Loading...
You are here:  Home  >  राजनीति  >  Current Article

चक्की में पिसना जनता की मजबूरी बनी -1

By   /  September 19, 2012  /  1 Comment

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

-विनायक शर्मा||
क्या अंत की शुरुआत हो चुकी है ? शासन काल के उतरार्ध जिसे उल्टी गिनती शुरू होने का समय माना जाता है, में सभी सरकारों का यही प्रयत्न रहता है कि जनता के हित के लोकलुभावन फैसले लिए जाएँ जिससे आनेवाले चुनावों में जनता को एक बार फिर भरमा कर सत्ता पर  पुनः कब्ज़ा जमाया जा सके. इसके ठीक विपरीत यदि देश के एक बहुत बड़े वर्ग विशेषकर आर्थिक रूप से निम्न-मध्यम और निम्न वर्ग के हितों के विरुद्ध उनकी परेशानियों में इजाफा कर उनको नाराज करने वाले फैसलों को तो स्वाभाविक रूप से आत्मघाती निर्णय ही माना जायेगा. किन्हीं अप्रत्याशित कारणों से देश के समक्ष पैदा हुई विकट परिस्थिति के चलते यदि देश हित में कोई कडवे निर्णय लेने भी पड़ें जिसे मोटे तौर से जनता के हितों के विपरीत समझा जाता है, तो देश हित को सर्वोपरि मानते हुए जन साधारण सहन भी कर लेता है. परन्तु देश के वर्तमान परिदृश्य ऐसा कुछ नहीं दीखता है.
केंद्र का शासन संभाले यूपीए-२  की सरकार का अब उतरार्ध का समय चल रहा है और २०१४ में देश में आम चुनाव निश्चित हैं. तमाम तरह के घोटालों, घपलों और बड़े पैमाने के भ्रष्टाचार के आरोप लगने पर अब तो केंद्र सरकार को भीतर और बाहर से समर्थन देने वाले उसके सहयोगी भी विरोध की मुखर भाषा में बोलने लगे है. डीजल और रसोई गैस के दामों में हुई बढोतरी का विरोध अब कांग्रेस के मंत्री और नेता भी करने लगे हैं. कभी कांग्रेस की सदस्य रही फायरब्रांड नेता के नाम से प्रसिद्द और तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्षा व बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी यूपीए की सरकार से नाता तोड़ने का निर्णय लेकर केंद्र की सरकार को सांसत में डाल दिया है. कोयला घोटाले से देश का ध्यान हटाने की मंशा से ऍफ़डीआई लाने का निर्णय बताते हुए समर्थन वापिस लेने के इस निर्णय के चलते मध्यावधि चुनाव के भी आसार बनते नजर आ रहे हैं. अस्थिरता की ऐसी विकट परिस्थिति में कोई भी सरकार जनविरोधी कदम बहुत ही मजबूरी में ही उठायेगी, सतही तौर से ऐसा समझ में आता है. परन्तु तमाम विरोद्धों और अंतर्विरोद्धों के बावजूद भी जिस प्रकार अभी हाल में डीजल और रसोई गैस के दामों में यकायक इतनी बढ़ोतरी की गई है उसके पीछे कोई अप्रत्याशित कारण दिखाई नहीं देता. सरकार की गलत नीतियों और हर कदम पर घोटाले, घपले और भ्रष्टाचार के चलते देश में पैसे की कमी, तेल कंपनियों का लगातार बढ़ता घाटा यह सब सरकार की स्वयं की गलतियों और नाकामयाबियों और अनुशासनहीनता का ही परिणाम है जिसके चलते आज देश आर्थिक मंदी की मार झेल रहा है. वहीँ दूसरे ओर सहयोगी दलों की अनदेखी और विरोध को दरकिनार करते हुए सरकार ने खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश का मार्ग लगभग प्रशस्त कर ही दिया है.
परन्तु बड़ा सवाल यहाँ मुहँ बाये यह खड़ा है कि  देश को ऐसी विकट परिस्थिति में किसने पहुँचाया ? सरकार की कौन सी आर्थिक नीतियां इसके लिए जिम्मेवार हैं ? आगे दौड़…और पीछे की छोड़…..यानि कि आगे दौड़ते हुए आस-पास व पीछे की चिंता नहीं करना. यही सब विगत कुछ वर्षों से देश में हो रहा है. देश को विकास की दौड़ में विश्व के बराबर खड़ा करने की होड़ में अन्य तमाम आवश्यक क्षेत्रों की अनदेखी स्पष्ट नजर आ रही है. कभी मुंबई को शंघाई बनाने की बात की जा रही है तो कभी देश की तरक्की का पैमाना सेंसेक्स के उछाल से निर्धारित करने के प्रयास हो रहे हैं. महंगाई डायन को मारने की नित नई-नई तारीखें घोषित कर जनता को बहलाया जा रहा है. सत्ता और निर्णय  लेने  के कई  केंद्र  स्पष्ट  नजर आ रहे  हैं  जिसके  चलते  देश  में  असमंजस  के  कोहरे से  राजनीतिक  और  शासन-सत्ता का चेहरा ढाका  हुआ  है और हाथ बंधे हुए.
धनाभाव के कारण देश की तमाम विकासोन्नमुख योजनायें, योजनाआयोग और वित्तमंत्रालय के चक्कर लगा रही हैं वहीँ हवा में उड़ने की होड़ में देश का लाखों करोड़ रुपया कोमन वेल्थ खेलों के नाम पर लुटा दिया जाता है. कुपोषण को राष्ट्रीय शर्म बताने वाले देश के प्रधानमंत्री लाखों टन खाद्यान गोदामों में सड़ने वाले अनाज को देश के गरीबों को बाँटने में अपनी असमर्थता बताते हैं. दलहन, तिलहन की  कम पैदावार  के चलते  उनके  दाम  पहले  से  ही  असमान  छू  रहे  थे  वहीँ  अब  चीनी  के  दाम  ५०  रुपये  प्रतिकिलो की  दर को  छूने  को  बेताब  हो  रहे  हैं. एक ओर अनजान और गैरवाजिब कारणों से रुपये का अवमूल्यन हो रहा है वहीँ देश के मध्यम-निम्न व गरीबों को महंगाई की चौतरफा मार से बचाने में असमर्थ सरकार को  ” कठिन परिस्थितियों  में  गिरती  अर्थवयवस्था  और  घाटे  में  चल  रही तेल  कम्पनियों को बचाने  के  लिए  उठाये गए  कठोर  कदमों  की  मजबूरी बताते हुए पेट्रोल, गैस व डीजल के दाम बढाने पड़ते हैं.” देश के जनप्रतिनिधियों  को देश की हर  समस्या  का  कारण  तो ज्ञात है परन्तु  उचित  हल के  विषय में कुछ नहीं जानते. केंद्र  से  बात  करो  तो  वह  राज्यों  की  जिम्मेवारी  बताता  है  और  यदि  राज्यों  से  बात  करें  तो  वह  केंद्र  के  दायरे  का मसला कह कर अपना  पल्ला  झाड़ते नजात आते हैं. इस सब के बीच देश के प्राकृतिक संसाधनों व कोयले जैसे सीमित खनिज भंडारों को अपनी मर्जी से अपने चहेतों को मुफ्त में लुटाने में तनिक भी गुरेज नहीं होता इन  सरकारों  को.
धन की कमी का रोना रोने वाली केंद्र सरकार के अपने सरकारी और गैर-योजना के खर्चों में कमी करने की अपेक्षा विदेशी निवेश के बहाने देश की जीवनरेखा कहलानेवाले खुदरा व्यापार को तबाह करने का कुचक्र चलाया जा रहा है वह भी उस परिस्थिति में जब इस गणतांत्रिक देश के अधिकतर गण यानि कि राज्य इसके विरुद्ध हैं. धन की कमी के चलते विदेशी निवेश को प्राथमिकता देनेवाले इस देश के योजनाआयोग के शौचालयों की मुरम्मत पर जहाँ ३५ लाख का खर्च कर दिया जाता है वहीँ आयोग के उपाध्यक्ष विगत वर्ष में मई माह से अक्टूबर तक विदेश दौरों पर प्रतिदिन २.०२ लाख रुपये खर्च कर आते हैं. सूत्रों की मानें तो एक सूचना के अनुसार उन्होंने जून २००४ से जनवरी २०११ के मध्य ४२ सरकारी यात्रायें की और उनके इस दौरान २७४ दिनों के दौरों का कुल खर्च २.३४ करोड़ रूपये बैठता है.

अगले भाग को पढने के लिए यहाँ क्लिक करें..

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. SHARAD GOEL says:

    टैक्स भी दो और इनकी अय्याशियाँ भी पूरी करो इनके होटलों का बिल भी हम देंगे इनके महंगे इलाज का पैसा भी हम देंगे हम भले ही बेइलाज मर जाये

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

You might also like...

क्या कांग्रेस मुग़ल साम्राज्य का अंतिम अध्याय और राहुल गांधी बहादुर शाह ज़फ़र के ताज़ा संस्करण हैं?

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: