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पैसे पेड़ों पर नहीं लगते: मनमोहन सिंह

By   /  September 22, 2012  /  2 Comments

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प्रधानमंत्री ने कह दिया कि पैसे पेड़ों पर नहीं लगते। यह मुहावरा बोलचाल की भाषा में किस आशय से प्रयोग में लाया जाता है?

प्रधानमंत्री ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए बखूबी बता दिया कि निनानब्वे फीसद बहिष्कृत जनता अब इस देश की सरकार या राजनीतिक व्यवस्था से कुछ उम्मीद न करें क्योकि बाजार खुल्ला है।

 

-एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास||

प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने आर्थिक सुधारों से जुड़े कड़े फैसलों को जरूरी बताते हुए जनता से अपील की है कि वह विपक्षी दलों के बहकावे में न आए और सरकार का साथ दे। उन्होंने कहा कि वह देश को 1991 की हालत में वापस नहीं जाने देंगे, लेकिन उन्हें आम लोगों के समर्थन की जरूरत है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि पैसा पेड़ों में नहीं उगता।प्रधानमंत्री ने कह दिया कि पैसे पेड़ों पर नहीं लगते। यह मुहावरा बोलचाल की भाषा में किस आशय से प्रयोग में लाया जाता है , तनिक गौर करें। जब किसी को देने से मना करना होता है तब यही जुमला सुना दिया जाता है। प्रधानमंत्री ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए बखूबी बता दिया कि निनानब्वे फीसद बहिष्कृत जनता अब इस देश की सरकार या राजनीतिक व्यवस्था से कुछ उम्मीद न करें क्योकि बाजार खुल्ला है।

गौरतलब है कि डीजल कीमतों में बढ़ोतरी किए जाने, सस्ते रसोई गैस सिलिडरों का कोटा निश्चित किए जाने और रिटेल सेक्टर में एफडीआई की इजाजत दिए जाने जैसे फैसलों के बाद यूपीए के एक घटक दल तृणमूल कांग्रेस ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया। मंगलवार को ही तृणमूल के मंत्रियों ने प्रधानमंत्री से मिलकर उन्हें अपना इस्तीफा सौंपा और राष्ट्रपति से मिलकर उन्हें समर्थन वापसी का पत्र सौंपा। इसके ठीक बाद राष्ट्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने बेहद आक्रामक अंदाज में कहा कि पैसा पेड़ों पर नहीं उगता। डीजल कीमतों में बढो़तरी नहीं की जाती तो सबसिडी का बोझ बढ़कर दो लाख करोड़ रुपए हो जाता। आखिर इतना पैसा कहां से आता? उन्होंने कहा कि अगर सब्सिडी का बोझ कम नहीं किया जाता तो कई कल्याणकारी योजनाए बंद करनी पड़तीं, विकास की गति मंद पड़ जाती और महंगाई बेकाबू हो जाती और नौकरियां कम हो जातीं। उन्होंने कहा मुझे अच्छी तरह पता है कि 1991 में देश की क्या हालत हो गई थी। प्रधानमंत्री ने कहा कि मैं देश को उस हाल में वापस नहीं जाने दूंगा। लेकिन मुझे आप सबका समर्थन चाहिए।

तृणमूल कांग्रेस के 19 सांसदों के इस्तीफे के बाद संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) के इतिहास का एक अध्याय आज समाप्त हो गया और इसके साथ ही तृणमूल कांग्रेस केंद्र सरकार से अलग हो गई। तृणमूल के मंत्रियों ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिलकर उन्हें अपने इस्तीफे दिए और संप्रग सरकार से समर्थन वापस लेने का पत्र राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को सौंपा। इसके बदले कोलकाता में सत्तारूढ़ तृणमूल सरकार में मंत्री बने कांग्रेस के विधायक शनिवार को अपने इस्तीफे देंगे। इधर तृणमूल कांग्रेस यूपीए सरकार से बाहर हुई, उधर बीजेपी ने कहा कि अब इस सरकार की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है। पार्टी को उम्मीद है कि आम आदमी पर बोझ बन चुकी इस सरकार से मुक्ति का रास्ता खुलने जा रहा है। बीजेपी प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन ने कहा कि टीएमसी ने जनहित में अच्छा कदम उठाया है। बीजेपी उन्हें बधाई देती है। यूपीए अब डूबता जहाज है, जिससे लोगों ने उतरना शुरू कर दिया है। उन्होंने यूपीए को समर्थन जारी रखने संबंधी बयान देने के लिए समाजवादी पार्टी की खिंचाई की। हुसैन ने कहा कि एक ओर तो वह सरकार के फैसलों के खिलाफ सड़कों पर उतरती है, दूसरी ओर इसी सरकार को समर्थन देने का ऐलान करके ऑक्सीजन भी मुहैया कराती है।
प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में कहा कि पिछले कुछ समय में पेट्रोलियम सब्सिडी में बड़े पैमाने पर इजाफा हुआ है। यह सब्सिडी पिछले वर्ष एक लाख चालीस हजार करोड़ रुपए थी। अगर हमने कार्रवाई नहीं की होती तो यह बढ़कर दो लाख करोड़ से भी अधिक हो जाती।मनमोहन सिंह ने कहा कि इसके लिए पैसा कहां से आता। पैसा पेड़ों पर तो नहीं लगता। उन्होंने कहा कि अगर हमने कोई कार्रवाई नहीं की होती तो वित्तीय घाटा कहीं ज्यादा बढ़ जाता। अगर इसे रोका नहीं जाता तो रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतें और तेजी से बढ़ने लगती। निवेशकों का विश्वास भारत में कम हो जाता। ब्याज की दरें बढ़ जाती और बेरोजगारी भी बढ़ जाती।

प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि एफडीआई से किराना दुकानदारों के नष्ट होने का जो डर दिखाया जा रहा है वह बेबुनियाद है। उन्होंने कहा कि एफडीआई से किसानों को बहुत फायदा होने वाला है। उन्होंने कहा कि कुछ राजनीतिक दल एफडीआई के फैसले से सहमत नहीं हैं। इसलिए हमने राज्यों को यह छूट दी है कि वह चाहें तो अपने यहां एफडीआई की इजाजत न दें। मगर किसी भी राज्य को यह हक नहीं है कि वह दूसरे राज्य को भी एफडीआई से वंचित रखे।

डॉ. मनमोहन सिंह ने जोर देकर कहा कि पहले भी आर्थिक सुधारों को लेकर डर दिखाया जाता रहा है। मगर वे सारे डर गलत साबित हुए। भारतीय कंपनियां विदेशों में भी कामयाबी के झंडे गाड़ रही हैं। उन्होंने आम जनता से अपील की कि वह विपक्षी दलों के बहकावे में न आए और सरकार के हाथ मजबूत करे।

यहां पढ़ें प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का राष्ट्र के नाम संबोधन ज्यों का त्यों

मेरे प्यारे भाइयो और बहनो,
मैं आपको बताना चाहता हूं कि कीमतों में इस वृद्धि के बाद भी भारत में डीजल और एलपीजी के दाम बांगलादेश, नेपाल, श्रीलंका और पाकिस्तान से कम हैं। फिर भी पेट्रोलियम पदार्थपर कुल सब्सिडी 160 हजार करोड़ रुपये रहेगी। स्वास्थ्य और शिक्षा पर हम कुल मिलाकर इससे कम खर्च करते हैं। हम कीमतें और ज्यादा बढ़ाने से रुक गए क्योंकि मुझे उम्मीद है कि तेल के दामों में गिरावट आएगी।

अब मैं खुदरा व्यापार यानि Retail Trade में विदेशी निवेश की अनुमति देने के फैसले का जिक्र करना चाहूंगा। कुछ लोगों का मानना है कि इससे छोटे व्यापारियों को नुकसान पहुंचेगा। यह सच नहीं है।

संगठित और आधुनिक खुदरा व्यापार पहले से ही हमारे देश में मौजूद है और बढ़ रहा है। हमारे सभी ख़ास शहरों में बड़े खुदरा व्यापारी मौजूद हैं। हमारी राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में अनेक नए Shopping centres हैं। पर हाल के सालों में यहां छोटी दुकानों की तादाद में भी तीन-गुना बढ़ोतरी हुई है। एक बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था में बड़े एवं छोटे कारोबार, दोनों के बढ़ने के लिए जगह रहती है। यह डर बेबुनियाद है कि छोटे खुदरा कारोबारी मिट जाएंगे।

हमें यह भी याद रखना चाहिए कि संगठित खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश की अनुमति देने से किसानों को लाभ होगा। हमने जो नियम बनाए हैं उनमें यह शर्त है कि जो विदेशी कंपनियां सीधा निवेश करेंगी उन्हें अपने धन का 50 प्रतिशत हिस्सा नए गोदामों, Cold storage और आधुनिक Transport व्यवस्थाओं को बनाने के लिए लगाना होगा। इससे यह फायदा होगा कि हमारे फलों और सब्जियों का 30 प्रतिशत हिस्सा, जो अभी Storage और Transport में कमियों की वजह से खराब हो जाता है, वह उपभोक्ताओं तक पहुंच सकेगा। बर्बादी कम होने के साथ-साथ किसानों को मिलने वाले दाम बढ़ेंगे और उपभोक्ताओं को चीजें कम दामों पर मिलेंगी। संगठित खुदरा व्यापार का विकास होने से अच्छी किस्म के रोज़गार के लाखों नए मौके पैदा होंगे।

हम यह जानते हैं कि कुछ राजनीतिक दल हमारे इस कदम से सहमत नहीं हैं। इसीलिए राज्य सरकारों को यह छूट दी गई है कि वह इस बात का फैसला खुद करें कि उनके राज्य में खुदरा व्यापार के लिए विदेशी निवेश आ सकता है या नहीं। लेकिन किसी भी राज्य को यह हक नहीं है कि वह अन्य राज्यों को अपने किसानों, नौजवानों और उपभोक्ताओं के लिए बेहतर ज़िंदगी ढूंढने से रोके।

1991 में, जब हमने भारत में उत्पादन के क्षेत्र में विदेशी निवेश का रास्ता खोला था, तो बहुत से लोगों को फिक्र हुई थी। आज भारतीय कंपनियां देश और विदेश दोनों में विदेशी कंपनियों से मुकाबला कर रही हैं और अन्य देशों में भी निवेश कर रही हैं। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि विदेशी कंपनियां Information Technology, स्टील एवं ऑटो उद्योग जैसे क्षेत्रों में हमारे नौजवानों के लिए रोज़गार के नए मौके पैदा करा रही हैं। मुझे पूरा यकीन है कि खुदरा कारोबार के क्षेत्र में भी ऐसा ही होगा।

मेरे प्यारे भाइयो और बहनो,
यूपीए सरकार आम आदमी की सरकार है। पिछले 8 वर्षों में हमारी अर्थव्यवस्था 8.2 प्रतिशत प्रति वर्ष की रिकार्ड दर से बढ़ी है। हमने यह सुनिश्चित किया है कि गरीबी ज़्यादा तेजी से घटे, कृषि का विकास तेज़ हो और गांवों में भी लोग उपभोग की वस्तुओं को ज़्यादा हासिल कर सकें।

हमें और ज़्यादा कोशिश करने की ज़रूरत है और हम ऐसा ही करेंगे। आम आदमी को फायदा पहुंचाने के लिए हमें आर्थिक विकास की गति को बढ़ाना है। हमें भारी वित्तीय घाटों से भी बचना होगा ताकि भारत की अर्थव्यवस्था के प्रति विश्वास मज़बूत हो।

मैं आपसे यह वादा करता हूं कि देश को तेज और inclusive विकास के रास्ते पर वापस लाने के लिए मैं हर मुमकिन कोशिश करूंगा। परंतु मुझे आपके विश्वास और समर्थन की ज़रूरत है। आप उन लोगों के बहकावे में न आएं जो आपको डराकर और गलत जानकारी देकर गुमराह करना चाहते हैं। 1991 में इन लोगों ने इसी तरह के हथकंडे अपनाए थे। उस वक्त भी वह कामयाब नहीं हुए थे। और इस बार भी वह नाकाम रहेंगे। मुझे भारत की जनता की सूझ-बूझ में पूरा विश्वास है।

हमें राष्ट्र के हितों के लिए बहुत काम करना है और इसमें हम देर नहीं करेंगे। कई मौकों पर हमें आसान रास्तों को छोड़कर मुश्किल राह अपनाने की ज़रूरत होती है। यह एक ऐसा ही मौका है। कड़े कदम उठाने का वक्त आ गया है। इस वक्त मुझे आपके विश्वास, सहयोग और समर्थन की जरूरत है।

इस महान देश का प्रधान मंत्री होने के नाते मैं आप सभी से कहता हूं कि आप मेरे हाथ मज़बूत करें ताकि हम देश को आगे ले जा सकें और अपने और आने वाली पीढ़ियों के लिए खुशहाल भविष्य का निर्माण कर सकें।
जय हिन्द !

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 Comments

  1. tiwari b l says:

    sardar ji पेसे तो कोयले /२ज़ी / आदर्स सोसायटी ../नेशनल गेम ../ उरेनियम ../ मेग्निज़ मई से उगते अहि कोण बेबकुफ़ कहरह है पेड़ पर उगेंगे मगर आप को ये पता है की नहीं वोट भी पेड़ो पर उगते है वोट भी पेसे से ही मिल ते है आपने तो ख़रीदे थे वोट फॉर कैस ओर्र ज़े ऍम ऍम [ शिवुसोरें ] के वोट भी पेसे से ही आप लोंगो को मिले थे अब ये पेसे किया आप ने पेड़ से तोड़े थे फ़िर जनता को भय दिखा रहे हो की पेसे कान्हा से आयेंगे आप प म के काम को बा खूबी जानते हो ओर्र जो पेसे इटली /जर्मनी/ सव्ज़र्लंद मई भेजे जा चुके वोटो बापस मागवा लो अभी काम आजायेंगे फ़िर आप को पेड़ पर नहीं चदना पड़ेगा

  2. A K Sharma says:

    पैसे पेड़ पर कहाँ लगते हैं … सारा सोने की चिड़िया का धन तो तुमने और तुम्हरे नेताओं ने विदेशी बैंक में जमा कर रखा है …. अगर वोह धन भारत वापस आ जाये तो सरदार जी फिर साइकिल पर सिलिंडर रखकर घर घर देते फिरेंगे …. डीज़ल पेट्रोल फ्री हो जायेगा …. गरीब गरीब नहीं रहेगा … सरदार जी कुछ तो शर्म करो … अब वोट बैंक हाथ से फिसलता दिख रहा है … तो आप को बोलना आ रहा है …. जब घोटाले होते हैं तो आप कोमा में चले जातें हैं …. शर्म करो .. शर्म करो … आम जनता त्रिस्त है …

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