Loading...
You are here:  Home  >  दुनियां  >  रहन सहन  >  Current Article

दोषी कौन सरकार या हम…

By   /  September 27, 2012  /  2 Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

कुलदीप सिंह राघव||
देश के भीतर 12 राज्यों में गुटखा प्रतिबंधित होने के बावजूद स्थिति सुधरने का नाम नहीं ले रही है। फूड सेफ्टी एंड रेगुलेशन एक्ट 2011 के अनुसार देश के सभी राज्यों में गुटखा के सेवन पर प्रतिबंध लगाने का सभी राज्य सरकारों को निर्देश दिए थे। लेकिन फिर भी गुटखे के प्रयोग में कमी आती नहीं दिख रही है। सवाल खडा़ होता है कि इसके लिए मुख्य दोषी कौन है।आगरा से लगभग 80 किलोमीटर आगे राजस्थान की सीमा से सटे जगनेर विकास खंड में लगभग 90 प्रतिशत लोग गुटखे का सेवन करते हैं। पुरुषों की तुलना में गुटखा प्रयोग करने में यहां महिलाएं भी पीछे नहीं हैं। यहां गुटखा खाने वालों में मात्र तीन साल का बच्चा भी शामिल है और 80 साल का बुजुर्ग भी। महिलाएं भी गुटखा खाती है और लड़कियां भी। स्थिति इस कदर बनी हुई है कि भूख लगने पर रोटी नहीं गुटखे की दरकार होती है। छोटे बच्चे के रोने पर औरतें बच्चे के मुंह में दूध के बजाय गुटखे के दाने डा़ल देती हैं। लोग एक दूसरे से पुड़िया (गुटखे को स्थानीय स्तर पर यहां पुड़िया कहते हैं) मांगते नजर आते है और अक्सर गुटखा न देने के ऊपर छिट पुट हिंसा भी हो जाती हैं। बाप बेटे के सामने पुड़िया मुंह में डालता है तो बेटी मां के सामने पुड़िया खाती है। हद तो तब हो जाती है जब मां- बाप, बाप बेटे, मां बेटी सभी रिश्तों की मर्यादा को भूलकर एकदूसरे से पुड़िया साझा करके चाव से खाते हैं। इंडियन डेंटल एसोसिएशन के द्वारा किए गए सर्वे के अनुसार 10 से 40 प्रतिशत स्कूली छात्र और 70 प्रतिशत कालेज छात्र गुटखे का सेवन करते हैं।

आपने लिखा देखा होगा कि धूम्रपान निषेध है फिर प्रतिबंध क्यों नहीं। इस सबके पीछे सवाल यह खड़ा होता है कि इस स्थिति के लिए दोषी कौन है। क्या ये मानें कि साक्षरता का अभाव या जागरूकता की कमी इसके लिए गुनहगार हैं। या फिर माना जाए राज्य सरकारें इसके लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं। फूड एंड सेफ्टी रेगुलेशन एक्ट 2011 के तहत सभी राज्यों को गुटखे पर जल्द से जल्द प्रतिबंध लगाने के निर्देश दिए गए थे। निर्देश के बाद सबसे पहले 30 मई 2011 को बिहार ने गुटखे पर प्रतिबंध लगाया। उसके बाद छत्तीसगढ, दिल्ली, गोवा, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, झारखण्ड, केरल, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र ने गुटखे पर रोक लगाई। अभी हाल ही में राजस्थान, पंजाब और मिजोरम ने गुटखे के सेवन और बिक्री को प्रतिबंधित किया है। हांलांकि इन राज्यों ने गुटखे की बिक्री पर रोक जरूर लगाई लेकिन गुटखे के प्रयोग में कमी अभी देखने को नहीं मिल रही है। भिवाड़ी के ताजा उदाहरण ने राजस्थान को कटघरे में खड़ा किया है। भिवाडी की एक महिला ने गुटखा खाने पर पाबंदी लगाने पर गुटखे की बजाया पति को छोड़ना उचित समझा। इससे यह चीज साफ होती है कि महिलाओं में भी गुटखे की लत किस कदर हावी है।

उत्तर प्रदेश ने अभी तक गुटखे पर रोक नहीं लगाई है। पिछले 12 सितंबर को इंडियन डेंटल एसोसिएशन की जनहित याचिका पर विचार करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि उप्र सरकार गुटखे पर प्रतिबंध को लेकर गंभीर नहीं है। वास्तव में एसा ही है। उप्र सरकार ने गुटखे पर प्रतिबंध लगाने के बजाय गुटखे की बिक्री पर लगने वाले टैक्स में कमी की है। सरकार को इस मामले में गंभीरता दिखानी चाहिए। एक रिपोर्ट के  अनुसार 2011 में देश में गुटखे और तंबाकू से 1,43,141 मौत हुई जिनमें से 22,899  मौत अकेले उत्तरप्रदेश में हुई थीं। गंभीर विषय यह है कि विभिन्न जागरूकता कार्यक्रम चलाने और तरह- तरह से चेतावनी देने के बावजूद भी सुधार क्यों नहीं हो रहा है। लोग गुटखे के प्रभाव को जानते हुए भी अनजान बने हुए हैं। रासायनिक तौर पर गुटखा मैंग्नीशियम कार्बोनेट और फिनायल इथायल एल्कोहल के साथ निकोटीन मिलाकर बनाया जाता है। इसके दुष्प्रभाव से मुंह का कैंसर, किडनी फेल होना, फेंफडें कमजोर होना और दिल कमजोर होन की वजह से हार्ट अटैक होने की प्रबल संभवनाएं होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर साल 75 से 80 हजार मुंह के कैंसर के नए केस सामने आते हैं। इसके बाद भी न तो सरकारें गंभीर हैं और नही स्वयं हम। चलो माना कि जगनेर जैसे स्थानों पर साक्षरता और जागरूकता के अभाव हावी है लेकिन शहरी इलाकों में भी गुटखे का उपयोग या धूम्रपान करने वालों की संख्या कम नहीं है। शहरों में लोग जागरूक होने के बावजूद अपनी आर्थिक सम्पन्नता के प्रदर्शन के लिए सिगरेट का धुंआ पीते हैं।

सवाल बडा़ है कि हम दोषी हैं या सरकार । पर अगर वास्तव में सुधार चाहते हो तो पहले खुद पर लगाम लगाओ। सब कुछ जानते हुए भी अपभिज्ञ मत बनो। अपना भला- बुरा स्वंय सोचो और एक सकारात्मक कदम उठाओ। इसी के साथ सरकार को भी चाहिए कि जनहित में गुटखे को प्रतिबंधित करने पर गंभीरता से विचार करे क्यों कि यहां सवाल सरकार को टैक्स से होने वाले मुनाफे का नहीं है बल्कि यहां सवाल आम आदमी की अनमोल जान का है। इस दिशा में इस भयावह स्वरूप को बदलने के लिए हमारी और सरकार दोनों की तरफ से खास पहल की जरूरत है।

लेखक  कुलदीप सिंह राघव, वर्तमान में अमर उजाला समाचार पत्र से जुडे़ हैं । राजनैतिक, सामाजिक,  खेल और फीचर मामलों के विशेषज्ञ हैं। विभिन्न बहस और वाद- विवाद का हिस्सा बन चुके हैं। बुंदेलखण्ड विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पोस्टग्रेजुएट कर रहे हैं। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित।

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 Comments

  1. Arun Soni says:

    kuldeep jee thanks for this article…..me schools me smoking ke against campaign karta hu….would u like to help & support me…i need more matter on this subject to spread my campaign… waiting eagerly..

  2. Anshu Kumar says:

    हाथी के दांत खाने के कुछ और देखने के खुच होते है ,इसलिए सरकार अपनी जिम्मेबारियो से बचाती है गुटके पर प्रतिबन्ध लगा कर..

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

You might also like...

दिल्ली देश का अकेला प्रदूषित शहर नहीं है, भारत में कई शहर जहां सांस लेना मुश्किल..

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: