलों को मिला कर बनाये जा रहे हिमाचल लोक मोर्चा आनेवाले प्रदेश विधानसभा के चुनावों में अपनी शानदार उपस्थिति दर्ज करवाने व बननेवाली नयी सरकार के निर्माण में अपना कितना अहम सहयोग दे सकता है ? प्रश्न का उत्तर तलाशने के लिए यदि प्रदेश की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में वाम दलों व महेश्वरसिंह की हिलोपा के नेतृत्व में बनाये जा रहे हिमाचल लोक मोर्चा को  मिलनेवाले कुल मतों का अनुमान लगाया जाये तो कोई आशातीत सफलता मिलती दिखलाई नहीं देती. इसके पीछे मुख्य कारण यह दिखाई देता है कि प्रदेश के चुनावी दंगल में हिमाचल लोकहित पार्टी पहली बार उतरने जा रही है और यह चुनाव उसके लिए एक अंधेरी सुरंग से अधिक कुछ नहीं है. वैसे भी कांग्रेस व भाजपा बहुल समर्थकों वाले हिमाचल प्रदेश में गृह जिले कुल्लू से बाहर इस तथाकथित तीसरे मोर्चे के पक्ष में कोई विशेष कामयाबी मिलती दिखाई भी नहीं देती.
क्रमशः

(विनायक शर्मा, मंडी, हिमाचल से प्रकाशित साप्ताहिक अमर ज्वाला के संपादक हैं)

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. Binyak you are a good writer.

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