/नाथु ला दर्रे पर भारतीय सैनिकों की जेबें काट रहे हैं चीनी मोबाईल टॉवर…

नाथु ला दर्रे पर भारतीय सैनिकों की जेबें काट रहे हैं चीनी मोबाईल टॉवर…

सिक्किम के नाथु ला दर्रे से लगी दुर्गम भारत चीन सीमा पर तैनात भारतीय सैनिकों के लिए पड़ोसी देश चीन के शक्तिशाली मोबाइल टॉवर ज़बरी जेबकतरे बन गए हैं.

चीन से भारत में प्रवेश के प्राचीन सिल्क रूट के द्वार नाथू ला दर्रे और उसके पास के इलाकों में तैनात भारतीय सैनिकों के पास मोबाइल तो हैं लेकिन इस दुर्गम इलाके में भारत के मोबाइल टॉवर ना बर्बर होने के कारण भारतीय सैनिकों के मोबाईल फोन महज़ खिलौना बन कर रह गए है. जबकि दूसरी ओर चीनी सीमा चौकी पर तैनात पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के सैनिकों के पास न सिर्फ अत्याधुनिक मोबाइल सैट होते है बल्कि आस पास चीन के शक्तिशाली मोबाइल टॉवर होने से ना केवल वे अपने फोन से लगातार अपने परिवारजनों के संपर्क में रहते है बल्कि इंटरनेट जैसी सुविधाएं भी चीनी सैनिक आसानी से इस्तेमाल करते है.

दूसरी तरफ भारतीय सैनिक जब अपने घर का नंबर डायल करते है तो भारतीय मोबाइल कम्पनियों  के टॉवर दूर होने से अधिकांशतया उनका कनेक्शन चीन के शक्तिशाली  मोबाइल टॉवरों के सिगनल पकड़ लेता है जिससे उनकी Local या STD  कॉल इंटरनेशनल रोमिंग कॉल में तब्दील हो जाने से  भारी भरकम बिल उनके खाते में आ जाता है.

नाथू ला दर्रे की सीमा चौकी पर एक सैनिक के अनुसार वहां भारतीय कनेक्टिविटी नहीं है. करीब दस किलोमीटर गंगटोक की ओर जाकर ‘17 माइल्स’ नाम की जगह पर एक दो जगह है जहां मोबाइल को लहराते रहें तो कनेक्टिविटी आ जाती है. इस बीच ऐसा आम तौर पर होता है कि नंबर भारत का लगाया जाता है और उसकी कनेक्टिविटी चीनी मोबाइल टॉवर सिगनल से हो जाती है और कुछ ही सेकंड में जब इस गलती का अहसास होता है तब तक करीब 100 से 120 रुपये की इंटरनेशनल रोमिंग का बिल जेब पर चढ़ चुका होता है.

नाथू ला के आसपास तैनात सैनिकों की ब्रिगेड का जयघोष ‘हम ही जीतेंगे’ है लेकिन मोबाइल कनेक्टिविटी के सामने उनकी हर रोज पराजय होती है. सिक्कम में करीब 14 हजार फुट की ऊंचाई वाले इस स्थान तक भारत संचार निगम लिमिटेड के टॉवर नहीं है. पिछले दिनों एक स्थायी संसदीय समिति ने भारतीय सैनिकों की इस समस्या की ओर सरकार का ध्यान खींचा था लेकिन सरकार तो अपनी उलझनों में ऐसी फंसी है कि उसके पास ऐसी समस्याओं को सुलझाने की फुर्सत ही नहीं है, जिससे इस दुर्गम सीमा पर तैनात सैनिकों की जेब आये दिन कट रही है.

हालाँकि कुछ जगह भारतीय सैनिकों की मदद के लिए सैटेलाइट फोन लगाए गए है. सेना के भीतर का नेटवर्क ही सैनिकों के संचार जरूरतों को पूरा कर रहा है. एक अधिकारी ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार किसी देश के मोबाइल टॉवरों के सिगनल अपनी सीमा को नहीं लांघने चाहिए और उनका स्थान एवं रूख इस प्रकार रखा जाना चाहिए कि सिगनल अपने दायरे में रहे. लेकिन चीन के ताकतवर मोबाइल सिगनल धड़ल्ले से भारतीय सीमा लांघ जाते है. कुल मिला कर भारत के सैनिक पडौसी देश की तकनालोजी की दादागिरी के शिकार हो रहे हैं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.