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त्रिपुरारी शरण बने डीजी दूरदर्शन, बॉलीवुड की बढ़ सकती है भागीदारी

By   /  July 25, 2011  /  1 Comment

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पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट के पूर्व निदेशक तथा 1985 बैच के आईएएस अधिकारी त्रिपुरारी शरण ने दूरदर्शन के महानिदेशक का पद संभाल लिया। उन्‍होंने यह पद आकाशवाणी के महानिदेशक लीलाधर मंडलोई से लिया, जो बीएस लाली के हटाए जाने के बाद अस्‍थाई तौर पर दूरदर्शन महानिदेशक का पद भी संभाल रहे थे। बीएस लाली को कॉमनवेल्थ खेलों में प्रसारण अधिकार दिए जाने में धांधली के आरोपों के बाद हटा दिया गया था।

त्रिपुरारी शरण का चयन मार्च में ही कर लिया गया था, लेकिन नियुक्ति अब जाकर हुई है। वे बिहार सरकार के खाद्य एवं उपभोक्‍ता मामलों के मंत्रालय में अतिरिक्‍त सचिव एवं बिहार स्‍टेट फायनैंस कार्पोरेशन में एमडी थे। उन्हें कला समीक्षक के तौर पर भी जाना जाता है। और उनकी दोस्ती फिल्म और टीवी जगत की तमाम बड़ी हस्तियों से रही है। स्टार ग्रुप के सीईओ उदय शंकर और फिल्म अभिनेता नसीरुद्दीन शाह उनके खास मित्रों में से माने जाते हैं।

हालांकि शरण बिहार कैडर के अधिकारी हैं, लेकिन उन्होंने देश भर का भ्रमण किया है। वे पांच सालों तक पुणे के प्रतिष्ठित फिल्‍म एंड टीवी इंस्‍टीट्यूट ऑफ इंडिया यानि एफटीआईआई के डायरेक्‍टर भी रह चुके हैँ और उनके इस कार्यकाल को काफी सराहा भी गया।

30 जून 1961 को पैदा हुए श्री शरण  आईएएस हैं तथा भौतिक विज्ञान से स्‍नातक तथा समाज शास्‍त्र में परास्‍नातक हैं। माना जा रहा है कि उनके आने के बाद दूरदर्शन में बॉलीवुड की भागीदारी बढ़ सकती है। यह भी उम्मीद की जा रही है कि दूरदर्शन के कार्यक्रमों का स्तर सुधरेगा और उनमें से गायब होता जा रहा ‘मनोरंजन’ फिर वापस लौटेगा।

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. narendra tomar says:

    जिस तरह की फिल्‍मों की बाढ लगी है बॉलीवुड में उसको देखते हुए तो दूरदर्शन में उसके प्रभाव और भागीदारी का नहीं बढना ही बेहतर है। हां यदि वह सामाजिक सरोकार के कुछ बेहतर कार्यक्रम बनवा सके तो दर्शकों के विशाल बहुमत का कुछ भला हो सकता है जो आज भी दूर दर्शन से जुडे है।

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