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मुलायम के भरोसे ममता ठुकराई, खुदरा कारोबार में एफडीआई आई….

By   /  September 14, 2012  /  1 Comment

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आखिरकार केंद्र सरकार ने सारे विरोधों को नज़रअंदाज़ करते हुए किराना में विदेशी निवेश को मंजूरी दे दी है. दिल्ली में आज हुई केंद्र सरकार की बैठक में यह फैसला लिया गया. बैठक में यूपीए की महत्वपूर्ण सहयोगी तृणमूल कांग्रेस का कोई प्रतिनिधि मौजूद नहीं था. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपने इस फासले के पक्ष में यूपीए सरकार की बलि देने को भी तैयार हैं. रिटेल में एफडीआई को मंजूरी दिए जाने के फैसले का बचाव करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा, “बड़े सुधारों का वक्त आ गया है, अगर हमें जाना भी पड़ा तो हम लड़ते हुए जाएंगे.” प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने यह भी कहा कि एफडीआई से किसानों का फायदा होगा और नौकरियां भी बढ़ेंगी.

यूपीए सरकार ने एयरलाइंस में 49 प्रतिशत और मल्टीब्रांड किराना स्टोर्स में 51 प्रतिशत विदेशी निवेश और सिंगल ब्रांड रिटेल में 100 प्रतिशत विदेशी निवेश की मंजूरी दे दी है. डीटीएच और केबल नेटवर्क में केंद्र सरकार ने 74 फीसदी तक विदेशी निवेश की मंजूरी भी दी है.

गौरतलब है कि संसद के पिछले सत्र में विदेशी किराना का मुद्दा छाया रहा था और ममता बनर्जी के विरोध के चलते सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा था.

केंद्र सरकार के इस फैसले का तृणमूल कांग्रेस ने तीखा विरोध किया है. पार्टी के वरिष्ठ नेता कुणाल घोष ने कहा कि हमारी पार्टी और ममता बनर्जी इस फैसले का पुरजोर विरोध करती हैं. कुणाल ने कहा कि हमारे पास संसद में इतनी संख्या नहीं है कि हम फैसलों को रोक सकें लेकिन हमें खुलकर इसका विरोध तो कर ही सकते हैं. कांग्रेस के पास संख्याबल है और यूपीए में उन्हीं की चलती है. कुणाल घोष ने यह भी कहा कि ममता बनर्जी की सरकार ऐसी किसी भी पॉलिसी को पश्चिम बंगाल में लागू नहीं करेगी. यही नहीं कुणाल घोष ने यह भी कहा कि यदि एफडीआई को वापस नहीं लिया गया तो तृणमूल किसी भी तरह का फैसला लेने के लिए तैयार हैं. तृणमूल की मंगलवार को बैठक है जिसमें इस मुद्दे पर फैसला लिया जाएगा.

विदेशी निवेश को किस तरह लागू किया जाना है यह राज्य सरकारें तय करेंगी. आर्थिक सुधारों के नाम पर लिए गए केंद्र सरकार के इस फैसले की बीजेपी और सीपीआई ने तीखी आचोलना की है. विपक्ष ने कहा है कि यूपीए अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए गलत फैसले ले रही है.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. Shrawan kumar Akela says:

    मनमोहन सरकार ने जो पिछले दो दिनों में कठोर कदम उठाये हैं उसे देश हित की दृष्टी से देखे तो बिलकुल सही है !देश के अन्दर आर्थिक हालत ऐसे हो गए थे की देर सवेर ये कदम उठाना ही था !भाजपा जो आज जमता की दुहाई दे रही है ,सायद वो भूल गई है की सब्सिडी ख़त्म करने की प्रक्रिया राजग के साशन कल में ही शुरू हो गई थी जब वाजपेयी जी ने साइनिंग इंडिया का नारा दिया था ,फिर ये आज घद्यालू आंसू क्यों बहा रहे है?सर्कार जो हमें सब्सिडी देती है वो भी किसी दुसरे मद से हम से ले लेती हेई सो इस बार सामने से ले रही है !जिस देश को आज़ाद करने में कांग्रेस्सियो ने अहम् भूमिका निभाई क्या ये देश उसका नहीं है ,सर्कार वो चला रही है और जल्द ही चुनाव में जाना है काया इसकी चिंता उसे नहीं है?पछले आठ सालो के सर्कार में पहली बार महसूस हुआ है की कांग्रेस सर्कार चला रही है! अन्यथा उसके सहयोगी ही अपने मनमुताबिक सर्कार चला रही थी और कांग्रेस को कठपुतली सारकार कहा जाता था!आज कहा गए वो विसेस्ग्य जो टीवी पर बैठकर कांग्रेस को पानी पि-पि कर कोसते थे और कहते थे की कांग्रेस को कठोर फैसले लेने चाहिए !ये सब ब्यूरोक्रेसी है जिसका मतलब कांग्रेस सारकार को हटाना और भाजपा को लाना है!रिटेल के क्षेत्र में किसी गरीबो को या किसानो को नुकसान नहीं होने जा रहा है ,नुकसान उन बिचौलियों को होने जा रहा है जो घर बैठे दलाली करके कड़ोरो कमा रहे थे और ये सब NDA समर्थक हैं !कौन गरीब है जो मौल में सामान खरीदते हैं,वे सभी अपने पास के ही बाज़ार से सामान खरीदते हैं और आगे भी खरीदेंगे !जो एसी मार्केट में जाकर सामान खरीदते है वही मौल में भी जायेंगे उससे किसी गरीब या छोटे व्यापारियों को क्या फर्क पड़ सकता है?हमें ख़ुशी हुई की अगले दो साल चुनावी साल होने के वाबजूद मनमोहन सारकार ने हिम्मत दिखाई!मनमोहन जी ने सही कहा है सारकार रहे या जाये ,देश की आन-बान और शान के खिलाफ कोई समझौते नहीं करेंगे !मै तो कांग्रेस पार्टी को भी सलाह यही दूंगा की वो भी घोसना करे की वो इस बार के लोक सभा के चुनाव अकेले लड़ेगी ,न किसी को समर्थन देगी और न किसी से समर्थन लेगी ?क्योंकि गठबंधन की सारकार देश को नुकसान के सिवा कुछ नहीं दिया इसे समझाने की जरूरत है!कुछ कोगो की रणनीति ही रही है की पिछड़ों में फुट डालो और राज करो!

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