/तुम राष्ट्र के लिए अपने प्राण दो, हम तुम्हारे शवों पर राज करेंगे…..

तुम राष्ट्र के लिए अपने प्राण दो, हम तुम्हारे शवों पर राज करेंगे…..

-शिवनाथ झा ||

भाड़ में जाये स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी, शहीद और उनके वंशज. यदि पिछले ६६ वर्षों में भारत के सभी राष्ट्रपतियों की भूमिका को आँका जाये, तो राजनैतिक चापलूसी के अलावा अगर कोई एक क्रिया-कलाप सब में समान रहा, और शायद वर्तमान राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी भी उस “चक्रब्यूह” को नहीं तोड़ पाएंगे, तो वह है स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारियों और शहीदों को स्वतंत्र भारत में “उचित सम्मान नहीं मिलना”. इसे यूँ भी कहा जा सकता है कि “तुम राष्ट्र के लिए अपने प्राण दो, हम तुम्हारे शवों पर राज करेंगे”.

इसे बिडम्बना ही कहेंगे. सिनेमा के सुनहरे परदे पर शहीदों और क्रांतिकारियों की “भूमिका” अदा करने वाला अदाकर भारतीय संसद में अपनी कुर्सी सुरक्षित कर लेता है, लेकिन वास्तविक जीवन में देश के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले क्रांतिकारियों या शहीदों के वंशजों के लिए “सम्मानस्वरूप” भी एक कुर्सी नहीं. यह मैं नहीं, भारत के पूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय के.आर.नारायणन ने कहा था.

भारत के स्वतंत्रता के पचासवें वर्षगाँठ पर भारत सरकार की स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारियों और शहीदों के प्रति उदासीन रवैय्ये पर सीधा निशाना साधते हुए नारायणन ने कहा था १९४७ में देश को आजाद होने के वाबजूद, इन क्रांतिकारियों और शहीदों तथा उनके वंशजों को स्वतंत्र भारत में जो सम्मान मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला. और इसलिए सरकार और समाज की यह नैतिक जिम्मेदारी है की वे इन क्रांतिकारियों और शहीदों तथा उनके वंशजों को “यथोचित सम्मान दे”.

इतना ही नहीं, सरकार की नीति और संभवतः विभिन्न राजनैतिक पार्टियों की राष्ट्रपति पर दबाब को दर्शाते हुए पूर्व राष्ट्रपति ने कहा था की “इसे विडम्बना ही कहेंगे कि सिनेमा के सुनहरे परदे पर शहीदों और क्रांतिकारियों की “भूमिका” अदा करने वाला अदाकार भारतीय संसद में अपनी कुर्सी सुरक्षित कर लेता है, लेकिन वास्तविक जीवन में देश के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले क्रांतिकारियों या शहीदों के वंशजों के लिए “सम्मानस्वरूप” भी एक कुर्सी नहीं, यह दुर्भाग्य है.”

नारायणन स्वतंत्र भारत के दसवें राष्ट्रपति थे. इस दृष्टि से, भारत के प्रथम राष्ट्रपति से लेकर उन तक, सब ने भारतीय संविधान की धारा ८० के तहत प्रदत्त अधिकारों का “संभवतः” तत्कालीन राजनैतिक पार्टियों के दबाब में या तो “उचित उपयोग करने से वंचित रहे” या फिर, “चाह कर भी इस दिशा में पहल नहीं कर सके.” नारायणन के बाद भी जो दो राष्ट्रपति बने – ऐ.पी.जे. अब्दुल कलाम और श्रीमती प्रतिभा देवसिंह पातिल, उन लोगों ने भी इस दिशा में कोई पहल नहीं किया. अगर, परंपरा को देखा जाये, तो वर्तमान राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी या आने वाले किसी भी राष्ट्रपति से इन दिशा में पहल करना व्यर्थ लगता है.

क्या इसे यह माना जाये कि  “भारत के राष्ट्रपतियों ने भी भारतीय संविधान की धारा ८० के तहत प्रदत्त शक्तियों का दुरूपयोग किया है?

भारतीय संसद का उच्च सदन (राज्य सभा) की स्थापना के साथ इसमें सदश्यों की संख्या २५० निर्धारित किये गए, जिसमे १२ सदश्यों का मनोनयन करने का अधिकार (भारतीय संविधान की धारा ८० के तहत प्रदत्त शक्तियों के अनुसार) राष्ट्रपति को दिया गया. शेष २३८ सदस्यों का चयन विभिन्न राज्यों और केंद्र प्रशासित क्षेत्रों से होना सुनिश्चित किया गया. इन १२ सदस्यों में उन सभी लोगों को रखा गया जो शिक्षा, विज्ञानं, कला और समाज-सेवा के क्षेत्र में विशेष स्थान रखते हैं.

लेकिन दुर्भाग्यवश, १९५२ में राज्य सभा के गठन के बाद, आज तक (राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद से लेकर प्रणब मुखर्जी तक) कुल १०५ सदस्यों का मनोनयन भारत के राष्ट्रपतियों ने संविधान की धारा ८० द्वारा प्रदत्त शक्तियों के आधार पर किया. लेकिन इनमे एक भी सदस्य स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी, शहीद या उनके वंशजों में से नहीं हैं. इतना ही नहीं, यहाँ तक की शहीदों की पत्नियों, माताओं को भी इस “सम्मान से वंचित रखा गया”.

आश्चर्य तो यह है की स्वतंत्र भारत में विभिन्न सरकारें और राजनैतिक पार्टियाँ जो भी सत्ता के सिहांसन पर बैठे, अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार जनबरी २०१२ तक संभवतः ९३ बार संविधान में संसोधन कर चुके है. क्या एक और संसोधन नहीं हों सकता स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारियों, शहीदों के सम्मानार्थ? लेकिन भारत के संसद में बैठे सदस्यों की सोच इस दिशा में भी हों सकती है, संदेहास्पद है.

अभी तक जिन १०५ लोगों का मनोनयन हुआ है वे हैं: 

डॉ. जाकिर हुसैन, अल्लादी कृष्ण स्वामी, प्रोफ. सत्येन्द्रनाथ बोस, श्रीमती रुकमनी देवी अरुन्दले, प्रोफ. एन.आर. मलकानी, डॉ. कालिदास नाग, डॉ. जे.ऍम. कम्रप्पा, काका साहेब कालेलकर, मैथिलि शरण गुप्त , डॉ. राधा कुमुद मुखर्जी , मेजर जेनेरल साहेब सिंह सोखे , पृथ्वीराज कपूर, डॉ. पी.वि. कने, प्रोफ. ऐ.आर. वाडिया, ऍम. सत्यनारायण, बी.वि. वरेरकर, डॉ. तारा चाँद , डॉ. ऐ.अन खोसला , सरदार के.ऍम. पनिकर, जैराम्दास दौलतराम , मोहन लाल सक्सेना , तारा शंकर बनर्जी , वि.टी. कृष्णामचारी, आर.आर. दिवाकर, डॉ. गोपाल सिंह , जी. रामचंद्रन , श्रीमती शकुन्तला प्रन्ज्पेयी, प्रोफ. सत्यव्रत सिद्धान्तालंकार, डॉ. बी.अन. प्रसाद, ऍम. अजमल खान, ऍम.सी.सीतलवाद, ऍम.अन. कॉल, डॉ. हरिवंश राय बच्चन, प्रोफ. दी.आर. गाडगीळ, जोछिम अल्वा, प्रोफ. एस. नुरुल हसन, डॉ. आर. रामैयाह, गंगा शरण सिन्हा, जी. शंकर कुरूप, श्रीमती मरंग्थं चन्द्र शेखर, उमा शंकर जोशी, प्रोफ. रशिउद्दीन खान, डॉ. वि.पी.दत्त, सी. के.दफ्तरी, अबू अब्राहम, हबीब तनवीर, प्रोमोथ नाथ बीसी, कृष्ण कृपलानी, डॉ. लोकेश चन्द्र, स्केटो स्वू , बी. अन. बनर्जी, बिसंभर नाथ पण्डे, श्रीमती फ़ातेमा इस्मायल, डॉ. मोल्कम अदिशेसिया, भगवती चरण वर्मा, पांडुरंग धरमजी जाधव, श्रीमती नर्गिस दत्त, खुशवंत सिंह, प्रोफ (श्रीमती) आसिमा चटर्जी, वि.सी.गणेशन, हयात उल्लाह अंसारी, मदन भाटिया, वि.एन.तिवारी, एच. यल. कपूर, थिन्दिविनाम के. रामामुर्थी, गुलाम रसूल कर, पुरुषोत्तम काकोडकर, सलीम अली, श्रीमती अमृता प्रीतम, इला रमेश भट्ट, ऍम.एफ.हुसैन, आर.के.नारायण, पंडित रवि शंकर, सतपौल मित्तल, श्रीमती स्येदा अनवर तैमुर, मोहम्मद युनुस, जगमोहन, प्रकाश यशवंत आंबेडकर, भूपिंदर सिंह मान, आर. के. करंजिया, डॉ. ऍम. आराम, डॉ. बी.बी. दत्ता, श्रीमती वैजयंती माला, मौलाना हबीबुर रहमान नोमानी, महेंद्र प्रसाद, डॉ. राजा रमन्ना, मृणाल सेन, श्रीमती शबाना आजमी, डॉ. सी. नारायण रेड्डी, कुलदीप नायर, करतार सिंह दुग्गल, डॉ. पी.एस.दस, कुमारी निर्मला देश पाण्डे, चौधरी हरमोहन सिंह, नाना देशमुख, लता मंगेशकर, फाली एस. नरीमन, सी.एस. रामास्वामी, बिमल जलन, दारा सिंह, श्रीमती हेमा मालिनी, डॉ. चन्दन मित्रा, डॉ. के. कश्तुरी राजन, विद्या निवास मिश्रा और डॉ. नारायण सिंह मानकलाओ.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.