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इंसाफ के मंदिरों में भी होता है, नारी देह शोषण..

By   /  September 9, 2012  /  1 Comment

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जिस देश में दूसरों को इंसाफ दिलाने वाली महिला वकील ही अपने सहयोगियों की ही नहीं बल्कि मुवक्किलों के यौन शोषण का शिकार बनती हों और उन्हें अपनी अस्मत बचा कर काम करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करनी पड़े तो हमारे लिए ऐसे में शर्मिंदगी और जलालत झेलने के सिवाय बचता ही क्या है.

इस देश की तमाम निचली अदालतों से लेकर सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट तक में महिला वकीलों का यौन शोषण हो रहा है और न्याय के मंदिर अपने प्रांगण में नारी के साथ हो रही इस नाइंसाफी के चलते अन्याय और नारी उत्पीडन स्थल बन रहे हैं.  63 महिला वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर यह सच उजागर किया है कि देश भर की अदालतों में ऐसा ही हो रहा है. इनमें से कई महिला वकीलों ने एक दशक से ज़्यादा लंबे समय तक सुप्रीम कोर्ट तक में प्रैक्टिस की है. महिला वकीलों का कहना है कि, हमें सुप्रीम कोर्ट से इंसाफ चाहिए. याचिका दाखिल करने वाली महिला वकील महिलाओं के साथ कोर्ट परिसर में भेदभाव और उनके यौन उत्पीड़न की घटनाओं को जानती हैं. हम चाहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट वकालत जैसे सम्मानित पेशे में काम कर रही महिलाओं को राहत दे.

याचिकाकर्ता महिला वकीलों ने कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट या अन्य किसी भी कोर्ट में महिला वकीलों के लिए कोई फोरम नहीं है जहां वे यौन उत्पीड़न करने वाले अपने पुरुष सहयोगियों या पुरुष मुवक्किलों के खिलाफ शिकायत कर सकें.’

1997 के विशाखा जजमेंट के तहत सुप्रीम कोर्ट ने कुछ गाइडलाइंस तय की थीं. इनके मुताबिक सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट और सभी ट्रायल कोर्ट में महिला के नेतृत्व वाली समितियों का गठन किया जाना था. इन समितियों में महिला सदस्यों की संख्या बहुमत में रखे जाने की बात कही गई थी. इन समितियों का काम महिलाओं के खिलाफ होने वाले यौन शोषण के मामलों में महिलाओं को इंसाफ दिलाना था. याचिका दाखिल करने वाली महिला वकीलों के मुताबिक, ‘अभी तक ऐसी कोई कमिटी या फोरम नहीं बनाया गया है. ऐसी समितियों या फोरम के गठन की तुरंत जरुरत है.’

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. देश और नागरिक समाज के लिए यह गंभीर चिंता का विषय है

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