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खरा सोना हैं अंबिकानंद सहाय

By   /  May 27, 2011  /  6 Comments

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कहते हैं थानेदार की ईमानदारी का पता करना हो तो चोर से पूछो… भारतीय पत्रकारिता में राडिया और अमर सिंह के फोन कॉल सार्वजनिक होते ही जितने भी तथाकथित थानेदार पत्रकार थे सब की कलई खुल गई, लेकिन कोई ऐसा भी है जो खालिस सोने की तरह चमक रहा है। अंबिकानंद सहाय ऐसे ही सोने से बने हैं जिनके बारे में अमर सिंह की टिप्पणी ध्यान खींचती है। श्री सहाय सहारा मीडिया के तत्कालीन वरिष्ठ उपाध्यक्ष और संपादकीय प्रमुख थे और आजकल एक छोटे से चैनल आजाद न्यूज के न्यूज डायरेक्टर हैं।
राडिया और अमर सिंह के टेप किए हुए फोन कॉल्स ने भारतीय राजनीति, पत्रकारिता, सिनेमा और कॉरपोरेट की काली दुनिया को एक साथ बेपर्दा किया है। जो भारतीय पत्रकारिता कभी कमलेश्वर, राजेन्द्र माथुर और रघुवीर सहाय जैसे समर्पित पत्रकारों की धरोहर हुआ करती थी, उसे प्रभु चावला, रजत शर्मा और राजीव शुक्ला जैसों ने दलाल राजनेताओं की रखैल बना दिया है। किसी मामले में आजतक को नोटिस दिए जाने की धमकी से भयभीत प्रभु चावला जब अमर सिंह को फोन लगाते हैं, तो सीधी बात जैसे कार्यक्रमों में अपने सवालों से राजनेताओं को परेशान कर देने वाले जनता के प्रतिनिधि गिड़गिड़ाते नजर आते हैं। प्रभु चावला, अमर सिंह से इस अंदाज में बात करते सुनाई देते हैं मानो उनके कहने पर वो आजतक और इंडिया टुडे में कुछ भी दिखाने-छापने को तैयार हो जाएंगे।
एक अन्य संदर्भ में अमर सिंह रजत शर्मा को अपना बुलडॉग बता रहे हैं। नीरा राडिया के साथ बातचीत के टेप में एनडीटीवी की बरखा दत्त यह तय करती नजर आ रही है कि किसे मंत्री बनवाना है और सहारा उपेन्द्र राय की नजर में वही राडिया सबसे बड़ी पत्रकार और रिसर्चर हैं तभी तो वे अपनी स्टोरी के लिए ही सही राडिया मैडम से विचार-विमर्श करते नजर आ रहे हैं। ये अलग बात है कि अब उन सब पर प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों पर दबाव बनाने जैसे गंभीर अपराध का मामला चल रहा है। कुल मिलाकर कलमनवीसी का दलाली और सियासत के साथ खूब घालमेल दिख रहा है।

यह बातचीत तब की है जब अमर सिंह सहारा मीडिया के निदेशक हुआ करते थे। अंबिकानंद सहाय शायद एकमात्र पत्रकार हैं, जिनके संदर्भ में बात करते हुए अमर सिंह मान रहे हैं कि उन्हें ‘मैनेज’ नहीं किया जा सकता। पूरी बातचीत संकेत कर रही है कि अंबिकानंद सहाय अपने कामकाज में अमर सिंह को हस्तक्षेप की इजाजत नहीं दे रहे थे। अमर सिंह के साथ विवाद की वजह से ही बाद में अंबिकानंद सहाय ने सहारा को अलविदा कह दिया था। बहरहाल, आइए सुनते और पढ़ते हैं पूरी बातचीत। ये बातचीत अभिजीत (सरकार) और अमर सिंह के बीच हुई है। अभिजीत सहारा श्री सुब्रत राय के दामाद हैं।

अभिजीत—हलो..

अमर सिंह—हां अभिजीत..

अभिजीत—जी जी जी सर, सर…

अमर सिंह—वो असल में …वो दूसरे लाइन पर कोई आ गया था। (ये सब कहते हुए अमर सिंह जोर जोर से हांफ रहे हैं)

अभिजीत—जी सर जी सर

अमर सिंह—हां क्या पूछ रहे थे तुम?

अभिजीत—मैं बोल रहा था, कोई प्रॉब्लम हो गया था क्या शैलेन्द्र वगैरह के साथ

अमर सिंह—नहीं शैलेन्द्र वगैरह से ज्यादा प्रॉब्लम अंबिका (नंद) सहाय के साथ है और सुधीर श्रीवास्तव के साथ है।

अभिजीत—क्या हुआ है सर

अमर सिंह— प्रोब्लम ही प्रोब्लम है। बात ये है कि कोई ……नहीं है। मने कोई कुछ भी करना चाहे करे, उसमें हमें कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन, अगर दादा ने बोला है तो ये लोग कुछ भी करें बता दें। हमारी जानकारी में रहे।

अभिजीत— डू यू वॉण्ट मी टू इनिशिएट समथिंग।

अमर सिंह—नहीं नहीं कुछ नहीं। मैंने तो चिट्ठी भेज दी कि मैं रहूंगा नहीं इसमें और मैं रहने वाला भी नहीं हूं। इनिशिएशन क्या करना है?

अभिजीत—नहीं, फिर उनलोग को बोलें जा के कि आपसे मिलें और क्या।

अमर सिंह— नहीं नहीं मुझे जरूरत नहीं है। हलो।

अभिजीत—जी सर।

अमर सिंह—मेरा काम तो चल जाएगा।

अभिजीत—नहीं, आपका तो चल ही जाएगा सर। उनलोगों को तो मिलना चाहिए न? दे शुड पे रेस्पेक्ट टू यू न सर?

अमर सिंह—नहीं नहीं, वो नहीं करेंगे। अंबिका (नंद) सहाय वगैरह नहीं करेंगे। उनकी ज्यादा जरूरत है परिवार (सहारा परिवार) को।

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

6 Comments

  1. रवि पांडे says:

    मनोज बिलकुल सही कह रहे हैं.अंबिकानंद सहाय सचमुच एक दलाल पत्रकार हैं। ऐसे पत्रकार नौकरी के लिए कुछ भी कर सकते हैं। जिंदगी भर सहाय ने दलाली के सिवा कुछ नहीं किया। उन्होंने अंग्रेजी में पत्रकारिता की भी तो भाई की बदौलत जो बड़े पत्रकार थे। उनकी पूंछ पकड़कर पत्रकार बन गए अंबिकानंद। वरिष्ठ पत्रकार कहलाते हैं लेकिन उनका न तो कोई किताब मिलता है न ही कोई लेख। दूसरों के लिखे लेख अपने नाम से छपवाते हैं ये साहब। ऐसे पत्रकारों से देश और पत्रकारिता बच जाए तो गनीमत हो। लेखक को शानदार लेख के लिए बधाई।

  2. rakesh says:

    जिसे सहाय के बार में ज्यादा जानना हो वो ये पढ़ ले.. http://mediadarbar.com/26160/ambikanand-sahay-wents-to-bhopal-after-closing-down-azad-news/

  3. ravi says:

    सहाय जी को बधाई। अमर सिंह के दल्ले मनोज बहुत बड़ा दल्ला मालूम पड़ता है

  4. ravi says:

    मॉडरेटर महोदय..इतना अच्छा लिखा आपने। धन्यवाद..लेकिन मनोज जैसे गंदे लोगों के गंदे कमेंट तो हटा लीजिए..ऐसे लोगों को मंच क्यों दे रहे हैं…आप ही सहाय जी को सोना बता रहे हैं..और आप ही ऐसे कमेंट को भी प्रमोट कर रहे हैं….

  5. अभिषेक says:

    श्री मनोज जी से यह पूछना चाहता हूं कि क्या हर शख्स में कमियां ढूंढना ही इंसान का मकसद होना चाहिए? अरे मेरे भाई, कभी तो अपने ज़मीर की सुना करो.. कमियां किस इंसान में नहीं होतीं? मुझे तो आप ही अमर सिंह के चमचे लगते हैं। कम से कम एक शख्स तो मिला जो आपके आका से मैनेज नहीं हुआ? यह आपकी बैखलाहट है श्रीमान जी।

  6. manoj says:

    अंबिकानंद सहाय बहुत बडे दोगले टाइप के दल्ले हैं. उन के पास पत्रकारिता के नाम पर सिवाय दलाली के कुछ नहीं है. एक समय में अमर सिंह के बाप मुलायम सिंह की पिछाडी धोने में इस कदर व्यस्त थे कि पूछिए मत. जब मुलायम ने मायावती को २ जून को अपने गुंडों से पिटवाने की कोशिश की थी तब वह टाइम्स आफ़ इंडिया के पिल्लू थे और और मुलायम सिंह के पिट्ठू. सभी अखबारों में यह खबर लीड थी पर टाइम्स में सार्ट डी सी. इन की एक रखैल थी तब पूर्णिमा सहाय त्रिपाठी. एक आई.पी.एस. की बीवी मंजरी मिश्रा को अंबिकानंद ने नौकरी दे कर बनारस के एक मठ पर कब्जा कर लिया. और जिस को अंबिकानंद सहाय की ईमानदारी पर बडा नाज़ हो वह लखनऊ आ कर अलीगंज स्थित उन का महल देख ले.मायावती के पत्थर शर्मा जाएं. वो क्या खा कर अमर सिंह जैसों का विरोध कर पाएंगे? अब ज़्यादा मुंह न खुलवाएं. बस इतना समझ लें कि अंबिकानंद सहाय पत्रकारिता के नाम पर सिर्फ़ और सिर्फ़ कलंक हैं, बदनुमा दाग हैं.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

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