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फेसबुक के मित्र और टेंशन….

By   /  September 12, 2012  /  2 Comments

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-आलोक पुराणिक||

दुनिया बहुत छोटी है, इंटरनेट की दुनिया तो और भी छोटी है।
फेसबुक पर पहुंचते ही धरपकड़ हो जाती है।
इंटरनेट दिखाता है कि हम आनलाइन हैं।
जी मेरी कविता देख लीजिये, मेरा व्यंग्य देख लीजिये, ठीक है या नहीं। मैसेज बरसने लगते हैं।
अब जी हम अपना व्यंग्य ठीक करने में लगे हैं, औरों के क्या ठीक करेंगे। कविता में सुना है, एक साथ लोग अपनी कविता भी कहते हैं और उस्ताद भी हो जाते हैं। व्यंग्य वह फुरसत नहीं देता। बंदा अपना भर कर ले, बहुत है।
खैर जी, मैं फौरन से मैसेज लिखता हूं-पापा घर पर नहीं हैं, मैं उनकी बेटी हूं।
पर एक मैसेज फिर आता है-जी मुझे पता है, आप ही हैं। आप नाराज टाइप हैं। इसलिए बात नहीं कर रहे हैं।
अब लो, इसका क्या किया जाये।
आनलाइन दुनिया बहुत मजे की है। एक बड़े विद्वान ने दोस्ती के बारे में लिखा था-कि अगर आपके पास एक मित्र है, तो आप बहुत भाग्यशाली हैं और अगर आपके पास दो मित्र हैं, तो आप से ज्यादा भाग्यशाली कोई नहीं है।
पर फेसबुक पर देखिये, मेरे अपने ही करीब पांच हजार दोस्त हैं। सोचता हूं कभी इनकी दोस्ती आजमाऊं और फेसबुक पर लिख दूं कि जो भी मेरे सच्चे दोस्त हैं, सब सौ सौ रुपये मेरे एकाउँट में फौरन डलवायें। मित्रता का भ्रम जाता रहेगा।
फेसबुक की मित्रता में वैसे कई झमेले हैं। फेसबुक पर भेष बदलकर लोग मिलते हैं
एक फेसबुकी मित्र को मैंने लिखा-आपकी फोटू तो बहुत ही ज्यादा कैटरीना कैफ से मिलती है।
उन्होने वापस लिखा कि फोटू उनके प्रोफाइल पर कैटरीना कैफ की ही है। अपनी फोटू नहीं लगातीं वह।
यह नेट पर दोस्ती पर संभव है कि बंदा या बंदी फोटू कैटरीना कैफ के लगाये और शेर गालिब का लगाये, बस फ्रेंडशिप ही अपनी रखे।
नेट पर मामले बहुत पेचीदा हैं। एक मैसेज आया कि आर यू इंटरेस्टेड इन ममता फ्राम बंगलूर।
जी अब यह बहुत बेहूदा सवाल है। ममताजी अगर टमाटर सस्ते बेचती हों, तो मैं इंटरेस्टेड हूं। पर सवाल यह है कि ममताजी भी तो इंटरेस्टेड हों ।
फेसबुक पर एक सज्जन का मैसेज मिला-आलोकजी, आप यह क्या कर रहे हैं। आप मल्लिका सहरावत प्रशंसक मंडल के अध्यक्ष बन गये।
मुझे पता नहीं चला। मैं मल्लिकाजी का बहुत विकट वाला फैन बन गया।
फेसबुक पर कुछ पता नहीं, आपको कौन किस ग्रुप से जोड़ जाये।
मुझे एक साथ हनुमान भक्त समूह और मल्लिकाजी के समूह से जोड़ दिया गया। बाद में मुझे पता लगा कि मैं दोनों समूहों में हूं। और मेरा आचरण यथोचित होना चाहिए।
यह पासिबल है कि आपको एक साथ ही शाकाहारी समूह और मांसाहारी मंडल का सदस्य बना लिया जाये।
सो साहब, मसले पेचीदा हैं। फेसबुक पर आकर तो देखिये ना।

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 Comments

  1. Kumar Rajnish says:

    bahut hi barikio ko pakad..khoobsurati se vyang kiya hain aapne.

  2. mahendra gupta says:

    बहुत सुन्दर, बड़ा सच , सब फर्जी,

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

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