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“समझदार” हुआ छोटी उम्र का “सिंदूर”!

By   /  September 27, 2012  /  No Comments

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-चन्दन भाटी||
बाड़मेर। सीमावर्ती बाड़मेर जिले में अभिशाप बने बाल विवाह के बन्धनों को आज की बेटियां धता बता कर अपनी जिंदगियो को शिक्षा के सहारे संवार रही हें, छोटी उम्र में विवाह के बन्धनों में बांध कर भी बहुए बनी यह बेटिया नियत समय पर स्कूल जाकर शिक्षा ग्रहण कर रही हें, जिले के सरणू गांव के उच्च माध्यमिक विद्यालय में करीब एक दर्जन छात्राएं मांग में सिंदूर भरे हुए ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षा में पढ़ने आ रही है। देखकर अचरज होता है, लेकिन गांव ने एक अनूठी पहल की है। अशिक्षा एवं पिछड़ेपन की वजह से बाल विवाह दस साल पहले हो गया था, लेकिन आज के जमाने को समझते हुए “बेटी” के “बहू” बनने के बावजूद उसकी पढ़ाई नहीं छुड़वाई है।

सीमावर्ती बाड़मेर जिले में जहां बेटियों को पढ़ाने की अरूचि आज भी कई इलाकों में है और लड़कों के मुकाबले लड़कियां विद्यालयों में दस प्रतिशत भी नजर नहीं आती है। बेटियो की पढ़ाई को लेकर सरकारी गैर सरकारी तमाम प्रयत्नों का नतीजा भी खास नजर नहीं आ रहा है। ऎसे में सरणू गांव में अलग ही माहौल है। यहां 560 नामांकन में से करीब 230 बालिकाएं पढ़ रही है। यहां पर ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षा में एक दर्जन बालिकाएं है जो सिंदूर लगाए हुए विद्यालय पहुंचती है। दरअसल इन बालिकाओं की शादी बचपने में हो गई थी।

अशिक्षा की वजह से आठ दस साल पहले इस बात को परिवार के लोग समझ नहीं पाए। ये बेटियां जैसे ही विद्यालय पहुंची इनकी पढ़ने की लगन बन गई। पहली से लेकर दसवीं तक अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होती रही और अब ललक है कि आगे भी पढ़ें। इसी का नतीजा रहा कि शिक्षकों ने इनको आगे पढ़ने को प्रेरित किया। परिवारवालों और ससुराल वालों दोनों को इन बेटियों ने समझा दिया कि वे पढ़ लिखकर कुछ करना चाहती है। पढ़ी लिखी बेटियों की बात समझ में आने पर परिवारजनों ने उनकी पढ़ाई पर पाबंदी नहीं लगाई है और वे अनरवत पढ़ रही है।

अब नहीं होगा बाल विवाह
परिवार के सारे लोग अब इस बात को समझ गए है कि बेटी को पढ़ाना जरूरी है। अब हमारे परिवारों में बाल विवाह नहीं हो रहा है और नहीं होगा। ससुराल पक्ष के लोग भी हमें पढ़ने को प्रोत्साहित कर रहे हंै। नई सोच विकसित हुई है।
गेहरों, राई, शांति, बाबू, ऊमी

शिक्षा से बदलाव
गांव में अब बेटियों को खूब पढ़ा रहे हैं। बचपन में किसी की शादी हो गई है तो अब उसको शिक्षा से जोड़कर आगे इस कुप्रथा को बंद करने का कदम उठा रहे हंै। शिक्षा से ही बदलाव आएगा।
मांगीलाल शर्मा, समाजसेवी

यह अच्छी पहल है
विवाह होने के बावजूद इन बालिकाओं ने विद्यालय में पढ़ने की रूचि दिखाई। हमने इन्हे नहीं रोका है। अन्य विद्यार्थियों की तरह ये भी विद्यालय आती है और पढ़ती है। किसी प्रकार का फर्क नहीं है। पढ़ाई में अव्वल है।
डूंगराराम, वरिष्ठ शिक्षक

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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