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हिमाचल चुनाव: बिखरा कुनबा सँभालने की बारी अब भाजपा की है

By   /  September 4, 2012  /  1 Comment

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-विनायक शर्मा||
हिमाचल में परिस्थितियाँ कुछ ऐसी बन रही है कि प्रदेश के आगामी चुनावों में राजनीतिक प्रतिद्वंदिता के साथ-साथ व्यक्तिगत प्रतिद्वंदिता का प्रखर रूप भी स्पष्ट रूप से देखने को मिल सकता है.  जिसके फलस्वरूप  आशंका इस बात की है कि चुनाव प्रचार के दौरान नेताओ और कार्यकर्ताओं का आक्रामक रुख इस देव भूमि में कहीं सियासी कड़वाहट पैदा न कर दे. सत्ता परिवर्तन चाहनेवालों का सत्ता पर काबिज दल के साथ चुनावी संघर्ष लोकतान्त्रिक व्यवस्था में कोई नया नहीं है. परन्तु आरोप प्रत्यारोप के दौर में व्यक्तिगत आक्षेप से बचते हुए शालीनता और मर्यादाओं का ध्यान अवश्य ही रखना चाहिए.

यूँ तो कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दल अंतर्कलह और अंतर्द्वंद की समस्या से लम्बे समय से जूझ रहे हैं. देर से ही सही, कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व ने प्रदेश विधानसभा के चुनावों से पूर्व प्रदेश कांग्रेस की बिगडती स्थिति को आपदा प्रबंधन के तहत सँभालते हुए पूर्व केन्द्रियमंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की प्रदेश कांग्रेस के मुखिया पद पर ताजपोशी कर संगठन और चुनाव की कमान पूर्ण रूप से सौंप कर अक्लमंदी का कार्य किया है. विगत लगभग एक वर्ष से जिस प्रकार की टांगघसीटी और सरफुटव्वल की प्रतियोगिता कांग्रेस में चल रही थी, चुनावी वर्ष में इसे कोई शुभलक्षण नहीं कहा जा सकता. इसमें कोई दो राय नहीं कि वीरभद्र सिंह प्रदेश के उन नेताओं में से हैं जिनका समाज के हर वर्ग में बड़ा जनाधार है. तर्क के लिए इसका एक कारण लगातार केंद्र या राज्य की सत्ता में पदासीन रहना भी कहा जा सकता है. परन्तु हमें यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि सार्वजनिक जीवन में नेता विशेष के व्यक्तिगत गुण और जनता से सतत जुडाव ही उसे न केवल लोकप्रियता के शिखर पर बल्कि जन-जन का नेता भी बनाते हैं. ऐसे नेता सत्ता से बाहर रह कर भी उतने ही लोकप्रिय होते हैं जितने कि सत्ता में रह कर.

हिमाचल कांग्रेस में गुटबाजी के चलते अंतर्कलह और वर्चस्व की चल रही लड़ाई को विराम देने के लिए कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व द्वारा वीरभद्र सिंह को प्रदेश संगठन की कमान सौपने के निर्णय को बहुत विलम्भ और दबाव के चलते ही सही, परन्तु संगठन के हित में लिया गया एक  महत्वपूर्ण निर्णय माना जा सकता है. 12वीं विधानसभा के लिए होनेवाले चुनावों से पूर्व खेमों में बंटे हिमाचल प्रदेश कांग्रेस संगठन को पटरी पर लाने के लिए इससे उपयुक्त और कोई उपाय हो ही नहीं सकता था. दल में किसी भी कार्यकर्ता या नेता की अनदेखी न हो और एकता व अनुशासन बना रहे यह दलगत विषय हैं और इस पर संगठन और शीर्ष नेतृत्व को ही समय रहते चेतना चाहिए. कारण कुछ भी रहा हो दल में विघटन की स्थित पैदा करने में कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को ही दोषी करार दिया जाता. हम तो यही कहेंगे चलो देर से ही सही, परन्तु समय रहे कांग्रेस ने अपना कुनबा संभाल लिया.

अभी तक ऊपर से नीचे तक चल रही गुटबाजी और असमंजस की स्थिति के कारण बैकफुट पर चल रही कांग्रेस में वीरभद्र सिंह की ताजपोशी से उनका नेतृत्व संगठन में नई जान और कार्यकर्ताओं में जोश भरने में कितना सफल रहेगा यह तो आने वाले दिनों में स्पष्ट हो ही जायेगा. प्रदेश के युवा कांग्रेस के चुनावों को विवादों में घसीटने के कारण बेशक उनके सुपुत्र विक्रमादित्य की ताजपोशी अध्यक्ष पद पर न हो सकी हो, परन्तु प्रदेश युवा कांग्रेसजनों में भी वीरभद्र सिंह की पकड़ को कोई भी नकार नहीं सकता. विपक्षियों के साथ-साथ प्रदेश कांग्रेस द्वारा की गयी घेरेबंदी के चक्रव्यूह को तोड़ने में प्रयत्नशील पूर्व मुख्यमंत्री को प्रदेशसंगठन की कमान मिलने पर अब संगठन को एकजुट रखने में अपना पूरा ध्यान लगाना होगा ताकि आनेवाले चुनावों में अपने नेतृत्व का सफल प्रदर्शन कर सकें. भीतरघात के अंदेशे से बचने के लिए गुटबाजी के आक्षेप से दूर रहते हुए विजय की सम्भावना वाले श्रेष्ठ प्रत्याशियों का चयन अवश्य ही एक बड़ी समस्या होगी.

वहीँ दूसरी ओर सत्तारूढ़ दल भाजपा में भी सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. वहाँ भी पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेता सत्ता और संगठन में अनदेखी के आरोप लगाते हुए दल से ही बाहर होकर अपना नया दल बनाने को मजबूर किये गए. अन्यथा कोई पूर्व प्रदेशाध्यक्ष अपना दल यूँ ही नहीं त्यागता. भाजपा ने अन्य असंतुष्टों व रुष्टों को मनाने के प्रयासों में सफलता प्राप्त करते हुए कुछ को मना भी लिया गया है. नेताओं की इस मान-मुनव्वल के चलते भाजपा का समर्थक मतदाता, भाजपा से कितना दूर हुआ है यह तो चुनावों पश्चात् आनेवाले नतीजों से ही स्पष्ट हो सकेगा. व्यक्तिनिष्ठ कार्यकर्ताओं की बात अलग है वह तो नेताओं की भाषा बोलते हुए उन्हीं के साथ जायेंगे, परन्तु भाजपा के पुराने व साधारण समर्थक और मतदाता अपने मठाधीश जैसा व्यवहार करनेवाले नेताओं से आज भी यह जानना चाहते हैं कि भ्रष्टाचार और परिवारवाद के उनके उन तमाम आरोपों का क्या हुआ जो अभी तक वह सत्ता और संगठन पर लगाया करते थे ? सतही एकता से नेता अवश्य ही लाभान्वित हुए होंगे परन्तु साधारण कार्यकर्ताओं में अभी भी रोष पनप रहा है.

यूँ तो प्रदेश की जनता के समक्ष मुख्य रूप से भाजपा या कांग्रेस के रूप में केवल दो ही मजबूत विकल्प हैं, परन्तु तीसरे विकल्प के रूप में खड़े होने को आतुर हिमाचल लोकमोर्चा अधिक सीटें जीतने की हैसियत न रखते हुए भी दोनों बड़े विकल्पों के समीकरण बिगाड़ने की सम्भावना तो पैदा कर ही सकता है. ऐसे में कांग्रेस का इस तीसरे मोर्चे के साथ चुनावी समझौता अवश्य ही नतीजों को प्रभावित करने में सक्षम हो पायेगा, कांग्रेस को इस पर विचार करना चाहिए. सफलता और विफलताओं के आरोप-प्रत्यारोपों के मध्य होनेवाले प्रदेश के आगामी चुनावों के नतीजे बहुत ही अप्रत्याशित होंगे ऐसी सम्भावना है. इसलिए अलग-अलग चुनाव क्षेत्र में अलग-अलग रणनीति बनाकर चुनावी दंगल में उतरने वाला दल ही सत्ता के सिंघासन तक पहुँच सकता है. अभी हाल में ही हुए नालागढ़ के उपचुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी ने जिस प्रकार से अभी नहीं तो कभी नहीं की नीति पर चलते हुए अपनी विजय सुनिश्चित की थी, ठीक उसी नीति पर चलते हुए कांग्रेस को सभी 68 विधानसभा क्षेत्रों में कड़ी मेहनत करनी  होगी.

राजनीतिक विश्लेषकों का यह मत है कि जहाँ एक ओर कांग्रेस हाईकमान गुटबाजी और अनुशासनहीनता की तमाम शिकायतों का निपटारा करने में अंततः सफल रहती है, वहीँ भाजपा में इस विशेषता की कमी स्पष्ट दिखाई देती है. भाजपा को यह समझना होगा कि सतही पैचअप से चुनावी दंगल नहीं जीते जाते. चुनावी वर्ष में अति आत्मविश्वासी भाजपा को समझना होगा कि गुटबाजी और अंतर्द्वंद के कारण शिमला महापौर के चुनावों में हुए भीतरघात के चलते मतों  में हुए भारी स्थानांतरण की भांति ही, आनेवाले चुनावों में जहाँ एक ओर रुष्ट कार्यकर्ताओं और समर्थकों द्वारा भीतरघात की सम्भावना से दो-चार होना पड़ेगा वहीं चुनावों में सत्ताविरोधी-पदग्राही का लाभ चुनावों में कांग्रेस और विरोधी मोर्चा अपने पक्ष के मतों में परिवर्तित करने में भरपूर प्रयास करेंगे. महंगाई और भ्रष्टाचार जैसे राष्ट्रव्यापी मुद्दे और  टीम-अन्ना और रामदेव फैक्टर कांग्रेस और भाजपा दोनों को बराबर की क्षति पहुँचायेगे. वैसे भी हिमाचल में पक्ष और विपक्ष को कुल मतदान में प्राप्त हुए मतों के प्रतिशत में कोई बड़ा अंतर नहीं होता. २००७ के चुनावों में सत्ता पर काबिज हुई भाजपा ने जहाँ ४१ सीटों पर विजय पाई थी वहीँ कांग्रेस मात्र २३ सीटों पर जीत हासिल करने के बाद विपक्ष में बैठना पड़ा था. इसीप्रकार २००३ के चुनावों में भी इसके ठीक विपरीत जहाँ कांग्रेस को ४३ सीटों पर विजय मिली थी वहीँ भाजपा को १६ सीटों पर ही संतोष करना पड़ा था. अब यदि इन दोनों चुनावों में दोनों दलों द्वारा प्राप्त कुल मतदान का मत प्रतिशत देखें तो २००३ व २००७ में कांग्रेस को ४१ व ३८.९० और भाजपा को क्रमशः ३५ और ४३.७८ प्रतिशत मत प्राप्त हुए थे. इसी प्रकार यदि २००९ में संपन्न हुए लोकसभा के चुनावों के नतीजों पर एक नजर दौडाएं तो भाजपा ने ४९.६१ प्रतिशत मत प्राप्त करके कांगड़ा, हमीरपुर और शिमला लोकसभा क्षेत्रों पर विजयी पताका फहराई वहीँ कांग्रेस को कुल मतदान का ४५.६० प्रतिशत मत प्राप्त कर केवल मण्डी लोकसभा क्षेत्र पर ही विजय मिल सकी थी. इन आंकड़ों से इतना तो स्पष्ट है कि यदि प्रदेश के चुनावों में कोई विशेष मुद्दा या लहर न हो तो लगभग ४ से ६ प्रतिशत मतों की बढ़त लेकर ६८ विधानसभा वाले इस छोटे पहाडी प्रदेश की सत्ता के सिहांसन पर सरलता से ताजपोशी सुनिश्चित की जा सकती है.

वीरभद्र सिंह की प्रदेश कांग्रेस मुखिया पद पर ताजपोशी के बाद कांग्रेस अब एकजुट हो भाजपा को बराबर की टक्कर देने के लिए नए जोश और उत्साह के अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित, चुनावी रणभूमि में उतरने को तैयार है. भाजपा को अब कांग्रेस के साथ-साथ अपने दल के असंतुष्टों के हमलों द्वारा की जाने वाली संभावित क्षति से निपटने के उपाय करने की  आवश्यकता है. पुराने और वरिष्ठ नेताओं व कार्यकर्ताओं की सत्ता व संगठन में अनदेखी के नतीजे की एक झलक शिमला महापौर व उपमहापौर के चुनाव में भाजपा के असंतुष्टों द्वारा अभी हाल ही में दिखाई जा चुकी है. इसी प्रकार भाजपा से निलंबित सांसद राजन सुशांत की जगजाहिर नाराजगी को आगामी चुनावों में हलके से लेना, बिल्ली को देख कबूतर द्वारा आंख बंद करने वाली कहावत को चरितार्थ करने समान होगा. कांग्रेस द्वारा वर्चस्व की लड़ाई को विराम देने के बाद चुनावों में  होनेवाली क्षति को नियंत्रित करने के समय रहते कारगर उपाय अब भाजपा को करने हैं. अन्यथा कांगड़ा और मण्डी लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत पडनेवाले 34 विधानसभा क्षेत्रों के नतीजे अवश्य ही मिशन रिपीट का मार्ग अवरुद्ध करेंगे ऐसी सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता.

इसमें कोई दो राय नहीं कि चुनावों में बहुत से सापेक्ष और अनपेक्षित कारणों से जय-पराजय निश्चित होती है, परन्तु यक्ष-प्रश्न यहाँ यही है कि क्या भाजपा अपने बिखरे कुनबे को सँभालने में सफल होगी ?

(विनायक शर्मा, मंडी, हिमाचल से प्रकाशित साप्ताहिक अमर ज्वाला के संपादक हैं)

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. आजादी के ६५ बरसो के बाद आज देश को कहाँ खड़े होना चाहिए था और इन नेताओं ने कहाँ ला रख दिया है. नेता बनने के लिए किसी योग्यता का न होना ही इसकी सबसे बड़ी बजह है. कुछ भी हो सता सुंदरी है ही इतनी हसींन की इस का नशा उतारे नहीं उतरता.JAHAN केंद्र की गवर्नमेंट हर स्टेप पर फ़ैल हो रही है बही हिमाचल की प्रेसेंट गवर्नमेंट ब इसके दिक्टाटर नेताओं से लोग दुखी हो चुके है ऐसे में राजा से ही एक बहूत बड़ी उम्मीद है की एस प्रेसेंट सरकार द्वारा सताए गए लोगो को नयाय मिलेगा.

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