/जन लोक पाल की ही नहीं, जरुरत है जन राज्य की भी

जन लोक पाल की ही नहीं, जरुरत है जन राज्य की भी

।। सुनील दत्ता ।।

लोक पाल विधेयक का अंतिम मसौदा क्या बनता है। वह भी बन पाता है या नही? फिर बनने के बाद संसद में पास हो पाता है या नही? विधेयक की शक्ल ले पाता है या नहीं जैसे सवाल भविष्य के गर्त में है। लेकिन इसमें एक बात तो साफ़ है कि विधेयक बनने व लागू होने के बाद भी उसका कोई ठोस व सार्थक परिणाम आने वाला नही है।

इसका पहला व बुनियादी कारण तो यह है भ्रष्टाचार आधुनिक बाजारवादी समाज का अनिवार्य व अपरिहार्य हिस्सा है। यह बढ़ते वैश्वीकरण, उदारीकरण व निजीकरण के साथ विदेशी कम्पनियों के बढ़ते आगमन के साथ विदेशी पूंजी तकनीकी को दी जाती रही छूटो के साथ बढ़ता रहा है । साथ ही यह देश के धनाढ्य कम्पनियों कि बढती पूंजियो, परिसम्पत्तियो के बढ़ाव के लिए मिलती छूटों, अधिकारों के साथ बढ़ता रहा है। यह सरकारों द्वारा धनाढ्य तथा उच्च हिस्सों पर पहले के थोड़े–बहुत नियंत्रण को नीतिगत रूप से हटाने–घटाने के बाद तेज़ी से बढ़ता रहा है।

केन्द्रीय व प्रांतीय सरकारों द्वारा 1991 से लागू की जा रही नई आर्थिक नीतियों को लागू किये जाने के बाद विधायिका, कार्यपालिका और न्यायापालिका को अधिकाधिक भ्रष्ट बनाते हुए बढ़ता रहा है। भ्रष्टाचार का यह बढावा इस बात का स्पष्ट परिलक्षण एवं प्रमाण है की वर्तमान समय के बढ़ते भष्टाचार और धनाढ्य वर्गो के निजी लाभ, निजी मालिकाने के तेज़ फैलाव और बढ़ाव में चोली–दामन का साथ है ।1980 – 85 से पहले पूंजी और लाभ पर लगी नियंत्रणवादी नीतियों के चलते निजी लाभों–मुनाफो व पूंजियो का बढ़ाव धीमा था। फलस्वरूप भष्टाचार भी धीमा था। आज के मुकाबले आकार–प्रकार में छोटा भी था । लेकिन 1980 – 85 के बाद वैश्वीकरणवादी नीतियों के फलस्वरूप उद्योग, वाणिज्य–व्यापार की धनाढ्य देशी व विदेशी कम्पनिया अपने कारोबार को तेज़ी से बढाने लग गई।इसके लिए तथा दूसरो को पछाड़ने के लिए भी वे सरकारों से ज्यादा से ज्यादा अधिकार तथा छूटे व सहायता पाने के लिए हर तरह के भ्रष्टाचारी हथकंडे इस्तेमाल करती आ रही है।

सांसदों, मंत्रियों, अधिकारियों कि अधिकाधिक मुँह भराई भी करती रही है । साफ़ बात है कि इन धनाढ्य वर्गो को निजीकरणवादी, उदारीकरण, वैश्वीकरणवादी छूट देते हुए भ्रष्टाचार वजूद को नही रोका जा सकता। न ही सफेद धन के साथ बिना टैक्स दिए या नाजायज तरीके से कमाए गये काले धन का बनना व बढ़ना रोका जा सकता है। दूसरा प्रमुख कारण राज्य और उसके विभिन्न अंग है, जो भ्रष्टाचार को सर्वाधिक बढावा देने वाली धनाढ्य एवं उच्च कम्पनियों पर रोक लगाने, उनकी पूंजियो, लाभों पर सख्त नियंत्रण लगाने की जगह उन्हें छूट के अवसर देते रहे है। भ्रष्टाचार के विभिन्न मुद्दों के साथ तमाम मंत्रियों, अधिकारियों से लेकर न्यायाधीशो तक के नाम उछलते रहे है।

आम जनता भी अपने व्यवहारिक अनुभवो से समझने लगी है की आमतौर पर सभी सत्ता लोलुप मंत्री , नेतागण, अफसर और कर्मचारी, भ्रष्टता की हर सीमा लाघते जा रहे है। कम्पनियों का पैसा खाकर भ्रष्टाचारी बनकर अब समाज को भ्रष्टाचारी बनांते जा रहे है। देश के उच्च नागरिक समाज के लोग भी अधिकाधिक धन–सम्पत्ति, पद–प्रतिष्ठा हासिल करने और बढाने में कहीं से पीछे नही है।

उनके उच्च पद पेशे से लाखो रुपया माह की आमदनियो के साथ उन्हें उच्च वर्गीय शोहरत सुविधाए मिलती रही है। धनाढ्य वर्गो व सत्ता सरकार के लोगो के साथ इनके सम्बन्ध बनते व गहरे होते रहे है। इसी के फलस्वरूप पिछले बीस सालो से लागू होती रही वैश्वीकरणवादी नीतियों के विरोध में यह उच्च नागरिक समाज कभी नही खड़ा हुआ। तब भी नही खड़ा हुआ जबकि व्यापक जनसाधारण की समस्याओं के साथ चौतरफा भ्रष्टाचार की समस्याए इन नीतियों के बढ़ते चरण के साथ और ज्यादा बढती रही। ऐसी स्थिति में देश के धनाढ्य एवं उच्च हिस्सों से सरकारी एवं गैर सरकारी उच्च संस्थाओं, व्यक्तियों से भ्रष्टाचार को दूर करने के किसी गम्भीर प्रयास की उम्मीद नही की जा सकती ।ऐसी कोई उम्मीद रखना अपने आप को धोखा देना है। जन साधारण को धोखे में रखना है।

इसको एक और तरीके से भी समझा जा सकता है। लोक पाल विधेयक या जन लोक पाल विधेयक को पास करने के बाद आखिर वह लागू तो सत्ता सरकार के द्वारा ही होगा। उसके द्वारा बनाई गई संस्थाओं के जरिये ही होगा उस संस्था से व नागरिक समाज के उच्च से ही तो आयेंगे। जिनके स्वयं के भ्रष्ठाचारियो के साथ के रोज मर्रा के बढ़ते संबंधो के बारे में ख़ास कर वैशिविकरणवादी नीतियों के लागू होने के बाद से कोई शक -शुबहा करने की गुंजाइश नही है। तब क्या ऐसी किसी संस्था से भ्रष्टाचार विरोधी विधेयक को ठीक से लागू करने कराने की बात सोची जा सकती है? क्या ऐसा कोई विधेयक बढ़ते भ्रष्टाचारके लिए प्रत्यक्ष नजर आने वाली वैश्वीकरणवादी नीतियों, सुधारों को रद्द कर सकने की सिपारिश करेगा ? क्या ऐसी कोई सिपारिश उच्च नागरिक समाज से सुनाई पड़ रहा है? यदि नही तो ऐसे विधयेक तथा ऐसी संस्थाओं से भ्रष्टाचार मिटने वाला नही है।

इसके विपरीत सच बात तो यह है कि अगर ऐसी कोई संस्था बनती भी है तो वह उच्च स्तर पर व्याप्त चौतरफा भ्रष्टाचार का अंग बने बिना नही रह सकती। इसलिए लोक पाल विधेयक के मसौदे पर वाद–विवाद होने दीजिये, उसके बारे में उसे लेकर प्रचार माध्यमी चर्चाओं को सुनते जाएं, लेकिन यह भी सोचिये कि बढ़ते भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा कैसे? इस काम को आखिर करेगा कौन? यह सवाल इसलिए खड़ा है कि राज्य के तीनो अंगो पर भ्रष्टाचारी होने का आरोप अब खुलेआम लग रहा है। नागरिक समाज के लोग ही लगा रहे है।

सरकारों को चुनावी वोट व समर्थन देने के वावजूद अब देश के बहुसख्यक जन साधारण भी इस नतीजे पर पहुचते जा रहे है कि वर्तमान राज व्यवस्था इस पर अंकुश नही लगा सकती। इन स्थितियों में अब बढती जन समस्याओं के उपयुक्त समाधान के लिए तथा भ्रष्टाचार आदि पर अंकुश लगाने के लिए भी नये ढंग के राज व्यवस्था की नये ढंग के संविधान व सत्ता सरकार कि अपरिहार्य आवश्यकता आ खड़ी है। देशी व विदेशी धनाढ्य हिस्सों को छूट दर छूट देने वाली वर्तमान जनतांत्रिक राज्य की जगह उन पर नये जनवादी राज्य के निर्माण की भी अपरिहार्य आवश्यकता खड़ी हुई है। जनसाधारण के छूटो अधिकारों को बढावा देने वाले तथा भ्रष्टाचारपर अधिकाधिक अंकुश लगाने वाले राज की अर्थात जनसाधारण द्वारा संचालित व नियंत्रित जनवादी राज्य की आवश्यकता आ खड़ी हुई है। भ्रष्टाचार के सम्बन्ध के सम्बन्ध में अब मामला केवल वर्तमान सत्ता–सरकार द्वारा लागू किये जाने वाले किसी नये विधेयक का नहीं रह गया है।

सुनील दत्ता, 09415370672

वर्तमान दौर की सत्ता–सरकारों में विद्यमान छोटे -बड़े छिद्रों से बढ़ते रहे धन – पूंजी के भ्रष्टाचार ने हर विधेयक व कानून को रोकने में नकारा साबित कर दिया है। इसलिए मांग केवल जन लोक पाल विधेयक की नही होनी चाहिए, बल्कि जनसाधारण के हितो में विधेयको को बनाने व लागू करने वाले जनवादी राज्य की भी मांग होनी चाहिए। उसके लिए जन साधारण के व्यापक समर्थन एवं सक्रिय भागीदारी की जरूरत है। तभी जन लोकपाल की सार्थकता है।

 

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.