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मनचले लड़की के कपडे खींचते रहे और तमाशबीन हँसते रहे…

By   /  September 4, 2012  /  4 Comments

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दिल्ली की मेट्रो रेल से सफर के दौरान लडकियां कितनी सुरक्षित हैं इसका ताज़ा नमूना सामने आया है राजीव चौक से ब्ल्यू लाइन मेट्रो में दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने वाली एक छात्रा के साथ हुई एक घटना से, जो खुद इस पीड़ा से दो चार हो चुकी इस छात्रा ने एक ब्लॉग के ज़रिये जाहिर किया है. उक्त पीड़ित छात्रा ने यूथ की आवाज़ ब्लॉग पर अपने साथ घटी इस शर्मनाक घटना का पूरा विवरण देते हुए लिखा है कि इस घटना से मुझे मनोवैज्ञानिक रूप से जो चोट लगी है उसे मैं शायद ही भूल पाऊं. इस छात्रा ने ब्लॉग पर लिखा है कि “मेरा स्टेशन आ गया था और मैं मेट्रो का दरवाजा बंद होने से पहले बाहर निकलने की जद्दोजहद कर रही थी. एक पुरुष ने मेरा टॉप खींच दिया जिससे करीब 15 सेकेंड तक मेरे वक्ष दिखते रहे और इसी बीच किसी ने मेरे पिछले हिस्से को दबोच लिया. जैसे तैसे मैं मेट्रो के बाहर आ गई. प्लेटफॉर्म पर पहुंचते ही मैं उन 5-6 लोगों पर जोर से चिल्लाई जो दरवाजे पर खड़े थे. मैंने उन्हें वो गालियां दी जो शायद ही कोई भारतीय लड़की देने की सोचे. लेकिन मेरे लिए सबसे दुखदायी उन पुरुषों की प्रतिक्रिया थी. वो मुझे घूरते हुए हंसते रहे. वो हंसते रहे और मेरा गुस्सा बढ़ता गया. मैं हमेशा सोचा करती थी कि यदि कभी मेरा सामना ऐसे लोगों से हुआ तो मैं पीट-पीट कर उनका बुरा हाल कर दूंगी लेकिन उस वक्त मैं सिर्फ उन्हें देख रही थी. मेरी गालियां भी उन्हें हंसाने का जरिया ही बनकर रह गई थीं.”

लड़की ने आगे लिखा, “यदि दिल्ली के पुरुषों की कुंठा इतनी अधिक बढ़ गई है तो उन्हें वहां जाना चाहिए जहां सेक्स पैसे देकर मिल जाता है. मेरा शरीर मेरा अपना है और मैंने किसी पुरुष को इसे छूने का अधिकार नहीं दिया है. यह लेख सिर्फ मेरे बारे में नहीं है, यह उस मनोवैज्ञानिक चोट के बारे में है जिसके साथ अब मुझे जीवन भर जीना पड़ेगा. किस तरह रोज ऐसी ही घटनायें घटती हैं और कोई उन पर बात तक करना पसंद नहीं करता. मैं नहीं जानती की यह लिखकर कुछ बदलेगा या नहीं लेकिन यह जरूर जानती हूं कि बहुत सी चीजों से मेरा विश्वास टूट गया है.”

 

यह आपबीती दिल्ली और देश के दूसरे शहरों में पब्लिक ट्रांस्पोर्ट से सफर करने वाली लाखों महिलाओं की आपबीती है. बाकी खामोशी से सह लेती हैं, लेकिन इस लड़की ने सबको बताने का साहस दिखाया है और पुरुषों को आईना भी दिखाया है. उसने बताया है कि उसके साथ इतना सब कुछ होने के बावजूद सारे यात्री खामोश रहे. न ही किसी ने उसकी मदद की कोशिश की और न ही पुलिस को घटना की जानकारी देना बेहतर समझा.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

4 Comments

  1. क्या हो गया है हमारी भारतीय समाज और भारतीय सभ्यता को ?पशिमी देशो में भी ऐसी शर्मनाक घटनाओ के वक़्त वहां उपस्तिथ लोग उन असामाजिक तत्वों का विरोध जरूर करते हैं न की तमाशा देखते हैं उनका वो व्यवहार हम भारतीयों से प्रेरित होता है और ऐसे में इस तरह की घटनाओ पर क्या सन्देश जायेगा?क्या हमलोग बिलकुल शून्य हो चुके हैं ?कहाँ है हमारी संस्कृति,कहाँ है हमारी सभ्यता ,क्या हमारे शारीर का खून पानी बन चूका है?क्या हम अपनी बहु बेटियों का आबरू लूटते देखते रहेंगे ?जो उस वक़्त वहाँ मौजूद थे मै उनसे पूछना चाहता हूँ की क्या उनके घर में बहु बेटी नहीं है ,घटना स्थल पर उस भुक्त भोगी लड़की की जगह उनकी अपनी बहु बेटी के साथ हो रहा होता तो भी क्या वे इसी तरह मज़े लेकर तमाशा देखते रहते ?जब आप किसी की मदद नहीं करते हो तो आपकी मदद ऐसे हालातों में कोई क्यों करेगा?मै उन असामाजिक लडको से पूछना चाहता हु की अप सबो में किसी न किसी की माँ,बहन ,बीवी,या भाभी तो होगी ,अगर उनके साथ कभी ऐसी घटना घटे तो आपके पास चुल्लू भर पानी भी नहीं मिलेगी डूब मरने के लिए क्योंकि आप तो हमेशा अपने परिवार के साथ नहीं रह सकते ?जरा सोचिये आप भी,वो भी और हम भी!कितना असंवेदनशील हो गया है इन्सान………….

  2. Bahut dukhdaai ghatna…kash aise logo ko saza ke roop me Hinjada bnaa diya jaaye.

  3. patnaikt says:

    Delhi men are thorough bred bastards and that is the only way they can be defined. They will not leave an opportunity to molest their own mothers and sisters and you cannot expect any help from others. I can never imagine going in public transport with my female relatives or friends in Delhi.

  4. Mahender Singh Thakur says:

    MAI es des ke aam aadmi say ek baat pochna chata ho ki es des mai naari ka samman kyo din ba din kam hota ja raha hai eska karan kya hai ham jabki hamre des mai ma durga ke rup mai ham sab naari ki poja karte hai or ma luxmi ke rup mai bhi naari ko pojte hai fir hamre des ki aam ma beati ke saat asa kyo hota hai.

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