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पीने के पानी के ज़रिये खल्लास हो जाती दिल्ली, चार सौ किलो ज़हर बरामद…

By   /  September 26, 2012  /  No Comments

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गंगनहर के किनारे इंसानी जीवन को सेकंड्स में समाप्त कर देने में सक्षम ज़हरीला केमिकल बरामद हुआ है. यदि यह केमिकल पानी में मिल जाता तो दिल्ली और गाजियाबाद श्मशान बन जाते. जी हाँ, आईबीएन 7 की एक खबर के अनुसार दिल्ली और गाजियाबाद को पीने का पानी देने वाली गंगनहर के पास से नेशनल डिजास्टर रिलीफ फोर्स (एनडीआरएफ) की टीम को 400 किलो केमिकल मिला है. केमिकल इंसानी जिंदगी के लिए बेहद खतरनाक है. अगर ये केमिकल गंगनहर के पानी में मिल जाता तो राजधानी और एनसीआर में हजारों लोगों की जान दांव पर लग जाती. एनडीआरएफ ने इस केमिकल के जहरीले खतरे को नाकाम कर दिया है.

एनडीआरएफ में कमांडेंट जेपी यादव के मुताबिक जिस तरीके से इन्हें रखा गया था वो काफी प्लानिंग के साथ था या तो इंडस्ट्री वाले ने यहां डिस्पोज कर दिया या फिर ये साजिश भी हो सकती है. जो शख्स सबसे पहले इस केमिकल का शिकार बना उसके मुताबिक इस केमिकल को उसने बस छुआ भर था और उसके पूरे शरीर में खुजली होने लगी. डॉक्टर को भी दिखाया. उसकी बीमारी की वजह का पता चलते ही एनडीआरएफ की 8वीं बटालि
यन ने मामला अपने हाथ में ले लिया. एनडीआरएफ टीम ने गाजियाबाद के निवाड़ी इलाके में मौजूद गंगनहर के पास उस नाले को घेर लिया, जिसमें केमिकल से भरे कंटेनर मौजूद थे.
एनडीआरएफ के मुताबिक कंटेनरों में मौजूद केमिकल सफेद पाउडर और लिक्विड दोनों ही शक्ल में था. ये नाले में लगे पाइप के सहारे खुले में पड़ा था. मशीनों के जरिए इसकी जांच की और सैंपल लिए गए. फिर इसका असर खत्म करने के लिए उस पर चावल और दूसरे कैमिकल का छिड़काव किया गया. इसके बाद जेसीबी के जरिए इस सैकड़ों किलो केमिकल को उठाकर वहां से दूर एक नए गड्ढे में दबा दिया गया. अहम बात ये है कि गंगनहर के आसपास कोई कारखाना नहीं है.
एनडीआरएफ की जांच में पता चला कि इनमें से दो केमिकल इतने खतरनाक हैं कि उनके संपर्क में आते ही इंसान की जान जा सकती है. जानलेवा केमिकल के कुल 15 कंटेनर मिले. जिनमें से 2 में केमिकल शहद के रंग वाले लिक्विड की शक्ल में और 13 में पाउडर की शक्ल में है. इन कंटेनरों पर सोडियम बाई कार्बोनेट का लेबल लगा था यानी वाशिंग सोडा बनाने में इस्तेमाल होने वाला पाउडर.
एनडीआरएफ ने जब केमिकल को जांच के लिए धौलपुर में मौजूद डीआरडीओ यानी डिफेंस रिसर्च डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन की लैब में भेजा तो वहां केमिकल की असल पहचान सामने आई. रिपोर्ट में 4 तरीके के केमिकल पाए गए हैं. पॉली एन विनाइल कार्बाजोल-ये फोटोकंडक्टिव है और इसका इस्तेमाल जेरॉक्स मशीनों में होता है. इसमें रेडिएशन का खतरा भी मौजूद होता है.
दूसरा बेंजाइल अल्कोहल-इसका इस्तेमाल स्याही, पेंट बनाने और रेजिन कोटिंग के अलावा साबुन, परफ्यूम और फ्लेवर इंडस्ट्री में ज्यादा होता है. एल्युमीनियम क्लोराइड-इसे एल्युमीनियम धातु बनाने में इस्तेमाल किया जाता है. इसका दूसरा इस्तेमाल डिटर्जेंट बनाने में होता है. फिप्रोनिल-ये कीड़े मारने की दवा है और सीधे नर्वस सिस्टम पर असर डालती है.
इनमें से बेंजाइल अल्कोहल, एल्युमीनियम क्लोराइड और फिप्रोनिल को दूसरे केमिकलों के साथ मिलाकर खतरनाक किस्म के हथियार तक बनाए जाते हैं. जाहिर है कि अगर ये केमिकल गंगनहर के पानी में मिल जाते, तो पीने का पानी जहर बन जाता और न केवल इस पानी का इस्तेमाल करने वालों की जान को खतरा होता, बल्कि इससे खेतों में खड़ी फसल भी जहरीली हो जाती.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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