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GNN में तीसरी बार सत्ता पलटी, राघवेश अस्थाना भी हुए टीम समेत आउट

By   /  July 25, 2011  /  1 Comment

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वैसे तो इन दिनों लगभग हर जगह उठापटक का माहौल है, लेकिन अभी-अभी लांच हुए चैनल GNN न्यूज में तो मानों रिकॉर्ड ही टूट गया। चैनल में उठापटक का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है। ताजी सूचना ये है कि सीईओ राघवेश अस्थाना को यहां से जाना पड़ा है। खबर है कि उनके साथ एसोसिएट एडिटर वीएन झा, आउटपुट हेड मधुकांत श्रोतिय और प्रोग्रामिंग हेड श्रीनिवास ने भी इस्तीफा दे दिया है।

हालांकि मधुकांत ने मीडिया दरबार को बताया था कि उन्होंने अपना इस्तीफा नहीं सौंपा है, लेकिन राघवेश अस्थाना ने सभी के इस्तीफे की पुष्टि की। सूत्रों का कहना है कि प्रबंधन और इस्तीफा देने वाले वरिष्ठों में कुछ मतभाद थे जिनके न सुलझ पाने के कारण यह उलटफेर हुआ। गौरतलब है कि इन लोगों ने पिछले दिनों चैनल सुचारू रूप से चलाने के लिए प्रबंधन की अनुमति के बिना ही कुछ बड़ी टीम बना ली थी जिसके बाद कई मीडियाकर्मियों को इस महीने की तनख्वाह तक नहीं मिली थी।

उधर राघवेश अस्थाना कैम्प के लोगों का कहना है कि  वे प्रबंधन की नीतियों से नाराज होकर और ढेर सारे मीडियाकर्मियों को तनख्वाह न मिलने के विरोध में चैनल छोड़ रहे हैं। खबर है कि सोमवार को पूरे दिन जीएनएन न्यूज के कार्यालय में गहमा-गहमी का माहौल रहा। दिन भर चर्चाएं होती रहीं कि जिन्हें तनख्वाह नहीं मिली है उनकी छंटनी हो जाएगी। प्रबंधन इस बात से नाराज़ था कि राघवेश ने छोटी टीम का वादा कर जरूरत से ज्यादा लोगों को भर्ती कर लिया है जबकि राघवेश का कहना था कि प्रबंधन ने इतने कम लोगों के नियुक्ति की अनुमति दी थी जिनसे चैनल चलाना असंभव था।

बताया जाता है कि अधिक भर्ती किए गए लोगों की तनख्वाह के  मुद्दे पर जब बीच का कोई रास्ता नहीं निकल सका और प्रबंधन का इशारा होने के बाद राघवेश अस्थाना, वीएन झा, मधुकांत श्रोतिय और श्रीनिवास को इस्तीफा दे देना पड़ा.

इस तरह अपनी शुरुआत से बमुश्किल एक साल के भीतर तीसरी बार यह चैनल मुखिया विहीन हो गया है। इससे पहले दो चैनल प्रमुखों अमिताभ भट्टाचार्य और शिव कुमार राय को तब ही इस्तीफा देना पड़ा था तब चैनल लांच भी नहीं हुआ था । खास बात यह है कि अभी भी यह तय नहीं हुआ है कि चैनल में कितने लोग रहेंगे और कितनों को गुडबाय कहना पड़ेगा।

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. sanjay tiwari says:

    समुन्द्र में गोते लगाने के बाद राग्वेश तालाब का पानी कैसे पीते, पहले प्रज्ञा ,महुआ जैसे संसथान को चूसने के बाद छोटे तालाब का पानी तो उन्हें कड़वा ही लगेगा ….
    लोग patani क्यों संस्थानों का पैसा चूस कर अपनी जेबे गरम करते रहते हैं

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