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भारत ऐसा दब्बू तो नही था ….

By   /  September 7, 2012  /  2 Comments

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-दिलीप सिकरवार||

आज यह सवाल लाख टके का है. सवाल जायज है या नाजायज, यह कहना  जरा मुश्किल है. किन्तु इतना  जरुर है देश बहुत अच्छे दौर से नही गुजर रहा है. दुनिया में अपनी साख जमाने वाले विशाल देश की मिटटी पलीत कर दी गयी. धूल में मिला दी पूरी प्रतिष्ठा. अब “इंडिया” को गाँधी का भारत नही बल्कि “उच्च्क्को” का देश कहा  जाने लगा है क्योकि जितने घोटाले यह हुए है, शायद ही किसी और देश के नेताओ ने किये हों.

सफ़ेद कपड़ो में नजर आने वाले हमारे खद्दर धारी भीतर से कितनी मैली मानसिकता के शिकार हैं, इसका अंदाजा उस दिन लग गया था जब राजीवगांधी पर बोफोर्स दलाली के आरोप लगे, बाद में जो कुछ हुआ, देश ने उसे भी जाना. इसके पश्चात् एक-एक करके घोटाले सामने आने लगे. देश का शरीर बद से बदनाम होते गया. नैतिकता तो किस चिड़िया का नाम है, नेता और नौकरशाह भूल गये. बस रुपया कमाना ही इनका उद्देश्य बन गया. ईमान को तिलांजलि दे दी गयी. भ्रष्टों की सरकार में पैठ हो गयी. आप कितना धन डकार सकते हो, यह तय हो गया की यदि सत्ता में आना है तो हमाम में नंगा होना ही होगा. इमानदार या तो परेशान हुए या प्रताड़ित.

बारिश का पानी घरों में घुसता हुआ एक समाचार देखा, जिसमे पार्षद अपने वार्ड के मतदाताओं को झाड़ते हुए कहता है- ” मैं तुम्हारे बाप का नौकर नही हूँ, यदि पानी घरों में घुस रहा है तो अपने मकान ऊँचें करवाओ, मेरी जान मत खाओ. ”  ये है वार्ड प्रतिनिधि.

इनसे आगे चलें. मिलते है शिवराजसिंह से, नर्मदा बचाओ आन्दोलन के आंदोलनकारियो के बारे में वे कहते हैं- मेरे पास आयेंगे तो बात करूंगा, मैं कोई कमांडो लेकर थोड़े चलता हूँ, सीएम् साहेब यह वे लोग हैं, जो तेरह दिन से गंदे पानी में गले तक समाये हुए है और मांग कर रहे है बाँध की ऊंचाई पर ध्यान दिया जाये. उनके शरीर गल रहे है. बीमार हो रहे है. अब वे आपसे मिलने राजधानी भला कैसे जायेंगे! सोचिये जरा.

आप तो गरीबों के मुख्यमंत्री बनने की दुहाई देते है. फिर इतने निष्ठुर कैसे हो सकते हैं. टाइम निकालकर उनसे मिल लेंगे तो बेचारों की जान बच जाएगी. आखिर चुनावी सभाओं में भी तो आप जाते हो.

गरीबों की हालत के बारे में ऐसे और भी किस्से सुनने और पढने मिल जायेंगे. अभी तो सबका ध्यान कोल ब्लाक आवंटन पर लगा हुआ है. किसने-कितना समेटा. कौतुहल का विषय यही है. ऊँची कालर का सच सामने आ गया है. सबकी निगाह न्यूज़ पेपर, टीवी पर लगी है. परन्तु अंदर कोई नही गया. यही अपराध और किसी से हो गया होता तो वह जेल की सलाखों के पीछे होता. जमानत के लिए एडियाँ घिसता. विकल्प के चक्कर लगता रहता. किन्तु यहाँ बात दूसरी है. मामला हाई प्रोफाइल है, कोई दो राय नही की ये सब खुद को निरपराध साबित कर दें. हम इतने दब्बू कैसे हो गये, क्या भूल गये हो भगतसिंह जैसे क्रन्तिकारी इसी देश की सन्तान हैं.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 Comments

  1. दिलीप सिकरवारा जी ने जो लिखा है वो आज का आइना है ! हम भारतए है.इस भारत की मिटटी ने सुभास चन्द्र बॉस,भगत सिंह जैसे गर्म खून वाले पुट को जना है तो महत्मा गाँधी और पंडित नेहरु जैसे अहिंसा के पुजारियों को भी जना है.भगत और बॉस ने हमें सिखाया जब कोई रास्ता न बचे तो आमने सामने की लड़ाई लड़ लेनी चैये जो अभी इरान और सीरिया जैसे देशीं में हो रहा है ऐसी वक़्त तो नहीं आया है पर हमे गाँधी जी ने सिखाया है की लम्बी ही सही पर अहिंसा से भी बड़ी-से-बड़ी जंग जीती जा सकती है ,पर हम क्या इन दोनों फोर्मेट में कही भी फिट बैठते हैं नहीं न ?क्यों नहीं आखिर हम सब भी तो इसी मिटटी के पैदावार हैं फिर क्यों नहीं ?क्योंकि हमारा जमीर मर चूका है ,खून पानी बन चूका है,हम स्वार्थी हो चुके हैं,अपने स्वार्थ में अंधे हो चुके हैं ,तभी तो हम अपना प्रतिनिधि चुनते वक़्त उसका व्यक्तित्व नहीं देखते ,सिर्फ उसकी जाट देखते हैं ,उसका धरम देखते हैं या फिर उसकी गुंडागर्दी से डरकर उसे चुनते है….[.बहुत कुछ बाकि है कहने को पर आप ही की तरह हमारे पास भी समय नहीं है,,]दिलीप सिकरवारा जी का भी धन्यवाद जो उन्हने हम सब को जगाने का कम कर रहे ,पर हम और आप क्या कर रहे हैं …जागो………जागो……..जागो……जागो…….

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