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राहुल गांधी बनाम नरेन्द्र मोदी

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-निर्मल रानी||

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन राजग के सबसे प्रमुख घटक जनता दल युनाईटेड सहित भारतीय जनता पार्टी के एक बड़े धड़े के विरोध के बावजूद गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के लिए अपना एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रखा है। स्वयं को भाजपा का मज़बूत नेता व प्रधानमंत्री का सशक्त दावेदार जताने के लिए मोदी ने निकट भविष्य में गुजरात में होने वाले चुनाव प्रचार अभियान को अपनी रणनीति का हिस्सा बनाया है। नरेंद्र मोदी ने गुजरात विधानसभा चुनाव का प्रचार अभियान शुरु कर दिया है तथा वे एक आधुनिक सुविधाओं से युक्त रथ पर सवार होकर गुजरात के राज्यस्तरीय भ्रमण पर निकल पड़े हैं। इस दौरान वे जिन जनसभाओं को संबोधित कर रहे हैं वहां उनके भाषणों के अंदाज़ में गंभीरता कम व मसखरापन एवं कटाक्ष ज़्यादा देखने को मिल रहा है। मज़ाकिय़ा व मसखरेपन के लहजे में अपनी बातें कहकर जनता को हंसाने व लुभाने का उन्होंने एक सहज व सरल तरीक़ा ढूंढ रखा है।

अपने इसी क्रम में उन्होंने पिछले दिनों राहुल गांधी का नाम लेकर सोनिया गांधी पर निशाना साधा और कह दिया कि राहुल तो अंतर्राष्ट्रीय नेता हैं क्योंकि वे तो भारत के अलावा इटली से भी चुनाव लड़ सकते हैं। परंतु मैं तो केवल राष्ट्रीय नेता हूं। इस प्रकार की ग़ैर संजीदा बातें कहकर हालांकि नरेंद्र मोदी ने वहां मौजूद लोगों के ठहाके तो बटोर लिए। परंतु उनकी इस बात को सच्चाई के तराज़ू पर तौलने में हर्ज ही क्या है। राहुल गांधी के पास राजनैतिक दर्शन है या नहीं, वे देश को मज़बूत, सक्षम व कुशल नेतृत्व दे सकते हैं या नहीं तथा उन्होंने कांग्रेस पार्टी को मज़बूत किया है या कमज़ोर इस बहस में पडऩे के बजाए नरेंद्र मोदी के वक्तव्य के मद्देनज़र कम से कम उनकी राहुल गांधी से तुलना तो की जानी चाहिए। उदाहरण के तौर पर कांग्रेस पार्टी एकमत होकर राहुल गांधी से नेतृत्व की आशा रखती है। पार्टी में राहुल के विरुद्ध कभी कोई स्वर बुलंद नहीं हुआ। यदि राहुल गांधी को पार्टी के संसदीय दल के नेता के रूप में आज प्रस्तावित किया जाए तो ऐसा नहीं लगता कि पार्टी में कोई सांसद उनके नाम का विरोध करेगा। क्या मोदी को लेकर भारतीय जनता पार्टी में भी ऐसा है? क्या नरेंद्र मोदी भाजपा के सर्वमान्य नेता हैं? भाजपा में मोदी के नाम को लेकर समय-समय पर मचने वाली उथल-पुथल कम से कम पार्टी में मोदी के सर्वमान्य नेता होने का संदेश नहीं देती। परंतु इसके जवाब में भाजपाई यह कहकर अपना हाथ ऊपर रखने की कोशिश करते हैं कि भाजपा एक लोकतांत्रिक पार्टी है जबकि कांग्रेस परिवारवाद की शिकार है।

अब आईए दिग्विजय सिंह की उस बात पर जिसमें उन्होंने नरेंद्र मोदी को गुजरात तक सीमित रहने वाला क्षेत्रीय नेता बताया था तथा राहुल गांधी को राष्ट्रीय नेता करार दिया था। और इसी के जवाब में तिलमिलाकर नरेंद्र मोदी ने राहुल गांधी को राष्ट्रीय के बजाए अंतर्राष्ट्रीय नेता कह कर उनका मज़ाक़ उड़ाने का प्रयास किया। और उन्हें अंतर्राष्ट्रीय बताने में मोदी को हमेशा की तरह इटली ही याद आया। सर्वप्रथम तो नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय नेता होने की हक़ीक़त को ही देखा जाए। देश के दो सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश व बिहार गत् लोकसभा व विधानसभा चुनावों के दौरान नरेंद्र मोदी के दौरे से अछूते रहे। नरेंद्र मोदी का उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार में न जाने का कारण यह था कि वे संजय जोशी को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाए जाने से नाराज़ थे। वह नहीं चाहते थे कि उनके प्रचार से पार्टी राज्य में अच्छा प्रदर्शन करे और उसका श्रेय संजय जोशी को मिले। यह है एक राष्ट्रीय नेता की सोच व हैसियत का प्रभाव जो अपनी ही पार्टी के नेता के विषय में ऐसे विचार रखता है। इस पर तुर्रा यह कि वह प्रधानमंत्री पद के दावेदार भी हैं। उधर बिहार में भी पिछले संसदीय व विधानसभा चुनावों के दौरान भाजपा के सहयोगी नितीश कुमार ने नरेंद्र मोदी के बिहार में चुनाव प्रचार हेतु प्रवेश करने पर रोक लगा दी थी। और नरेंद्र मोदी नितीश कुमार द्वारा लगाए गए इस प्रतिबंध का पालन करते हुए बिहार में चुनाव प्रचार करने से महरूम रह गए थे। क्या यही है एक राष्ट्रीय नेता की पहचान जोकि अपने ही देश के दो सबसे बड़े राज्यों में किन्हीं भी कारणों से चुनाव प्रचार हेतु दाखिल भी न हो सके? अभी कुछ समय पूर्व मुंबई में भाजपा कार्यकारिणी की बैठक में भी नरेंद्र मोदी की शिरकत पर सवाल खड़े हो रहे थे। आखिरकार मोदी ने संजय जोशी को कार्यकारिणी से हटाए जाने के बाद ही कार्यकारिणी की बैठक में शरीक होने का निर्णय लिया। क्या राहुल गांधी को भी कभी कांग्रेसशासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों,मीडिया अथवा अपनी पार्टी के नेताओं से कभी इस प्रकार दो-दो हाथ करते हुए देखा गया है?

निश्चित रूप से आज कांग्रेस की साख दांव पर लगी हुई है। आए दिन उजागर होने वाले नए से नए और बड़े से बड़े घोटाले कांग्रेस को घोर संकट में डाल रहे हैं। ऐसे में यदि कांग्रेस को भविष्य में नुक़सान भी उठाना पड़ता है तो इस नुक़सान व नाकामी की जि़म्मेदार स्वयं कांग्रेस पार्टी व उसकी नीतियां ही होंगी। मौजूदा हालात में किसी भी विपक्षी दल को कांग्रेस को कमज़ोर करने या उसके विकल्प के रूप में स्वयं को स्थापित करने या सामने लाने का कोई श्रेय नहीं जाता। इन सबके बावजूद सोनिया गांधी जिस समय भी चाहें उस समय राहुल गांधी को देश का प्रधानमंत्री बनवाकर भारत के प्रधानमंत्रियों की सूची में उनका नाम भी शामिल करवा सकती हैं। परंतु वे इस काम के लिए उतनी उतावली नहीं दिखाई दे रही हैं जितने कि नरेंद्र मोदी या उनके समर्थक नज़र आ रहे हैं। नरेंद्र मोदी के समर्थक तो उनकी तुलना शेर(जानवर) से करते हैं। परंतु नरेंद्र मोदी तो अपने भाषणों में शेर की तरह दहाड़ते कम हैं,मसखरापन व कटाक्ष के तीर ज़्यादा छोड़ते हैं। नरेंद्र मोदी ने गुजरात में अपने शासनकाल के दौरान समुदाय विशेष के साथ जो बर्ताव किया है उसके चलते पूरी की पूरी भारतीय जनता पार्टी अलपसंख्यक समाज की नज़रों से गिर चुकी है। हालांकि ऐसी स्थिति अटल बिहारी वाजपेयी की राजैतिक सक्रियता के समय नहीं थी। परंतु मोदी ने अपने सांप्रदायिक चेहरे की छाप भाजपा पर छोडक़र केवल कट्टर हिंदुत्ववादी राजनीति करने का जो फ़ैसला लिया उससे निश्चित रूप से भाजपा को काफ़ी नुक़सान उठाना पड़ रहा है। जबकि राहुल गांधी के साथ ऐसा कुछ भी नहीं है। देश का कोई भी समुदाय,वर्ग, धर्म या राज्य विशेष का कोई भी व्यक्ति राहुल गांधी से न तो मोदी की तरह नफ़ रत करता है न ही राहुल के किसी फै़सले ने कभी कांग्रेस पार्टी को कोई क्षति पहुंचाई है।

अब ज़रा इन दोनों नेताओं की कुछ अंतर्राष्ट्रीय तुलना भी कर ली जाए। राहुल गांधी जनवरी 2009 में अपने एक सहपाठी ब्रिटिश विदेशमंत्री डेविड मिलिबैंड को लेकर अचानक अमेठी जा पहंचे थे। उन्होंने उस ब्रिटिश मंत्री के साथ ग़रीबों व दलितों के घरों में चारपाई पर बैठकर चाय पी और ब्रिटिश मंत्री को राहुल ने अपने संबंधों के आधार पर भारत की ज़मीनी हक़ीक़त व इसके बावजूद देश की प्रतिबद्धता से वाकिफ़ कराने का प्रयास किया। ज़ाहिर है यह राहुल के अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का ही परिणाम था कि उनके द्वारा अर्जित किए गए ‘अंतर्राष्ट्रीय स्तर’ के व्यक्तिगत् रिश्तों के आधार पर ब्रिटिश मंत्री अमेठी के गांवों की गलियों में फिरने के लिए आ गया। जबकि हमारे ‘सिंह’ समझे जाने वाले नरेंद्र मोदी जी तो गुजरात का मुख्यमंत्री होने के बावजूद अपने अमेरिकी समर्थकों को केवल वीडियो कानफ्रेंसिंग के माध्यम से संबोधित करने के लिए बाध्य हैं। क्योंकि अमेरिका उन्हें अपने यहां प्रवेश करने हेतु वीज़ा नहीं देता। वैसे भी नरेंद्र मोदी की 2002 में गोधरा कांड के बाद हुए गुजरात दंगों के दौरान उनकी संदिग्ध भूमिका के चलते राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वयं उनकी, उनके चलते गांधी के राज्य गुजरात की जो छवि बनी है वह निहायत अफ़सोसनाक है। हालांकि अब वे आधुनिक प्रचार माध्यमों के द्वारा अपनी खलनायक की छवि को सुधारने का प्रयास ज़रूर कर रहे हैं। परंतु ऐसा लगता है कि शायद अब काफ़ी देर हो चुकी है।

राहुल गांधी ने अपनी छवि को संवारने,सुधारने,सजाने या उसे देश व दुनिया के समक्ष सुसज्जित तरीक़े से पेश करने हेतु किसी अंतर्राष्ट्रीय छवि सुधार संगठन या एजेंसी का सहारा क़तई नहीं लिया जबकि नरेंद्र मोदी गत् कई वर्षों से ‘वाईब्रेंट गुजरात’ के नाम पर यही काम करते आ रहे हैं। हो सकता है कि वे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रचारक होने के नाते संघ के सपनों के देश के भावी प्रधानमंत्री क्यों न हों। परंतु ऐसा नहीं लगता कि देश के राजनैतिक समीकरण खासतौर पर भारतीय जनता पार्टी में नरेंद्र मोदी के नाम पर प्रधानमंत्री के पद को लेकर होने वाली उठापटक उन्हें प्रधानमंत्री के पद तक पहुंचने देगी। परंतु मोदी का सोनिया गांधी व राहुल गांधी पर बार-बार कटाक्ष रूपी प्रहार करना यही दर्शाता है कि वे सीधे तौर पर सोनिया व राहुल गांधी के मुकाबले के नेता बनने की कोशिश में हैं। परंतु दरअसल उनके द्वारा सोनिया या राहुल पर किए जाने वाले कटाक्ष हक़ीक़त के आईने में कटाक्ष नहीं बल्कि हक़ीक़त प्रतीत होते हैं।

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About Author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

19 Comments

  1. अरे कहाँ मोदी जैसा करिश्माई नेता और कहाँ ये हमारे नन्हे मुन्ने बबलू राहुल जिनकी खुद की कोई सोच नही है पर वो खानदानी प्रधानमंत्री है क्योकि कांग्रेस राजशाही पर चल रही है और राजा का बेटा राजा ही होता है चाहे वो कितना भी मूर्ख हो………..

  2. ttमई लेखिका महोदय से सहमत हूँ ,राहुल गाँधी एक ऐसे सख्स है जिन्हें प्रधानमंत्री बनाने के लिए मोदी जी की तरह किसी से आदेस या रहमो करम की जरूरत नहीं है.इसकी वजह भी है ,कांग्रेस पार्टी की भारत की जनता नेहरु,गाँधी परिवार के नाम से जानती है.इनके बिना कांग्रेस पार्टी का कोई अस्तित्व नहीं है .राजीव जी की दुर्घटनावश मौत के बाद भारत की जनता कांग्रेस पार्टी का हस्र देख चुकी है.नेहरू ,गाँधी परिवार के बिना अगर कांग्रेस का अस्तित्वा होता तो आज सोनिया गाँधी या उनके बाद का परिवार आज राजनीती में नहीं होता.सोनिया गाँधी का ही दें है की आज श्री मनमोहन सिंह जी प्रधानमंत्री हैं .सीखो से किसी को पी.एम् बनाना,दलितों से किसी को राष्ट्रपति या लोकसभा के स्पीकर बनाना ,ये सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस पार्टी ही कर सकती है,भाजपा या कोई और पार्टी नहीं.उत्तर प्रदेश के चुनाव में कांग्रेस की हर से लोग राहुल गाँधी को अन्य पार्टयाँ कमजोर समझ रही है लेकिन वोही सभी पार्टिया उनकी सभा में भीर को देखकर घबरा गई थी,हाँ ये अलग बात है की वोटिंग के वक़्त लोगो ने मोख्यमंत्री के पद को तरजीह दी और यागी हर का कारन रहा ,क्योकि लोग जानते थे ,उनके दिमाग में था की राहुल गाँधी प्रधानमंत्री बनेंगे ,मुख्यमंत्री नहीं.२०१४ का लोक सभा का चुनाव हमारी बैटन को साबित कर दिखायेगा.उस वक़्त नरेन्द्र मोदी जी राहुल जी के सामना करने को तैयार रहें.

  3. यही तो दुर्भाग्य है देश का. वर्ग विशेष को सभी याद करते है. गोधरा को नहीं. मरे गए ३५० हिंदुयों को नहीं. राम मंदिर पर अयोय्ध्या में कारसेवको को मरने वाले मुलायम के बारे में कोई नहीं बोलता. आप महान हैं लेखिका जी जो हिन्दू हैं. यहाँ तक देश की दुर्दशा करने में आप जैसे ही देश प्रेमियों का महत्व पूर्ण सहयोग है| सहयोग बनाये रखें, इस देश को २०-३० साल से जयादा नहीं लगने वाले इस्लामिक देश होने में. संकेत स्पस्ट है = मुंबई आजाद मैदान के दंगे यूपी में ७ दंगे. असाम के दंगे अंतमे कश्मीर और कश्मीरी पंडितों की दशा. इस महान लेख के लिए आप को धन्यवाद.

  4. rahul gndhi ne jab kuchh kiya hi nhi sirf doosre ke kandhe me bandookh rakh kar chalai hai aaj tak kabhi sansad me kisi baat par charcha nhi sirf banh sikod kar apni bapauti sabit karne ke alawa aata hi ky hai aur hinduon ka kattar hona ky gunah hai jab musalman katter banka hindu sahit sabhi gair dharmo ka jeena haram kiye hai isai kattar hain isaiyat ke liye misnariyon ke bahane apni sankhya badhne me lage hain akhir hindu hi hinduttv ke liye katter kyonn nhi hosakta jisdin samast hindu yah sachchai swikar karlega ki hinduttv kattarata ke bina surachchhit nhi rahsakta dharmantran aur eesh nida ke khilaf sakt se sakt saja ka pravdhan jis din ho jayega usi din se hindustann ki or koi ankh uthakar nhi dekhega.

  5. एक निहायत ही घटिया लेख….. पूर्वाग्रह से ग्रसित लेखिका द्वारा लिखा गया जिसमे कुछ भी उल्लेखनीय नहीं है. एक कमतर व्यक्ति को नरेन्द्र मोदी के सामने खड़ा करने का इतना कुत्सित प्रयास उसी परंपरा का पालन है जो आज के तथाकथित "शर्मनिरपेक्ष" पत्रकार करते रहते है….

  6. मोहनलाल चाँदी on

    लेखिका महोदया भी उसी संस्कृति से प्रेरित है जो सोनिया जी ने काँग्रेस के लोगो के लिए गठित की है । और राहुल जी से तो लगता है इन्हे विशेष लगाव है , जो शक्स कोग्रेस्स के घोटालो पर बुत बना रहे , आम जनता के प्रति इतना असंवेदन शील की एक बार भी मंहंगाई की मार झेल रही जनता की प्रति दो शब्द न कहे उनसे आप महोदया उस सर्वमान्य भारत के प्रति सच्ची देश भक्ति रखने वाले नेता मोदी जी से तुलना कर रही है। तरस आता है इस चाटुकारिता और गंदी सोच का ।मोदी जी को सांप्रदायिक करार देने से पहले उस काँग्रेस की एक वर्ग विशेष के प्रति लगाव का भी अध्यन मोहोदया ने किया होता तो सांप्रदायिकता के मायने मोहोदया को ज़रूर समझ आते । देश को विभाजन की ओर ले जाती काँग्रेस की समर्थक लेकिका महोदया ! राहुल की शख्सियत की तुलना मोदी जी से करना ऐसा ही है जैसे सूर्य के आगे दिया ले जाना ।

  7. नरेन्द्र मोदी तो हैं जैसे हैं ही,प्रधान मंत्री पद के लिए यदि वे कोई सपना देख रहें हैं तो कोई बुरी बात नहीं,क्योंकि सपने देखना हर एक का अपना अधिकार है.पर लेखिका महोदया भी कांग्रेस से कुछ ज्यादा ही प्रभावित हैं,उन्हें कांग्रेसी नेताओं के भाषण बड़े अछे और तर्क पूर्ण लगते प्रतीत होतें हैं.राहुल में भी वे प्रधान मंत्री की जो छवि देख रहीं हैं,तो कुछ ज्यादा ही भावों में बह गयी हैं, राहुल इस पद पर आयेंगे तो सही,पर यह देश का बड़ा दुर्भाग्य ही होगा,वोह भी अपनी माँ तथा पिता की तरह चापलूसों की चोकड़ी से घिर जायेंगें.बेचारी कांग्रेस का यह दुर्भाग्य है कि यह नेहरू इंदिरा गाँधी परिवार के बिना चल ही नहीं पाती बिना इनके ये कुते बिल्ली कि तरह लड़ने लग जातें हैं,बड़े बड़े नेता अपना स्वाभिमान भूल कर इनके पांव पकड़ने लग जातें हैं.तिवारी जैसे तो हवाई अड्डे पर सब के सामने राजीव के जूतों को पोंछने में भी नहीं सकुचाते

  8. नरेन्द्र मोदी तो हैं जैसे हैं ही,प्रधान मंत्री पद के लिए यदि वे कोई सपना देख रहें हैं तो कोई बुरी बात नहीं,क्योंकि सपने देखना हर एक का अपना अधिकार है.पर लेखिका महोदया भी कांग्रेस से कुछ ज्यादा ही प्रभावित हैं,उन्हें कांग्रेसी नेताओं के भाषण बड़े अछे और तर्क पूर्ण लगते प्रतीत होतें हैं.राहुल में भी वे प्रधान मंत्री की जो छवि देख रहीं हैं,तो कुछ ज्यादा ही भावों में बह गयी हैं, राहुल इस पद पर आयेंगे तो सही,पर यह देश का बड़ा दुर्भाग्य ही होगा,वोह भी अपनी माँ तथा पिता की तरह चापलूसों की चोकड़ी से घिर जायेंगें.बेचारी कांग्रेस का यह दुर्भाग्य है कि यह नेहरू इंदिरा गाँधी परिवार के बिना चल ही नहीं पाती बिना इनके ये कुते बिल्ली कि तरह लड़ने लग जातें हैं,बड़े बड़े नेता अपना स्वाभिमान भूल कर इनके पांव पकड़ने लग जातें हैं.तिवारी जैसे तो हवाई अड्डे पर सब के सामने राजीव के जूतों को पोंछने में भी नहीं सकुचाते.

  9. Narendra modi aaj international level pe kafi prasiddh ho rahe hai.. shayad liknevale ko yes pata nahi hoga.. aur bhondu rahul ka ek to achha kam batao… jis british frnd ke sath vo amethi ke ek dalit ke yaha khana khaya aur rat gujari aaj us dalit ki kya halat hai shayad is bat ka likhnevale ko pata nahi… lagta hai writer ka general awareness kum hi hai…

  10. भारत के गावों में खेतों में बने चक-रोड होंगे गावों के पॉवरहाउस – आवश्यकता से ४ गुना अधिक बिजली बनाकर उसकी बिक्री से गावों का विकास संभव- मोदी का एक और फंडा.

    भारत को विकसित बनाने के लिए मोदी के उपायों का जबाव नहीं है. यदि मोदी के फंडो को वास्तव में लागू किया गया तो गाव के लोग बिजली बेचकर गाव का विकास करेंगे. इसके लिए सोलर पैनलो से सोलर बिजली बनाकर सरकार को बेचकर पैसा कमाया जायेगा.

    लेकिन भारत में बिकने वाले सोलर पैनल ४ गुना अधिक महगे है, इसके लिए सरकार को प्रभावी और सस्ते सोलर पैनल बाज़ार में लाना होगा. भारत की कुल सोलर पैनल की आवश्यकता की भरपाई के लिए भारत में १०० सोलर पैनल उत्पादन इकाईया लगानी होगी जो २० रुपये प्रति वाट के हिसाब से बाज़ार में उपलब्ध हो. चीन की सरकार २५ रुपये प्रति वाट के हिसाब से बेतहाशा सोलर पैनलो का उत्पादन कर रही है जब की भारत की सरकार शांत बैठी है.

    सरकार गावो को सब्सिडी देकर सोलर पैनल लगाने के लिए उत्प्रेरित करे और उपयोग से अधिक बनी बिजली को खरीदने की व्यवस्था करे. इसके लिए सरकार को वास्तव में बहु ईमानदार होना होगा..कम से कम उतना जितना मोदी स्वयं हैं.

    भारत में दिन में बहुत बिजली बनाई जा सकती है जिससे की दिन में फैक्ट्री में काम करने बाद लोग रात में अपने घर पर बच्चो के साथ आराम कर पाए और रात में इन्वर्टर या कोयले की बिजली का उपयोग कर पाए. यह व्यवस्था भारत को "विकसित भारत " बनाने की ओर ले जायेगी लेकिन इसे असली जमा पहनने के लिए कम से कम ३ साल चाहिए.

    भारत में सोलर पैनल बनाने की तकनीक, आदमी, उसमे प्रयोग होने वाले सामान और धातु बहुत मात्रा में उपलब्ध है सिर्फ एक विवेक शील भारत माता के लाल को भारत की गद्दी पर बैठने की देर भर है,

    विकसित भारत को चाहिए ५ लाख मेगावाट बिजली जिसमे अकेले ४ लाख मेगावाट बिजली सिर्फ सोलर पैनलो से बनाई जा सकती है बाकि सबको मालूम है हम दुनिया के सबसे बड़े "थोरियम" भण्डार के मालिक हैं.

    लेकिन कांग्रेस ने हमें दरिद्र बना दिया है.

    अब एक ही विकल्प- सिर्फ मोदी.

  11. लिखने वाले ने अच्छी खोजबीन की हे मोदी की काफी मेहनत की हे लगता हे मोदी को काफी जानती हे !.एक बात का जवाब लेना था शायद मिलेगा .! पूरा लेख मोदी पे आधारित हे उन पर लिखने को काफी कुछ हे ! राहुल के बारे में आपके पास कुछ हे तो लिखो ! उसकी योग्यता क्या हे नेतृत्व जीरो हे ! हाँ यद् आया दोस्तों के साथ अमेठी में शायद सुकन्या के साथ बलात्कार भी मेने सुना था जो की राहुल ने अपने दोस्तों के साथ मौज की इसे आरोप के आदमी को ( नहीं आदमी तो नहीं कह सकते उसको ) आप प्रधान मंत्री बनायेंगे ???? हाँ एक बात तो हे अगर गाँधी परिवार का हो तो कुत्ता भी पी इम बन सकता हे क्या बोलेंगे इस पर असलियत की जमीन पे चलने सीखो देश का विचार बदल रहा हे

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

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