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आखिर इस बंद के मायने क्या हैं….

By   /  September 20, 2012  /  2 Comments

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कुलदीप सिंह राघव||

देशभर में एफडीआई अर्थात प्रत्यक्ष्‍ा विदेशी निवेश को मंजूरी मिलने और डीजल के बढे दामों के विरोध में विपक्षी दलों ने भारत बंद का आहवाहन किया। चारो तरफ स्‍थिति बिगड़ गई। सड़कों पर जाम, रेल यातायात बाधित, जरूरी सेवाएं बंद से पूरा जनजीवन अस्त व्यस्त हो गया। पर मेरी समझ में ये नहीं आया कि इस बंद के मायने क्या हैं। आखिर विपक्षी दल भारत बंद करके क्या हासिल करना चाहते हैं। आज सड़कों पर नेताओं को खूब फोटो खिचाने का मौका मिला। राजनेता फोटो खिंचाने को लेकर इस कदर उतावले दिखे मानों उन्हें मंहगाई बढने से कोई लेना देना नहीं है बस नेताओं को तो एक मौका मिला मीडिया में छवि बनाने का। दिन रात एसी में बैठने वाले नेताओं को क्या पता मंहगाई क्या होती है। कुछ छुटभइये नेताओं को मौका मिला बडे नेताओं के सामने आने का जो उछल उछल कर नारे लगा रहे थे। बीते सप्ताह केंद्र सरकार ने निवेश में एफडीआई को 51 प्रतिशत की मंजूरी दी और उससे ठीक एक दिन पहले डीजल के दामों में पांच रुपये की बढोत्तरी हुई और केवल छह गैस सिलेंडर देने की बात कही। जनता एक के बाद एक मार से दबी हुई है लेकिन जनता नहीं चाहती कि जाम या भारत बंद नामक हथियार से इन समस्याओं का समाधान हो।

बंद के दौरान सड़कों पर आम आदमी नजर नहीं पड़ा। आम आदमी दिखे भी तो बस परेशान होते हुए जिसे विभिन्न दलों के लोग जबरदस्ती रोक रहे थे। दुकानें जबरदस्ती बंद कराई गईं इसीलिए कई स्‍थानों पर झड़प भी हुईं। इलाहाबाद में सपाईयों ने रेल रोकी और दफ्तरों को बंद कराया। मुझे समझ नहीं आता कि समाजवादी पार्टी जनता को मूर्ख समझती है क्या। जनता को नहीं पता कि तुम दो मुंही राजनीति कर रहे हो। अगर मुलायम सिंह यादव वास्तव में विरोध दर्ज करना चाहते हैं तो जाम क्यों लगा रहे हैं। आप 22 सांसदों वाला समर्थन वापस लीजिए। लो जी वो वाली बात हो गई कि हम आपके है और हैं भी नहीं। वास्तव में ये सिर्फ दिखावा है जो जनता को भ्रमित कर रहा है। मुझे लगता है मुलायम सिंह केंद्र से किसी पैकेज के तलाश में हैं। पैकेज मिलते ही केंद्र के साथ हो लेंगे।

उधर बसपा मुखिया माया भी पत्ते खोलने में इतना इतरा रहीं है जैसे कोई लडके की शादी की हामी भरने से पहले इतराता है। अरे माया जी अगर आपको केंद्र के साथ रहना है तो रहिए, अगर नहीं रहना है तो मना कीजिए आप भी जनता को आइना क्यों दिखा रही हैं। आप तो भली भांति जानती हैं कि जनता थोड़ी समझदार हो ही गई है।

बिहार के मुखिया भी जनता की भावनाओं को ताक पर रख राजनैतिक रोटिंयां सेंकने में लग गए हैं। उनका कहना है कि जो बिहार को विशेष दर्जा दे उसका साथ देंगे। मान लीजिए कि केंद्र बिहार को विशेष दर्जा दे दे तो उससे क्या मंहगाई कम होगी। ये सोचनीय और विचारणीय बिंदु है- नीतीश इस पर विचार करें।

देखो मित्रो जनता सुधार चाहती है न कि हंगामा, चक्का जाम या कोई नौटंकी नहीं। आप लोगों के ड्रामें को जनता समझ रही है। इस लिए वास्तव में कुछ कर सकते हो करो। वरना कम से कम इतना रहम करो ये नाटक बंद करो। आपके नाटक को देखकर हम परेशान हो चुके हैं। लगता है घोर कलयुग आ चुका है। अब दस कलयुग में अवतार की जरूरत है जो ये सब स्‍थि‌ति सुधार सके।

कुलदीप सिंह राघव, युवा पत्रकार एवं स्वतंत्र लेखक हैं तथा वर्तमान में अमर उजाला समाचार पत्र से जुडे़ हैं । राजनैतिक, खेल और फीचर मामलों के विशेषज्ञ हैं। विभिन्न बहस और वाद- विवाद का हिस्सा बन चुके हैं। बुंदेलखण्ड विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पोस्टग्रेजुएट कर रहे हैं। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित)

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 Comments

  1. SHARAD GOEL says:

    मुल्ला यम हो या माया वती सब अपने फायदे के बारे में सोचते हे देश जाये भाद में अब तो सबके पास ब्लाक्मैल का मौका हे

  2. par raghav sahab mukhya vipakshi party par to aapne koi tippani nahi ki. amar ujala ki chhavi pro bjp ki hai kya isiliye?

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