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विपक्ष की भूमिका निभा रहा है सोशल मीडिया…

By   /  August 26, 2012  /  6 Comments

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-राजीव गुप्ता||

भारत एक लोकतान्त्रिक देश है. लोकतांत्रिक व्यवस्था अपनाने में हम बहुत ही सौभाग्यशाली रहे क्योंकि हमें लोकतंत्र अपनाने के लिए विश्व के अन्य देशों की तरह संघर्ष नहीं करना पड़ा. 1947 में प्राप्त स्वतंत्रता पश्चात  हमारी संविधान सभा ने जिस संविधान को अंगीकार किया उसी संविधान द्वारा यहाँ के नागरिको को प्रदत्त मूल अधिकारों में से एक अधिकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार भी  सम्मिलित है. देश की एकता और अखंडता को हानि पहुचाने वाले सभी तत्वों से सरकार को सख्ती से निपटना चाहिए क्योंकि यह राष्ट्र-हित की बात है. परन्तु देश की एकता और अखंडता बनाये रखने की आड़ में सरकार अपनी नाकामी छुपाने हेतु जिस तरह से सरकारी तंत्र का प्रयोग कर रही है उसकी नियत पर सवाल खड़े होना स्वाभाविक ही है.

भारत में करोडो की संख्या में घुसपैठ करने वाले  बांग्लादेशियों तथा असम में हो रहे दंगे को रोकने में नाकाम रही सरकार अब अपनी कालिख सोशल मीडिया के मुह पर पोत रही है.  भारत इस समय किसी बड़ी संभावित साम्प्रदायिक-घटना रूपी ज्वालामुखी के मुहाने पर खड़ा हुआ प्रतीत हो रहा है. दिल्ली के सुभाष पार्क, नांगलोई, उत्तरप्रदेश के लखनऊ, इलाहाबाद, बरेली, कोसीकला, मुम्बई में आज़ाद मैदान, रांची, बंगलौर , हैदराबाद से सैकड़ो की संख्या में उत्तर-पूर्व के लोगो का पलायन जैसी घटनाएं किसी बड़ी संभावित घटनाकी तरफ इंगित कर रही है.  इन घटनाओ को  मीडिया ने दबाने की भरपूर कोशिश की परन्तु सोशल मीडिया के माध्यम से लोगो तक यह खबर आग की तरह पहुचने लगी. इन घटनाओ पर सरकार के गैर जिम्मेदाराना रवैये ने लोगो में आक्रोश पैदा किया जिससे कीलोगो में इन घटनाओ को लेकर तीव्र प्रतिक्रिया हुई और सरकार की किरकिरी होने लगी. लोगो ने खुलकर सरकार की लापरवाही के प्रति अपने स्वछन्द विचार प्रकट करने हेतु फेसबुक, ट्विटर, ब्लॉग, जैसी सोशल मीडिया का सहारा लिया. भारत में सोशल मीडिया के सहारे विचार प्रकट करने हेतु का कोई नया मामला नहीं है. सरकार को यह आशंका है कि असम के सीमावर्ती जिलों में हिंसा के बाद सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने के लिए इन सोशल साइटों का उपयोग किया जा रहा है.

इससे पहले भी अन्ना – आन्दोलन और बाबा रामदेव के आन्दोलन को खड़ा करने में तथा अभिषेक मनु सिघवी का वीडियो यूं-ट्यूब पर लीक होने में सोशल मीडिया की बहुत बड़ी भूमिका थी. उस समय भी दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल ने सोशल मीडिया का गला घोटने की बात कह कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुठाराघात करते हुए अपनी मंशा को उजागर कर दिया था.परन्तु जन-दबाव में उस समय ऐसा नहीं कर पाए. आज परिस्थिति बदल गयी है. देश की एकता और अखंडता बनाये  रखने के नाम पर सोशल मीडिया को प्रतिबंधित करने पर  लगता है कि शायद इस समय मंत्री जी अपने मंसूबे में कामयाब हो गए है. गौरतलब है कि इस समय भारत में ट्विटर के करीब एक करोड़ साठ लाख यूजर्स हैं. फेसबुक और गूगल का तो भारत में दफ्तर है, लेकिन ट्विटर का भारत में कोई दफ्तर नहीं है. सरकार ने इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स से 16 एकाउंट बंद करने का आदेश दिया है.  जिनके एकाउंट बंद करने को कहा गया है उनमें संघ परिवार के मुखपत्र पांचजन्य, प्रवीण तोगडिया और दो पत्रकारों कंचन गुप्ता और शिव अरूर के ट्विटर एकाउंटभी शामिल हैं. कंचन गुप्ता दक्षिणपंथी विचार के पत्रकार के रूप में प्रसिद्द है तथा 1995 में राजग की वाजपेयी नेतृत्व वाली सरकार के दौरान  पीएमओ में रह कर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्र के साथ काम किया था.

सरकार को नींद से जगाने का काम जो विपक्ष नहीं कर सका वो काम सोशल मीडिया ने कर दिखाया. परिणामतः देश की संसद में भी आतंरिक सुरक्षा को लेकर तथा सरकार की विश्वसनीयता और उसकी कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिंह खड़े किये गए. सांसदों की चीख-पुकार से सरकार की अब जाकर नीद खुली है. सरकार ने आनन्-फानन में देश में मचे अब तक के तांडव को तो पहले  पाकिस्तान की करतूत बताकर अपना पल्ला झड़ने की कोशिश करते हुए दोषियों के खिलाफ कार्यवाही करने के नाम पर भारत के गृहमंत्री ने पाकिस्तान केगृहमंत्री से रविवार को बात कर एक रस्म अदायगी मात्र कर दी और प्रति उत्तर में पाकिस्तान ने अपना पल्ला झाड़ते हुए भारत को आरोप-प्रत्यारोप का खेल खेलना बंद करने की नसीहत देते हुए यहाँ तक कह दिया कि भारत के लिए सही यह होगा कि वह अपने आंतरिक मुद्दों पर पर ध्यान दे और उन पर काबू पाने की कोशिश करे. अब सरकार लाख तर्क दे ले कि इन घटनाओ के पीछे पाकिस्तान का हाथ है, परन्तु सरकार द्वारा समय पर त्वरित कार्यवाही न करने के कारण जनता उनके इन तर्कों से संतुष्ट नहीं हो रही है इसलिए अब प्रश्न चिन्ह सरकार की नियत पर खड़ा हो गया है क्योंकि असम में 20 जुलाईं से शुरू हुईं सांप्रादायिक हिंसा, जिसमे समय रहते तरुण गोगोईं सरकार ने कोई बचाव-कदम नहीं उठाए मात्र अपने राजनैतिक नफ़ा-नुक्सान के हिसाब – किताब में ही लगी रही. परिणामतः वहां भयंकर नर-संहार हुआ और वहा के लाखो स्थानीय निवासी अपना घर-बार छोड़कर राहत शिविरों में रहने के लिए मजबूर हो गए.

भारत सरकार का सोशल मीडिया पर लगाम कसने की इस अनुशंसा पर अमेरिका ने भी कड़ी आपत्ति जताई है. ध्यान देनें योग्य है कि अमेरिकी विदेश विभाग की प्रवक्ता विक्टोरिया नूलैंड ने कहा है, ‘भारत अपने सुरक्षा हितों का ख्याल रखे, लेकिन ये भी ध्यान रखे कि इस सख्ती से विचारों की आजादी पर असर न पड़े. इतना ही नहीं सरकार के इस तालिबानी फैसले ने  जून 1975 को  तानाशाही शासन द्वारा घोषित आपातकाल के जख्मो को हरा कर दिया. ध्यान देने योग्य है कि  सन 1975 में  इलाहाबाद की अदालत द्वारा समाजवादी नेता राजनारायण की याचिका को स्वीकार कर तत्कालीन प्रधानमंत्री  श्रीमती इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध घोषित कर दिया गया था. दूसरी तरफ  लोकनायक जयप्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रान्ति आंदोलन से देश में दूसरी आज़ादी के लिए सत्याग्रह का  नारा  बुलंद किया हुआ था. इन दोनों घटनाओं से   श्रीमती इंदिरा गांधी को अपनी कुर्सी खतरे में नजर आने लगी परिणामतः उन्होंने देश पर ही आपातकाल थोप दिया. इतना ही नहीं अखबारों पर सेंसरशिप लागू कर उन्होंने संविधान प्रदत्त नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी छीन ली. सरकार के इस रवैये से क्या यह मान लिया जाय कि क्या 1975 की तरह सरकार सेंसरशिप की ओर बढ़ रही है ?

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

6 Comments

  1. Shrawan kumar Akela says:

    इलेक्ट्रोनिक मीडिया भी मुख्या विपक्ष की भूमिका निभा रही है ,खासकर कांग्रेस के खिलाफ !जब नरेन्द्र मोदी ने सरकारी पैसे से अपनी तस्वीर लगी नोट-बुक,बैग सरकारी स्कूली बच्चों में बाटी,अखिलेश यादव ने सरकारी पैसे से लैपटॉप बाटी,नितीश कुमारजी ने सरकारी स्कूली बच्चो को साइकिल बाटी तो उसमे इलेक्ट्रोनिक मीडिया को बुराई या सरकारी खजाने की बर्बादी नहीं लगी पर जब दिल्ली की मुख्यमंत्री शिला दीक्षित ने सर्कार द्वारा कर्ज देने वाली फॉर्म पर अपनी तस्वीर छपाई तो इलेक्ट्रोनिक मीडिया को सरकारी खजाने की बर्बादी नजर आने लगी ,क्यों ?जिस तरह नरेन्द्र मोदी,अखिलेश यादव,और नितीश कुमार ने वोट बढ़ने का तरीका अपनाया उसमे बहुत सारे सरकारी पैसे का दुरूपयोग हुआ,पर शिला दीक्षित जी ने जो तरीका अपनी प्रचार का अपनाया उसमे सरकारी एक पैसे का भी इस्तेमाल नहीं हुआ,फिर इसमें इलेक्ट्रोनिक मीडिया को बुरा क्यों लगा!भाजपा को बुरा लगेगा ,क्योकि वो अपना चेहरा नहीं देख सकती है ,उसके लिए ऐनक की जरूरत पड़ेगी ,पर इलेक्ट्रोनिक मीडिया भी भाजपा की भाषा बोलने लगेगी ,ये समझ से पड़े है?

  2. media should learn it.

  3. mahendra gupta says:

    सरकार और उसकी agencies खुद कुछ करती नहीं, पहले पाकिस्तान को जिम्मेदार बनाया, वहां के मंत्री का इंकार और भारत में वोट बैंक के संतुलन को बिगड़ते देख कर,हिंदूवादी संगठनों को जिम्मेदार त्र्हरा दिया, और अब सोशल मीडिया को.जब कि यह सब इनकी खुद कि करी धरी नीतियों का नतीजा है.तुष्टिकरण,वोट बैंक कि नीतियाँ देश पर अभी और भरी पड़नी हैं यदि सरकार का यही तरीका रहा.अभी कई और बलि के बकरे ढूंढे जायेंगे उन्हें जेल में डाला जायेगा,और वास्तिक अपराधी बहार छुट्टे घूम कर आगे कि घटनाओं के लिए तैयारियां करेंगें.

  4. संचार-क्रांति के इस युग में अब कोई भी बात छिप नहीं सकती. सबको पारदर्शिता लाना होगा, अन्यथा वो पीछे रह जायेगा. अब इन्टरनेट फ़ोन पर उपलब्ध है, ऐसी स्थिति में लोग बाध्य नहीं हैं कि मीडिया जो भी दिखायेगा वो देखना उनकी मजबूरी है. आज का सबसे पावरफुल माध्यम सोसिअल मीडिया है. सरकार चाह कर भी इस पर लगाम नहीं लगा सकती है. और ऐसा करने कि यदि वह कोशिश करती है, तो उसे लोगों के गुस्से का सामना करना पड़ेगा.

  5. vipin says:

    very true.Keep इट up

  6. tejwani girdhar says:

    मैं आपसे पूरी तरह से सहमत हूं

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

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