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अज़मल कसाब ने राष्ट्रपति से लगायी दया की गुहार…

By   /  September 18, 2012  /  5 Comments

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मुंबई में ताज होटल में हुए आतंकी हमले में फांसी की सजा पा चुके पाकिस्तानी आतंकवादी अजमल आमिर कसाब ने राष्ट्रपति के पास दया याचिका दायर कर दी है. कसाब ने राष्ट्रपति के पास दया याचिका ऑर्थर रोड जेल के सुपरिंटेंडेंट के जरिए भेजी है. गौरतलब है कि मुंबई हमले में 166 लोग मारे गए थे.

याद रहे कि मुंबई की एक विशेष अदालत ने 2010 में कसाब को फासी की सजा सुनाई थी, जिसे बॉम्बे हाईकोर्ट ने बरकरार रखा था. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भी 29 अगस्त 2012 को अज़मल कसाब की फासी की सजा बरकरार रखी थी तथा कसाब की सारी दलीलें खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि उसका जुर्म माफी के कतई लायक नहीं है.

अब देखना है कि कसाब की दया याचिका पर राष्ट्रपति कब और क्या फैसला लेते हैं. मौत की सजा पाने वाले आरोपियों की दया याचिका सूची में उसका नंबर तेहरवां है.

लंबी प्रक्रिया के साथ ही कसाब की दया याचिका पर फैसला पुरानी दया याचिकाओं को निपटाने के बाद ही लिया जा सकेगा. हालत यह है कि इस समय राष्ट्रपति के पास एक दर्जन दया याचिकाएं लंबित हैं. इनमें छठे नंबर पर मो. अफजल की याचिका है. जबकि 2001 में संसद में हमले के दोषी अफजल की फांसी की सजा पर सुप्रीम कोर्ट 2005 में ही अपनी मुहर लगा चुका है. ऐसे में कसाब की फांसी के लिए सालों इंतजार करना पड़ सकता है.

लंबित दया याचिकाएं:

1. गुरमीत सिंह, 2. धरम पाल, 3. सुरेश और रामजी- (यूपी), 4. सिमोन, ज्ञानप्रकाश मदायाह और बिलावेंदर (कर्नाटक), 5. प्रवीण कुमार (कर्नाटक), 6. मो. अफजल (दिल्ली), 7. सायबन्ना (कर्नाटक), 8. जफर अली (यूपी), 9. सोनिया और संजीव (हरियाणा), 10. सुंदर सिंह (उत्तराखंड), 11. अतबीर (दिल्ली), 12. बलवंत सिंह राजोआना (चंडीगढ़)

[ये आंकड़े 23 जुलाई 2012 तक के हैं.]

गौरतलब है कि पिछले दिनों गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने कहा था कि कसाब दया याचिका दायर करता है तो उसे कम से कम समय में निपटाया जाएगा.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

5 Comments

  1. SHARAD GOEL says:

    जब उसे अपने किये पे कोई अफ़सोस ही नहीं तो दया याचिका केसी

  2. Alka Katiyar says:

    kyaa use daya aai thi jub kisi ka bhai kisi ka pati or kisi ke pita kisi maa ka beta us se bichhed raha tha ,, esa us ne socha bhi kase.

  3. kishan says:

    शायद राष्ट्रपति जी को कसब पर दया आ जाये और उसे छोड़ दे. क्योकि ये भारत है भाई यहाँ पे कांग्रेस की सर्कार है जो मुसलमानों की ससुराल की पार्टी है .. कुछ भी हो सकता है

  4. mahendra gupta says:

    हमारे राष्ट्रीय मेहमान ने देश की लचर फ़ेसलों की निति का मूल्यांकन कर खुद के लिए सही निर्णय ले ही लिया.अब उसने अपनी गेंद सर्कार के पाले में डाल दी है,अल्प संख्यक वोटों की भूखी,और तुष्टिकरण की निति पर चलने वाली सरकार अब कब क्या निर्णय कितने समय में लेगी यह देखना दिलचस्प होगा.
    अनुमान तो यही है कि अभी कसाबजी लगभग १० वर्ष तो और बिरयानी तथा चिकन खायेंगे ,करोड़ों रुप्प्ये कि सुरक्षा का शाही अंदाज से आनंद लेंगें.तब तक न जाने क्या हो,सरकार की यह कोशिश चल रही है की फंसी की सजा के कानून को ही बदल दिया जाये , यदि यह हो जाये तो कांग्रेस का संकट ताल जायेगा,अफजल को भी बचा लेंगे और कसब को भी,और VOTE बैंक को भी. देखिये आगे आगे होता है क्या, जल्दी की जरूरत नहीं,क्योंकि उतावला वोह बावला

  5. हमारे राष्ट्रीय मेहमान ने देश की लचर फ़ेसलों की निति का मूल्यांकन कर खुद के लिए सही निर्णय ले ही लिया.अब उसने अपनी गेंद सर्कार के पाले में डाल दी है,अल्प संख्यक वोटों की भूखी,और तुष्टिकरण की निति पर चलने वाली सरकार अब कब क्या निर्णय कितने समय में लेगी यह देखना दिलचस्प होगा.
    अनुमान तो यही है कि अभी कसाबजी लगभग १० वर्ष तो और बिरयानी तथा चिकन खायेंगे ,करोड़ों रुप्प्ये कि सुरक्षा का शाही अंदाज से आनंद लेंगें.तब तक न जाने क्या हो,सरकार की यह कोशिश चल रही है की फंसी की सजा के कानून को ही बदल दिया जाये , यदि यह हो जाये तो कांग्रेस का संकट ताल जायेगा,अफजल को भी बचा लेंगे और कसब को भी,और VOTE बैंक को भी. देखिये आगे आगे होता है क्या, जल्दी की जरूरत नहीं,क्योंकि उतावला वोह बावला.

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