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मीडिया दरबार की खबर का असर: ललित भारद्वाज पर मुकद्दमा दर्ज़

खुद को पत्रकार बताने वाले कांग्रेसी नेता ललित भारद्वाज के खिलाफ आखिरकार मेरठ पुलिस को मुकद्दमा दर्ज़ करना ही पड़ा। यह  मुकद्दमा सीबी सीआईडी के इंस्पेक्टर शिवकुमार शर्मा ने दर्ज़ करवाया। ललित पर आरोप है कि उसने फ़रजी आदेश बनवा कर अपनी सुरक्षा के लिए पुलिस से गनर हसिल किया था। 

आपको याद होगा कि अभी कुछ ही दिनो पहले मीडिया दरबार ने ललित की जांच संबंधी फाइल गुम हो जाने की खबर प्रकाशित की थी। खबर है कि उस रिपोर्ट के प्रकाशित होने के बाद पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया था। सीबी सीआईडी के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक अरविंद सेन ने फाइल की तलाश करने और उसपर फौरन कार्रवाई करने के आदेश दिए। अब जाकर सीबी सीआईडी ने ललित के खिलाफ फ़र्जीवाड़ा करने का मुकद्दमा दर्ज़ करवाया है।पिछले साल मेरठ रेंज के डीआईजी अखिल कुमार को राज्य के उप सचिव मदन किशोर श्रीवास्तव का 20 अप्रैल को जारी एक आदेश मिला जिसमें शास्त्री नगर के ललित भारद्वाज को सुरक्षा गार्ड यानि गनर प्रदान करने की अनुशंसा की की गई थी। सारी कानूनी औपचारिकताओं के बाद ललित को 1 मई से एक सरकारी गनर दे दिया गया था। बाद में यह आदेश फर्ज़ी पाया गया और  तब प्रशासन ने सीबी सीआईडी जांच के आदेश दिए थे।

आइए डालते हैं ललित भारद्वाज की ‘बहुमुखी’ शख्शियत पर एक नज़र। मेरठ विश्वविद्यालय के कर्मचारी के पुत्र ललित ने अपना करीयर एक नामी चैनल के रिपोर्टर के शोहदे के तौर पर शुरु किया था। बाद में इसने किसी तरह नलिनी सिंह के कार्यक्रम आंखों-देखी में एंट्री बना ली। उसने आंखों-देखी के नाम पर मेरठ में एक फर्ज़ी मीडिया इंस्टीट्यूट भी शुरु कर दिया जहां कुछ दिन तक बीस-बीस हजार रुपए लेकर रिपोर्टर बनाने का खेल भी चला, लेकिन जब दिल्ली खबर पहुंची तो इसे फौरन गुडबाय कह दिया गया।

कहते हैं ललित बड़े लोगों को ‘खुश’ करने और उसी दम पर डराने तथा अपना काम करवाने का माहिर है। आंखों-देखी के एक पत्रकार के मित्र टोटल टीवी के एक उच्च अधिकारी थे जो रंगीन तबीयत के थे। उस अधिकारी की इस कमजोरी को अपना हथियार बना कर उसने मेरठ की स्ट्रिंगरशिप हासिल कर ली और उन्हें ‘खुश’ करना शुरु कर पश्चिमी उत्तर प्रदेश का प्रमुख बन बैठा। (अभी भी वह खुद को कई जगह इसी हैसियत से पेश करता है)।

बाद में उसने दिल्ली के एक मुस्लिम कांग्रेसी नेता को भी ‘खुश’ कर जिला स्तर पर मीडिया प्रभारी का पद ले लिया। इसके बाद तो मानों वह छोटा-मोटा मंत्री बन गया। हूटर वाली गाड़ी, बॉडीगार्ड और उत्पाती स्वभाव.. इस पर लालकुर्ती थाने में हंगामा करने का मुकद्दमा तो दर्ज़ है ही, अभी हाल ही मे एक गुमनाम शख्स ने इसकी अवैध हूटर वाली गाड़ी की शिकायत मेरठपुलिस के फेसबुक पर कर दी.. इसके बाद से वह गाड़ी कहीं नजर नहीं आती.. शिकायत करने वालों का कहना है कि करीब आठ-दस वर्षों से पुलिस, प्रशासन और आम आदमी सबको परेशान कर रखा है। अगर इससे कोई खुश है तो वे हैं अपराधी, भू-माफ़िया और दलाल, क्योकि इन्हें इसका खुलेआम संरक्षण प्राप्त है।

अब देखना है कि कांग्रेस ललित भारद्वाज के बारे में क्या कहती है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.