/आसान नहीं है भाजपा के लिए डगर पनघट की…

आसान नहीं है भाजपा के लिए डगर पनघट की…

।। -उमाकांत पांडेय ।।

मुश्किल है राहें…

कांग्रेस की गलतियों के सहारे मिशन 2014 फतह कर केंद्र में सत्तारूढ़ होने का सपना देख रही भारतीय जनता पार्टी के लिए यह मिशन उतना आसान नहीं है, जितना वह समझ रही है।  भाजपा के पास आज सबसे बड़ा संकट जनाधार वाले नेताओं का है। समस्या यह है कि भाजपा का प्रतिनिधित्व करने वाले जो चेहरे जनता के सामने है उनमे से अधिकांश लोग जमीनी स्तर पर प्राय: फेल है। या यह कहिए कि उन्हें जनता से उस सीमा तक मान्यता नहीं मिल पाई है जितना कि खुद वो समझ रहे हैं। भाजपा के ऐसे बड़े नेता प्राय: पिछले दरवाजे से संसद में प्रवेश किये बैठे हैं। वह भी उन दो-चार राज्यों के सहारे जहाँ भाजपा की सरकार है।

उपरोक्त दावे के समर्थन में सैकड़ो तथ्य बतौर उदाहरण प्रस्तुत किये जा सकते हैं। फ़िलहाल आइए दो-चार तथ्यों पर नज़र डालें। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष माननीय नितिन गड़करी जी आज तक एक भी चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं दिखा सके। संघ की पसंद के दम पर वे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष तो बन गए लेकिन अपने बयानों से पार्टी के लिए अक्सर धर्म संकट ही खड़ा करते आए हैं। माननीय वेंकैया नायडू जी का कुछ ऐसा ही हाल है। वे भी राज्य सभा के दम पर ही भाजपा की नेतागिरी कर रहे हैं।

पार्टी के प्राय: सभी महत्वपूर्ण चेहरे राज्यसभा के लिए जोड़-तोड़ कर ही दिल्ली दरबार पहुँच रहे हैं। यहाँ यह देखना भी रोचक होगा कि भाजपा के पास कुल कितने राज्यों का शासन है जिसके दम पर पार्टी के नेतागण राजयोग भोगने के लिए जोड़-तोड़ में लगे रहते हैं। यहाँ यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि पार्टी को नए सिरे से जनाधार देने की जगह पार्टी के वरिष्ठ जन भग्नावशेषों पर कब्जे की लड़ाई लड़ रहे हैं। वह भी जिन राज्यों में पार्टी का शासन है वहां के स्थानीय क्षत्रपों के भरोसे।

अब जरा पार्टी की पूरे देश में क्या स्थिति है इस पर भी एक नज़र डालते चलें। अभी पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में कुल 800 सीटों में से पार्टी दहाई का आंकड़ा भी नहीं छू पाई। पूर्वोत्तर क्षेत्रों से लेकर दक्षिण तक में कर्नाटक को छोड़कर भाजपा कहीं नहीं दिखती है। जबकि इन क्षेत्रों में लोकसभा की लगभग 200 सीटें हैं। “हिंदी बेल्ट के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में मात्र 10-11 सीटें लेकर पार्टी चौथे स्थान पर है. मिशन 2014 कैसे पूरा होगा?” यह एक यक्ष प्रश्न है।

झारखण्ड, जहाँ भाजपा सत्ता में है. वहां अभी सम्पन्न जशेदपुर उपचुनाव में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष दिनेशानंद गोस्वामी अपनी जमानत भी नहीं बचा सके। छत्तीसगढ़ के प्रदेश अध्यक्ष रामसेवक पैंकरा जी भी धरती पकड़ कहे जा सकते हैं। वे चार में से तीन विधानसभा चुनाव हार चुके हैं। कुछ अन्य बड़े नेताओं कि फाइलें भी टटोलते चलें। छत्तीसगढ़ के प्रभारी रह चुके धर्मेन्द्र प्रधान उड़ीसा के मुख्यमंत्री पद के दावेदार होते हुए भी अपनी सीट नहीं बचा सके, शेष क्या कहना?

पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिह एक विधानसभा के अलावा जीवन भर लोक सभा चुनाव हारे। अभी का लोकसभा चुनाव जीते भी तो अजीत सिंह से गठबंधन करके जिन्होंने भाजपा को हमेशा गालियाँ दी। इसी प्रकार नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज अपने गृहक्षेत्र हरियाणा से तीन बार पटखनी खा चुकी हैं। हरियाणा के ही कॅप्टन अभिमन्यु लोकसभा, विधानसभा हार चुके हैं। मुख़्तार अब्बास नकवी भाजपा में अल्पसंख्यकों सबसे चमकते सितारे होते हुए भी रामपुर से जमानत जब्त करा चुके हैं। महिलाओं की मुख्य नेता करुणा शुक्ला, छत्तीसगढ़, कोरबा से अभी भाजपा लहर के बावजूद अपनी फज़ीहत करा चुकीं हैं, जबकि शेष सभी सीटों पर भाजपा ने अपना परचम लहराया था।

नजमा हेपतुल्ला ने आज तक हमेशा बैकडोर एंट्री की ही जुगत लगाई है। लड़ने की हिम्मत जुटा ही नहीं सकीं। यही हाल रवि शंकर प्रसाद और अरुण जेटली का है जो चुनाव लड़ने से कतराते रहे हैं। दिल्ली के विजय गोयल से इधर कई चुनावों में विजय हमेशा दूर रही और “हार” ही उनके गले पड़ी। हिंदूवादी मुखरता के प्रतिक विनय कटियार रायबरेली से जमानत तक नहीं बचा सके. दो बार चुनाव हारे हैं। अब बताएं अकेले आडवाणी और अटल के सहारे भाजपा की कागजी नाव कहाँ तक तैरेगी? वह भी छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, उत्तराखंड, कर्नाटक, गुजरात, झारखण्ड, हिमाचल प्रदेश तथा कुछ और गठ्बंधनी राज्यों के सहारे। भाजपा में ग्रामीण महिलाओं का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। जमीनी स्तर के नेताओं का सर्वथा अभाव है। इसके बाद भी भाजपा चाहे तो शौक से गुमान कर सकती है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.