/हिमाचल में कैसे बनेगी तीसरे राजनीतिक विकल्प की सम्भावना – अंतिम भाग

हिमाचल में कैसे बनेगी तीसरे राजनीतिक विकल्प की सम्भावना – अंतिम भाग

-विनायक शर्मा||

अब दूसरी ओर नवनिर्मित हिमाचल लोकमोर्चा के घटक वामदलों के पिछले कुछ वर्षों के रिपोर्ट कार्ड पर यदि  नजर डालें तो वामदलों को १९९० व १९९३ में अवश्य ही विधानसभा की एक-एक सीट पर कामयाबी मिली थी, परन्तु यह भी सत्य है कि प्रदेश के विधानसभा के चुनावों में किसी भी परिस्थिति में वह कभी भी कुल मतदान का २ या 3 प्रतिशत से अधिक मत हासिल नहीं कर पाए. यदि लोकसभा के चुनावों की बात करें तो प्रदेश के चारों निर्वाचन क्षेत्रों में जहाँ २००४ के चुनावों में वामदलों का कोई भी प्रत्याशी मैदान में नहीं था वहीँ २००९ के चुनावों में केवल मंडी लोकसभा चुनाव क्षेत्र से माकपा ने अपना प्रत्याशी चुनाव में उतारा था जो ११,१२,५२४ मतदाताओं वाले मंडी चुनावक्षेत्र में मात्र २०,६६४ मत ही प्राप्त कर सका था. भाजपा व कांग्रेस समर्थकों के मध्य बंटे हिमाचल प्रदेश में नवनिर्मित तथाकथित तीसरे विकल्प को जहाँ अपनी निर्णायक भूमिका व दमदार उपस्थिति दर्ज करवाने के लिए कुल मतदान का कम से कम २० से ३० प्रतिशत मत हासिल करना अनिवार्य होगा वहीँ भाजपा के मिशन रिपीट को डिफीट में बदलने के लिए कम से कम ८ से १२ प्रतिशत मत प्राप्त करने आवश्यक होंगे. यहाँ यह ध्यान देने का विषय है कि तीसरे विकल्प के रूप में उभरने को आतुर हिमाचल लोक मोर्चा द्वारा कम से कम ८ से १२ प्रतिशत मत लेने की स्थित में भी एक ओर जहाँ भाजपा को भारी क्षति होगी वहीँ परोक्ष रूप से इसका लाभ कांग्रेस को ही मिलेगा, वह भी उस परिस्थिति में जब कांग्रेस में भीतरघात के चलते मतों का स्थानान्तरण न हो जैसा कि शिमला महापौर व उप-महापौर के चुनावों में हुआ था. प्रदेश के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए अभी तक तो यही लगता है कि यह तथाकथित तीसरा विकल्प बहुत जोर लगाकर भी २ से ४ विधानसभा क्षेत्रों से अधिक पर अपनी विजय सुनिश्चित नहीं कर पायेगा. लेकिन वहीँ दूसरी ओर भाजपा के प्रत्याशियों के लिए मुसीबत का सबब तो बन ही सकता है. “ना खेलेंगे और ना ही खेलने देंगे” वाली कहावत को प्रदेश की वर्तमान राजनीति में नकारा नहीं जा सकता.
यह पूर्वानुमान वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए तथ्यों व अनुभव पर आधारित है. प्रदेश के हाल में ही संपन्न हुए दो उपचुनावों के नतीजों पर प्रकाशित मेरा स्पष्ट पूर्वानुमान “हो सकती है सीटों की अदला-बदली” भी अक्षरशः सही साबित हुआ था. इसी प्रकार पड़ोसी राज्य पंजाब सहित पांच राज्यों के अभी हाल ही में संपन्न हुए चुनावों पर भी मेरा पूर्वानुमान अक्षरशः सही साबित हुआ था. पंजाब के विषय में मैंने लिखा था कि “मनप्रीतसिंह बादल और वामदलों को मिला कर बनाया गया तथाकथित तीसरा मोर्चा पंजाब के चुनावों में बेअसर साबित  होगा. मनप्रीत और कांग्रेस मिलकर भी शिरोमणी अकालीदल-भाजपा गठबंधन को पुनः सत्ता में आने से रोक सकेगी, ऐसी लेशमात्र भी सम्भावना नहीं है और अकाली-भाजपा गठबंधन ही पंजाब में पुनः सरकार बनाने में सफल होगा.” मेरा पूर्वानुमान सही निकला और आज पंजाब में अकाली-भाजपा गठबंधन की सरकार चल रही है. हिमाचल में चुनावी रणभेरी बजने में अभी कुछ समय शेष है और यह तर्क दिया जा सकता है कि चुनावों तक परिणामों पर प्रभाव डालनेवाले सियासी घटनाक्रम में बहुत से बदलाव आ सकते हैं. इस तर्क पर मैं भी पूर्णरूप से सहमत हूँ. अभी तक के घटनाक्रम से तो यही निष्कर्ष निकलता है कि लगभग पंजाब जैसी परिस्थिति का निर्माण हिमाचल में भी हो रहा है.
हिमाचल में तीसरे विकल्प की सम्भावना पर सुश्री मायावती की बहुजन समाज पार्टी की चर्चा भी न करना न्यायसंगत नहीं होगा क्यूंकि पिछले चुनावों में प्रदेश के कई नामचीन नेताओं ने बसपा के हाथी पर सवार हो विधानसभा में प्रवेश करने का विफल प्रयास किया था. उत्तरप्रदेश में दबंगई से शासन करनेवाली बसपा की हिमाचल की राजनीति में कुम्भकर्णी नींद केवल चुनावों के समय ही खुलती है. हिमाचल में कमजोर संगठन होने के कारण ही चुनावों में वह अपना कोई विशेष प्रभाव दिखाने में असफल रहती है. हिमाचल प्रदेश विधानसभा के २००३ व २००७ के चुनावों में बसपा के क्रमशः २३ और ६७ सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसके प्रत्याशियों ने २००३ में कुल मतदान का २.०२ प्रतिशत और २००७ में ७.३७ प्रतिशत मत प्राप्त करते हुए केवल २००७ में ही मात्र कांगड़ा चुनाव क्षेत्र में सफलता मिली थी. जातिय समीकरण की सम्भावना की दृष्टि से बहुजन समाज पार्टी महेश्वरसिंह के लोक मोर्चे में सम्मिलित होकर इसे और शक्ति प्रदान करतेहुए सशक्त तीसरे विकल्प का स्वरूप देने में अवश्य ही अपना अहम् किरदार निभा सकती है, परन्तु चुनावों में समय कम रहने के कारण अब यह भी संभव नहीं लगता.
हिमाचल लोक मोर्चा के लिए प्रदेश में तीसरे राजनीतिक विकल्प का स्थान प्राप्त करने के लिए अब मात्र एक ही संभावना बचती है जिसे प्रदेश के राजनीतिक धुरंधर स्वीकारने में अवश्य ही असहजता का अनुभव करेंगे. महेश्वरसिंह की भांति ही यदि कांग्रेसपार्टी का कोई ताकतवर असंतुष्ट नेता या गुट, संगठन में लगातार हो रही अनदेखी के कारण कांग्रेस को तिलांजली देकर अपने समर्थकों के साथ अपनी अलग पार्टी बना हिलोपा से गठबंधन कर लेता है तो ऐसी परिस्थिति में भाजपा व कांग्रेस की बिछाई सारी चुनावी बिसात ही पलट जायेगी और इस स्थिति में बनने वाले गठबंधन को सत्ता में आने से कोई भी ताकत नहीं रोक सकेगी. दिखने में यह कठिन तो अवश्य ही लगता है परन्तु राजनीति में सब कुछ संभव है. मराठा नेता शरदपवार, उडीसा के बीजू पटनायक और बंगाल की ममताबनर्जी आदि कांग्रेस त्यागने के पश्चात् अपना दल बना अपने निजी जनाधार के बलबूते पर ही अपने-अपने प्रदेशों में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करवाने में सफल रहे हैं. विश्वसनीय सूत्रों की मानें तो अंतर्कलह से जूझती कांग्रेस में ऐसी ही कुछ सुगबुगाहट चल भी रही है जिससे इस  आशंका को बल मिलता है. ऐसी परिस्थिति में जहाँ एक ओर भाजपा व कांग्रेस की चुनावी रणनीति को एक बड़ा झटका लगेगा वहीँ मतों में होनेवाले बड़े पैमाने के बिखराव के चलते संभव है कि चुनाव के नतीजे अप्रत्याशित व चौकानेवाले हों. इस बदली हुई परिस्थिति में हो सकता है कि इस तीसरे मोर्चे को स्पष्ट बहुमत न मिल सके, परन्तु यह तो निश्चित है कि ऐसी परिस्थिति पैदा करने में यह मोर्चा अवश्य ही सक्षम  होगा जिसके चलते कांग्रेस या भाजपा को मजबूरी में इस तीसरे मोर्चे की सरकार को समर्थन देना पड़े.
कांग्रेस में विघटन न होने की दशा में, प्रदेश के अभी तक के राजनीतिक परिदृश्य का निष्पक्ष आंकलन तो यही कहता है कि भाजपा के पूर्वअध्यक्ष महेश्वरसिंह की हिमाचल लोकहित पार्टी के नेतृत्व में बना हिमाचल लोक मोर्चा अपनी सम्मानजनक उपस्थिति केवल उसी परिस्थिति में दर्ज करवा सकता है यदि कांग्रेस  की  जारी अंतर्कलह  के  चलते भीतरघात होने की  दशा  में  कांग्रेस  का  रुष्ट वोट हिमाचल लोकमोर्चे को मिले न कि भाजपा  को  स्थानांतरित हो. देखने में आ रहा है कि कांग्रेस की वर्तमान अंतर्कलह जहाँ एक ओर कार्यकर्ताओं का मनोबल गिराने का कार्य कर रही है वहीँ प्रदेश के आम मतदातों के मन में भी कांग्रेस के प्रति उदासीनता की  भावना  पैदा कर रही है. यदि यही सब चलता रहा तो ऐसे में असमंजस में पड़े प्रदेश के प्रबुद्ध मतदाताओं के सामने भी दूसरे या तीसरे मोर्चे  की अपेक्षा पहले मोर्चे  यानि सत्तारूढ़  भाजपा के पक्ष में ही मजबूरी में मतदान करने के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प नहीं रहेगा. इसे यूँ भी समझा जा सकता है कि कमजोर तथाकथित तीसरे मोर्चे और कांग्रेस की अंतर्कलह व भीतरघात की सम्भावना के चलते भाजपा की विजय की सम्भावना अधिक बनती है.
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(विनायक शर्मा, मंडी, हिमाचल से प्रकाशित साप्ताहिक अमर ज्वाला के संपादक हैं)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.