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अंडर एचीवर रातों रात हीरो बन गया….

By   /  September 17, 2012  /  2 Comments

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-पलाश विश्वास||

आर्थिक सुधारों में पिछड़ने के कारण जो अमेरिकी मीडिया डा. मनमोहन सिंह को “अंडर एचिवर” कह रहा था, रातोंरात उसकी नजर में भारतीय प्रधानमंत्री का कायाकल्प हो गया है. अमेरिकी मीडिया एक तरफ तो मनमोहन की तारीफों का पुल बांधने लगा है, दूसरी ओर उनकी सरकार की सेहत के लिए फिक्रमंद भी है. मजे की बात है कि विदेशी मीडिया के मर्जी मुताबिक सरकार और अर्थ व्यवस्था चलाने में अभ्यस्त भारत सरकार को सोशल मीडिया मे अपनी आलोचना नागवार गुजरती है. कारपोरेट मीडिया तो विदेशी मीडिया और अमेरिकी हितों, कारपोरेट लाबिंइंग की तरह जनता का ब्रेनवाश करने में लगी है. सोशल मीडिया में ही सरकार की खुलकर आलोचना होती है. वहां भी कट्टरवादी ताकतों का वर्चस्व है. वहां भी मनोरंजन और सनसनी हावी है. इसके बावजूद जनता को संबोधित करने की यह एक अकेली खिड़की बची है, जिसे बंद करने की पूरी तैयारी है. हाल के दिनों में इंटरनेट और सोशल मीडिया के दुरुपयोग को ध्यान में रखते हुए सरकार ने त्रिआयामी रणनीति तैयार की है, जिसमें एक साइबर सर्विलांस एजेंसी की स्थापना भी किया जाना है जो इस तरह की स्थिति के बारे में पहले ही आगाह करेगी.

इस वक्त अरब वसंत के उलटवार के कारण अमेरिका खासा परेशान है. दुनियाभर में अपने आर्थिक हितों की सुऱक्षा के लिए उसने अपनी और नाटो की सेना तैनात कर रखी है. अरब और बाकी दुनिया में इजराइल को कुछ भी करने की छूट दे रखी है. पर ओसामा बिन लादेन की हत्या के बाद पहली बार अल कायदा का भूत अमेरिका को बेहद डराने लगा है. अब सिर्फ आर्थिक सुधारों के जरिए अमेरिकी कंपनियों के हितों की रक्षा की गरज से ही नहीं, बल्कि आतंक के खिलाफ अमेरिका के युद्ध में भारत की भागेदारी भी अमेरिका के लिए अहम है. अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजंसियों के जरिये लगातार सुधारों के लिए दबाव बनाने वाले अमेरिकी नीति निर्धारकों ने मनमोहन की लगाम अपने और भारतीय मीडिया के जरिए थाम ली है.अपनी भारत सरकार को अमेरिकी मीडिया की आलोचना के लिए सरकार, संसद, नीति निर्धारण और कानून बनाने, बदलने की प्रक्रिया में रातोंरात तब्दीली करने में गर्व महसूस हो रहा है.लेकिन अपने ही लोकतांत्रिक बंदोबस्त के तहत न शरीक दलों, न संघीय ढांचे के मुताबिक राज्यों के मुख्यमंत्रियों और न विपक्ष की राय की कोई परवाह है.राष्ट्र का इस हद तक सैन्यीकरण हो चुका है कि किसी भी जनांदोलन को कुचलने में उसे तनिक परवाह नहीं है.

खुले बाजार की अर्थ व्यवस्था में काला धन और विदेशी पूंजी का वर्चस्व इस कदर है और कारपोरेट चुनावी चंदा की वजह से राजनीतिक दलों पर शिकंजा इतना जबर्दस्त है , सिविल सोसाइटी और जनांदोलन के लिए बने तमाम संगठन कारपोरेट उपहार के लिए खुद को राजनीतिक दल में तब्दील करने को बेताब है, ऐसे में मनमोहन की प्रतिबद्ध अमेरिकी कवायदों का प्रतिरोध करें, ऐसा माई का लाल कौन है? आर्थिक मोर्चे पर कड़े फैसले लेने के बाद अब सरकार का चेहरा बदलने की बारी है. खबरों के मुताबिक, केंद्र से लेकर कांग्रेस शासित राज्यों तक फेरबदल किए जा सकते हैं. फेरबदल के दौरान यह सवाल भी अहम होगा कि सहयोगी दलों को कितनी तवज्जो मिलती है. राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के पं. बंगाल दौरे से वापस आते ही कैबिनेट में फेरबदल किया जा सकता है.सूत्रों के मुताबिक, अहम मंत्रालय मसलन गृह, वित्त, रक्षा और विदेश में बदलाव होने की उम्मीद नहीं है. लेकिन उन मंत्रियों पर से काम का दबाव कम किया जा सकता है जिनके पास एक से ज्यादा महत्वपूर्ण मंत्रालय है. वीरप्पा मोइली, वायलार रवि, कपिल सिब्बल से एक मंत्रालय लिया जा सकता है. ये सभी एक से ज्यादा मंत्रालय के कामकाज को देख रहे हैं.

2014 के आम चुनाव और बीच में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले कैबिनेट में फेरबदल के साथ ही आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान के मुख्यमंत्रियों के बदले जाने की भी खबर है. खबरों के अनुसार आंध्र प्रदेश के एन. किरण कुमार रेड्डी, महाराष्ट्र के पृथ्वीराज चव्हाण और राजस्थान के अशोक गहलोत को सीएम पद से हटाकर नई जिम्मेदारी दी जा सकती है. इन्हें या तो कैबिनेट या फिर कांग्रेस संगठन में जगह दी जा सकती है. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के विदेश से लौटने के बाद आंध, प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान के नेताओं ने उनसे मुलाकात भी की है. जाहिर है कि न मनमोहन और न कांग्रेस को सरकार गिरने का डर सता रहा है. सरकार द्वारा अचानक ही जोरदार तरीके से आर्थिक सुधारों को बढ़ाने की पहल के बाद अब उद्योग जगत की उम्मीदें भारतीय रिजर्व बैंक की सोमवार को पेश होने वाली मौद्रिक नीति की मध्य तिमाही समीक्षा पर टिकीं हैं. उद्योग जगत को इसमें ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद है. एसोचैम के अध्यक्ष राजकुमार धूत ने एक बयान में कहा कि अब समय आ गया है जबकि रिजर्व बैंक को महंगाई को लेकर लगी घुन से कुछ दूरी बनानी चाहिए.

पहले डीजल मूल्यवृद्धि और रियायती दर पर रसोई गैस सिलिंडरों की संख्या सीमित करने का फैसला, अगले ही दिन बहुब्रांड रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) का फैसला और इसके साथ ही आर्थिक मोर्चे पर लिए गए कुछ अन्य फैसलों ने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है.लेकिन जैसे कि आसार थे, एफडीआई पर कड़े आर्थिक फैसलों के बाद सरकार पर मंडरा रहा संकट फिलहाल कमजोर पड़ता नजर आ रहा है. सूत्रों के मुताबिक ममता बनर्जी भले ही सरकार से अपने मंत्रियों को बाहर खींच लें लेकिन वो सरकार से समर्थन वापिस लेने के पक्ष में नहीं दिख रही हैं. टीएमसी सांसद कुणाल घोष ने भी कहा कि टीएमसी सरकार को अस्थिर नहीं करना चाहती. वहीं समाजवादी पार्टी ने भी आज संकेत दिए हैं कि सड़क पर विरोध का असर सरकार की सेहत पर नजर नहीं आएगा.

डीजल के दाम, रसोई गैस में कोटा और रिटेल में एफडीआई के फैसलों के बाद पंश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सरकार को फैसले वापस लेने के लिए 72 घंटे का अल्टीमेटम दे डाला था. कोलकाता में रोड शो के दौरान सरकार को सीधी धमकी भी दी थी कि आम आदमी के लिए जान भले चली जाए लेकिन वो समझौता नहीं करेंगी. लेकिन ममता की अपनी राजनीति है और अपना वोटबैंक है. अल्टीमेटम की मियाद खत्म होने से पहले ही ममता के तेवरों में नरमी आ गई है. तृणमूल कांग्रेस सरकार से समर्थन वापस नहीं लेगी. मंगलवार को संसदीय पार्टी की बैठक में ममता अपने मंत्रियों को सरकार से इस्तीफा देने को कह सकती है. यानि तृणमूल सरकार में शामिल नहीं रहेगी लेकिन बाहर से समर्थन जारी रख सकती है. यूपीए सरकार में तृणमूल के कोटे से 1 केन्द्रीय और 5 राज्य मंत्री हैं. इनमें रेल मंत्री मुकुल रॉय, शहरी विकास राज्य मंत्री सौगत रे, पर्यटन राज्यमंत्री सुल्तान अहमद, स्वास्थ्य राज्यमंत्री सुदीप बंदोपाध्याय, ग्रामीण विकास राज्यमंत्री शिशिर कुमार अधिकारी और सूचना प्रसारण राज्यमंत्री चौधरी मोहन जटुआ शामिल हैं.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 Comments

  1. mare hue haathi se darne ki jaroorat nhi. ab wo sadne lga hai to uski badboo to faelegi hi and value to 2 paise se jyada milegi nhi koi khareedega bhi nhi kyonki junk to recycle bhi ho skta hai. iska kuchh nhi ho skta.

  2. SHARAD GOEL says:

    SONIA NE VITAMIN KA INJECTION LAGA DIYA HOGA

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