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बिना बरसे ही लौट गया संसद का मानसून..!

By   /  September 8, 2012  /  2 Comments

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-प्रणय विक्रम सिंह||

संसद का मानसून सत्र कोयले की आग में जलकर राख हो गया. संसद के दोनो सदन लोकसभा और राज्यसभा अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिए गये. संसद ठप्प होने से निराश सभापति हामिद अंसारी ने कहा कि यह सत्र काम न होने के लिए याद रहेगा. इसमें मात्र 11 सवाल पूछे जा सके. इस बार का मानसून सत्र आठ अगस्त से शुरू होकर 7 सितंबर तक था. पूरे सत्र में 75 फीसदी काम नहीं हुआ. सरकार की मानसूत्र सत्र में कोशिश थी कि इस सत्र में 15 नए बिल आए लेकिन इस सत्र में सिर्फ  4 बिल ही पेश हो पाए जबकि 100 से अधिक बिल विचाराधीन पड़े हुए हैं. बेशक यह पहला मौका नहीं होगा, जब संसद का कमोबेश पूरा सत्र ही सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच किसी टकराव की भेंट चढ़ जाये, लेकिन यह जरूरी तो नहीं कि अतीत की गलतियों को दोहराया ही जाता रहे. आखिर अतीत की गलतियों से कुछ तो सबक सीखे जाने चाहिए. ज्यादा अतीत में न भी लौटें तो मनमोहन सिंह सरकार के दूसरे कार्यकाल में ही टूजी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी बनाने की मांग को लेकर विपक्ष ने एक पूरा सत्र नहीं चलने दिया था. आखिरकार जेपीसी बनी, तो संसद चली. ऐसे में यह स्वाभाविक सवाल अनुत्तरित है कि संसद का एक पूरा सत्र बर्बाद किये बिना सरकार विपक्ष की जेपीसी बनाने की मांग क्यों स्वीकार नहीं कर सकती थी. अब कोयला घोटाले में प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर संसद ठप्प करने के अपने फैसले के समर्थन में भी भाजपा ने वही उदाहरण प्रस्तुत किया है. उसका दूसरा तर्क है कि जब टूजी स्पेक्ट्रम आवंटन में कैग रिपोर्ट के आधार पर ही प्रधानमंत्री संचार मंत्री ए.राजा का इस्तीफा ले सकते हैं, जिन्हें खुद क्लीन चिट दिया करते थे, तो अब कोयला घोटाले में कैग रिपोर्ट के बाद उन्हें भी इस्तीफा दे देना चाहिए, क्योंकि जिस अवधि का यह घोटाला है, उस अवधि में ज्यादातर समय कोयला मंत्रालय वह स्वयं ही देख रहे थे. उधर प्रधानमंत्री ने संसद में हंगामे के बीच ही दिये बयान में कोयला मंत्रालय के सारे फैसलों की जिम्मेदारी तो ली पर बिना नीलामी 142 कोयला खदानों के आवंटन से सरकारी खजाने की कीमत पर निजी कंपनियों को एक लाख 86 हजार करोड़ रुपये का लाभ पहुंचाये जाने संबंधी कैग रिपोर्ट के आकलन को तथ्यहीन और दोषपूर्ण भी बताया. लोकतंत्र की खासियत यही है कि इसमें तमाम असहमति के बावजूद सबको अपनी बात रखने, उठाने का अधिकार है. तानाशाही में विरोध की आवाजें किस प्रकार दबा दी जाती हैं, इसके कई उदाहरण इतिहास और हाल की घटनाओं में भरे पड़े हैं. लेकिन भारत की हाल की कुछ घटनाओं को देखें तो ऐसा आभास होता है कि यहां भी लोकतंत्र की जड़ें खोखली करने की साजिश चल रही है, हालांकि जनता अपनी समझदारी से फिर उन जड़ों को पक्का कर देती है. जनता पूरे विश्वास के साथ जिन्हें अपना प्रतिनिधि बनाकर संसद में भेजती है, यह उनका प्रथम कर्तव्य होना चाहिए कि वे जनहित के मुद्दों पर संसद में चर्चा का माहौल बनाएं और सत्र का एक मिनट भी बर्बाद न होने दें. खेदजनक बात है कि पिछले कई सत्रों का महत्वपूर्ण समय बर्बाद करके हमारे सांसद कोई अच्छी मिसाल कायम नहीं कर रहे हैं. सदन के समय की बर्बादी का रिकार्ड तो खैर 2-जी स्पेक्ट्रम मुद्दे पर ही बन गया था. एक बार वर्ष 1992 में संसद सत्र लगातार 17 दिनों तक नहीं चल पाया था. लेकिन 2-जी स्पैक्ट्रम घोटाले में यह रिकार्ड टूट गया था. यूपीए-1 के आंकड़ों को देखें तो केवल शुरू के चार सालों यानी 2004 से 2007 के बीच ही दोनों सदनों में 720 घंटे 29 मिनट कोई काम नहीं हो सका था और इसके कारण एक अरब से ज्यादा रुपए बर्बाद हुए थे. सन् 2004 में संसद के दोनों सदनों में 145 घंटेए 2005 में 148 घंटेए 2006 में 163 घंटे और 2007 में लगभग 253 घंटे बर्बाद हुए. यूपीए-2 में तो यह रिकार्ड भी जरूर टूटेगा, ऐसा कहा जा सकता है. एक जमाना था कि जब संसद में होने वाली बहस को लेकर सभी में उत्साह देखा जाता था. आज भी ऐसे बहुत से भाषणों को उद्धृत किया जाता है जो सदन में ही दिए गए. लेकिन पहले और अब में क्या अंतर आया है? यह इस आंकड़े के द्वारा समझा जा सकता है कि 1958 में लोकसभा की 125 और राज्यसभा की 91 बैठकें हुई थीं. उसकी तुलना में वर्ष 2008 में संसद के दोनों सदनों की केवल 46 बैठकें हुई थी. हर बार जब ये आंकड़े सामने आते हैं तो हमारे राजनीतिक दल सदन की कार्यवाही को गंभीरता से लेने की कसमें भी खाते हैं. कितने ही आयोजनों में इस तरह के संकल्प लिए जाते हैं लेकिन सदन में जाते ही ये संकल्प भुला दिए जाते हैं. बल्कि यह सुझाव तक सामने आया है कि हर सदन के लिए न्यूनतम बैठकों की संख्या कानून बनाकर निर्धारित की जाये. लेकिन न तो हमारी सरकार व न ही हमारे विपक्षी दल ऐसा कोई कानून बनाने को तैयार हैं. संसद को प्राणवान और गतिशील बनाए रखने की मुख्य जिम्मेदारी सत्तापक्ष की है और विपक्ष की भी. सत्तापक्ष और विपक्ष परस्पर शत्रु नहीं होते. दोनों संसदीय व्यवस्था में पूरक हैं. पंडित नेहरू ने सत्ता और विपक्ष के बीच सहयोग को ही संसदीय प्रणाली की सफलता का आधार बताया था. संसद संवैधानिक संस्था है. जीवंत और आदर्श गतिविधि में यह लोकमंगल का श्रेष्ठतम उपकरण है, राजनीतिक दुरुपयोग में इसकी ताकत दुर्भाग्यपूर्ण कहर भी ढाती है. भारत के अनेक अधिनियम सर्वोच्च न्यायपीठ ने गलत बताए. न्यायपीठ ने संविधान की दुहाई दीए लेकिन सत्ता ने वोट बैंक के लोभ में संसद की ताकत का बेजा इस्तेमाल किया. संविधान में फिर से संशोधन किए गए. संसद सत्ता राजनीति का उपकरण बनाई जा रही है. संविधान ने सरकार को संसदीय प्रभुता के अधीन रखा है. संसदीय विश्वास ही सरकार का जीवन है और संसदीय अविश्वास सरकार की मृत्यु, लेकिन यहां सब कुछ उल्टा-पुल्टा है. संसद सरकार की इच्छा से चलती है और सरकारी इच्छा से बाधित भी होती है. एक मंत्री हाल ही में राज्यसभा के सभापति को सदन स्थगित करने का आग्रह करते रिकॉर्ड किए गए हैं. अगर आंकड़ो पर गौर करें तो संसद की एक दिन की कार्यवाही पर एक करोड़ सात लाख का खर्चा आता है. जिसमें छत्तीस हजार हर मिनट, इक्कीस लाख हर घंटा और एक करोड़ सात लाख का खर्चा तब आता है जब संसद में पूरे दिन काम नहीं होता है. एक पूरा सत्र बर्बाद हो गया लेकिन लेकिन गंभीर प्रश्न यह है कि क्या संसदीय प्रणाली में इस बात को मानते हुए भी किसी सदन की कार्यवाही में गतिरोध उत्पन्न करना, नारेबाजी करना इत्यादि संसद की गरिमा को कम करता है तो भी इस प्रकार की स्थिति बार-बार उत्पन्न क्यों होती है? भारतीय संसद की साठवीं वर्षगांठ के अवसर पर 13 जुलाई के विशेष अधिवेशन में दिए गए भाषणों में जो वादे किए गए थे, क्या वे केवल दिखावा मात्र थे. यदि नहीं, तो फिर उनकी पुनरावृत्ति क्यों की जा रही है. पर जवाब कौन दे, अब तो संसद ही मौन है. 

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 Comments

  1. जुस्त क्रिमिनक वास्ते ऑफ़ पब्लिक मोनी फॉर ठिर अल्लोव्न्सस इन मंस्सून sesstion

  2. संसद का न चलना एक दुखद घटने है क्योंकि इसमें प्रति दिन एक करोड़ से ज्यादा का खर्च होता है जो जनता के पैसे की बर्बादी है पर सुषमा जी ने जो कहा की एक लाख ८६ हज़ार करोड़ के सामने कुछ करोड़ koi मायने नहीं रखता यह सही भी है पर संसद का न चलने देने से जनता को हासिल क्या हुआ !.सीबीआई जाँच का आदेश सर्कार पहले ही दे चुकी थी फिर संसद न चलने देने से देश को ,जनता को,और बीजेपी को क्या हासिल हुआ ये सुषमा जी को जबाब देना चाहिए! संसद सत्र को बर्बाद करके बीजेपी ने कोयला घोटाले का सारा ठीकरा कांग्रेस पर फॉर दिया लेकिन सच्चाई क्या है वो अब धीरे -धीरे जाँच के दौरान जनता के सामने आ रही है !एक सच्चाई जब ये सामने आई की उड़ीसा के मुख्यमंत्री और बीजेपी के श्री रवि शंकर प्रसाद ने भी अपने पसंदीदा लोगो को कोयला खान आवंटन की सिफारिश की जिसकी कॉपी भी मीडिया ने दिखाया है तो अब बीजेपी को बताना चाहिए की क्या उनकी पार्टी दूध की धूलि थी जो उसने संसद को न चलने देकर घोटाले की रकम में और हजारों करोड़ की बढ़ोतरी की ?

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