Loading...
You are here:  Home  >  मीडिया  >  कला व साहित्य  >  व्यंग्य  >  Current Article

हम ट्रस्टन के, ट्रस्ट हमारे

By   /  September 13, 2012  /  No Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

-आलोक पुराणिक||

2004-05 से 2010-11 कांग्रेस को मिले बतौर आय 2008 करोड़ रुपये, बीजेपी को मिले 994 करोड़ रुपये, बीएसपी को 484 करोड़ रुपये और तो और पूंजीवाद की धुर विरोधी पार्टी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को भी 417 करोड़ रुपये मिले। डिमॉक्रेसी के घाट पे बरसे नोट अनेक, ज्यादा धरे कांग्रेस ने सीपीएम को मिले कुछेक।

और खबरदार, जो कहा कि उद्योगपतियों ने दिए कुछ लाइसेंस नफा की उम्मीद में। ना ट्रस्टों ने दिए हैं। ट्रस्ट जी किसी के भी हों हमें क्या। दान-परोपकार की बातें हैं, बड़े उद्योगपति बना देते हैं ट्रस्ट। हम ट्रस्टन के, ट्रस्ट हमारे।

परम बैरागी मुद्रा की तस्वीरें उभर रही हैं। नेता कंठी माला हाथ लिए कह रहा है, ट्रस्ट की दान परोपकार की बातें हैं। ट्रस्ट में सुभीता है, ट्रस्ट इधर भी दे देता है, फिर उसकी विरोधी पार्टी को भी दे देता है। भामाशाह आज ऑपरेट कर रहे होते तो ट्रस्ट बना देते। भामाशाह ट्रस्ट यह कुछ रकम महाराणा प्रताप को देता, फिर जस्ट टु बी ऑन सेफ साइड कुछ रकम अकबर को भी।

प्रेमचंद की कहानी है – नमक का दारोगा। इसमें बंशीधर नामक ईमानदार दारोगा एक रईस बंदे अलोपीदीन की रिश्वत रिफ्यूज करता है, नौकरी से निकाला जाता है। अब सीधा यूं होता कि अलोपीदीन ट्रस्ट बनाकर बंशीधर के ट्रस्ट को दे देते। बंशीधर दारोगा कहते – जी ट्रस्टों के परोपकारी मामले हैं, हम क्या करें।

सूखाग्रस्त कर्नाटक के विधायक स्टडी टूर पर जाकर विदेशों में टैंगो डांस कर रहे थे। सरकारी खर्च पर हल्ला मचा। टूर कैंसल हुआ। बेहतर था कि विधायक ट्रस्ट बनाते, जिसे कोई और ट्रस्ट डोनेशन देता। इस डोनेशन से विधायक स्टडी टूर में टैंगो डांस करते। हल्ला मचता तो कहते कि विधायक बतौर विधायक नहीं, रिसर्चर के तौर पर टैंगो डांस पर रिसर्च करने गए हैं, रिसर्च का खर्च दूसरे ट्रस्ट के डोनेशन से आया है।
हम ट्रस्टन के, ट्रस्ट हमारे।

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

You might also like...

मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या हँस रहे हैं

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: