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मनमोहन सिंह को हम भी कठपुतली कहने से कहां चूकते हैं

By   /  September 6, 2012  /  3 Comments

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-तेजवानी गिरधर
अमेरिकी अखबार वॉशिंगटन पोस्ट में भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर जैसे ही यह आपत्तिजनक टिप्पणी की कि सिंह पर इतिहास में नाकाम प्रधानमंत्री के तौर पर दर्ज होने का खतरा मंडरा रहा है, तो सूचना और प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी को ऐतराज हो गया। वे कह रही हैं कि अमेरिकी अखबार किसी अन्य देश के प्रधानमंत्री के बारे में कुछ भी कैसे छाप सकता है? मैं विदेश मंत्रालय से बात करूंगी। इस मुद्दे पर निश्चित रूप से कदम उठाया जाएगा। ज्ञातव्य है कि अमेरिकी पत्रिका टाइम ने इससे पूर्व अपने कवर पर मनमोहन सिंह की तस्वीर छापकर उन्हें अंडर अचीवर बताया था। इसी प्रकार इंग्लैंड के अखबार इंडिपेंडेंट ने भारतीय प्रधानमंत्री को सोनिया गांधी की कठपुतली कहा था।
सवाल ये उठता है कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर हमारे देश में ही मनमोहन सिंह के बारे न जाने क्या-क्या कहा और छापा जाता है, क्या उसे सरकार रोक पाई है? हम यदि अपने प्रधानमंत्री को कमजोर और कठपुतली कहते हैं तो दूसरा तो कहेगा ही। उसे आप कैसे रोक सकते हैं? क्या दूसरों को पता नहीं है कि हम मनमोहन सिंह के बारे में क्या सोचते हैं और क्या कहते हैं? क्या यह सच नहीं कि पिछला लोकसभा चुनाव भाजपा ने कमजोर मनमोहन बनाम लोह पुरुष लालकृष्ण आडवाणी के नाम पर ही लड़ा था, यह बात अलग है कि कांग्रेस फिर भी जीत गई।
विशेष रूप से जब से बाबा रामदेव और टीम अन्ना मुखर हुए हैं, तब से तो यह चलन ही पड़ गया है कि चाहे जिसको कुछ भी कहो, चाहे जिसको गाली दो, चाहे जिसको अपमानित करो, कोई कुछ कहने वाला, रोकने-टोकने वाला नहीं है। बाबा व अन्ना मनमोहन सिंह कठपुतली कहते हैं तो दिग्विजय सिंह बाबा को ठग और अन्ना को भ्रष्ट कहते हैं। मर्यादा नाम की तो कोई चीज ही बाकी नहीं रही है। हालत ये है कि पिछले स्वाधीनता दिवस पर तो अन्ना ने यह टिप्पणी तक कर दी थी कि मनमोहन सिंह किस मुंह से लाल किले पर तिरंगा फहराएंगे। वाचालता के इस दौर में कोई सोनिया व राहुल के बारे में भद्दी गालियां बकता है तो कोई नरेन्द्र मोदी को मानवता का हत्यारा करार दे देता है। एसएमएस के जरिए भी न जाने कितनी फूहड़ चुटकलेबाजी होती रहती है। एक एसएमएस में मोबाइल के साइलेंट मोड को मनमोहन सिंह मोड तक का नाम दे दिया गया। एक एसएमएस में यह बताया गया कि मनमोहन सिंह एक बार डेंटिस्ट के यहां गए तो उसने कहा कि क्लीनिक में तो मुंह खोलिए। अनाप-शनाप बकवास वाली टिप्पणियों से तो सोशल नेटवर्किंग साइट्स तो भरी पड़ी हैं। ये साइट्स पूरी दुनिया में देखी जा रही हैं, तो क्या दुनिया को पता नहीं लगता होगा कि हम अपने प्रधानमंत्री के बारे में क्या सोचते हैं, क्या कहते हैं, कितना जलील करते हैं?
ऐसा नहीं है कि मनमोहन सिंह को कठपुतली करार देने वाले ही दोषी हैं। खुद उन्होंने भी जिस प्रकार की भूमिका अदा की है, इसी कारण लोग उन्हें कठपुतली कहते हैं। ये एक कड़वा सच है। अपको याद होगा कि जब भाजपा ने उनको कमजोर प्रधानमंत्री बता कर चुनाव लड़ा और उसके बावजूद वे जीत गए तो कांग्रेसी कहने लगे कि मतदाता ने भाजपा के तर्क को नकार दिया। मगर सच्चाई यही है कि चुनाव भले ही मनमोहन सिंह को आगे करके लड़ा गया हो, मगर जीत उनके नाम की वजह से नहीं हुई थी। हां, उनका साफ सुथरा चेहरा जरूर काम आया था, मगर जीत की वजह कांग्रेस का अपना नेटवर्क और विपक्ष की कमजोरी था। यह बात मनमोहन सिंह भी जानते हैं। यदि उन्हें इस बात का गुमान होता कि कांग्रेस उनके नाम से जीती है तो अब तक कांग्रेस पर कब्जा करने की बात कभी की सोच चुके होते। जब वे अपने दम पर प्रधानमंत्री नहीं बने तो भला अपने दम पर सरकार कैसे चला सकते हैं? जाहिर सी बात है कि सोनिया की ओर ही मुंह ताकेंगे। विपक्ष ने भले ही सोनिया को विदेशी मूल का बता कर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर नहीं बैठने दिया हो, मगर वे प्रधानमंत्री से भी ऊपर सुपर प्रधानमंत्री  की भूमिका अदा कर रही हैं। इसे देश का सौभाग्य कहा जाए या दुर्भाग्य, मगर यही सच्चाई है। मनमोहन सिंह कठपुतली प्रधानमंत्री ही हैं। कहने में भले ही यह अच्छा नहीं लगता हो। इस पर अगर अंबिका सोनी को ऐतराज है तो उसे केवल इसी आधार पर सही ठहराया जा सकता है कि कोई मां अपने बेटे को भले ही नालायक कहे, मगर अगर कोई और उसके बेटे को नालायक कहता है तो उसे बर्दाश्त नहीं कर पाती।

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

3 Comments

  1. बात तो बहुत खरी है भाई |

  2. jitane aap sabbad sabbad kosh mai hai be sab mila kar har aam aadmi ne sardar ji ke [ prirm ministar ke khilaf upyog kiye ] hai yadi koyee jimmebar p m hota to satch mai regien kar jata ietani neeche ja kar koyee nahi sahata bhagwan jane kis mitti ke bane hai.

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