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राजू बूट पॉलिश वाला…

By   /  September 28, 2012  /  No Comments

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 – कुमार रजनीश||

उम्र के जिस मोड़ पर वह था, उसे देखकर कोई भी यह अनुमान नहीं लगा सकता था कि उसे जीवन में इतना कटु अनुभव हो चुका है। बेहद खूबसूरत-सा दिखने वाले राजू से जब हमने उसकी जिंदगी के अनुभवों के बारे में जानने कि कोशिश की थी तो मानो उसके घावों को किसी ने गहरा कर दिया हो उसकी आँखें नम हो गयी थीं। उसके शब्द मेरे भीतर गहरे उतरते चले गये थे ।

बात उन दिनों की है जब मैं तीसरी कक्षा में पढ़ता था। मेरे घर के आगे एक विशाल छायादार नीम का वृक्ष था। दोपहर में अगल-बगल के लोग आकर उसकी छाँव में विश्राम करते थे। हमारी गर्मीयों की छुट्टियां हो गयी थीं। मैं अपने कुछ मित्रों एवं चचेरे भाईयों के साथ चबूतरे पर बैठकर नीम कौड़ी (नीम फली) बेचने का खेल खेलता था। मीठी वाली  नीम कौड़ी मंहगा और कच्ची-कड़वी वाली  सस्ते में बेचते खरीदते थे। मिट्टी के छोटे से दीये में नीम कौडियों को सजा, हम बच्चों की दुकानदारी चल रही थी। इस क्रम में वहाँ पहली बार एक लड़के से मुलाकात हुई जो इस तपती गर्मी में राहत पाने के लिए नीम के चबूतरे पर विश्राम करने के लिए आया था। वह हमारे इस खेल को बड़े गौर से देख रहा था और मुस्कुरा रहा था। वह अपने जीवन के 17-18 वर्ष के पड़ाव के आसपास का लग रहा था। अगर आप लोगों ने शाहरुख़ ख़ान को ”दीवाना” फिल्म में देखा होगा तो वह बिल्कुल उसी शुरुआती दौर का शाहरुख़ लगता था। कद काठी से मध्यम दर्जे का दिखने वाला बड़ा ही हंसमुख लड़का था वो। उसकी खिलखिलाती हँसी को देख कर आस-पास का माहौल भी खुशनुमा हो जाता था।

वह भी हम लोगों के साथ घुलमिल गया था और खेलता था। बातों-बातों में पता चला की उसका नाम `राजू` है। उस नकली नीम फली के खेल में राजू ने असली पैसे डाल दिये थे। अब खेल में बड़ा मज़ा आ रहा था क्योंकि कुछ सिक्कों के प्रयोग से हम सचमुच का व्यापार करने लगे थे। जैसे ही एक घंटा बीता, राजू ने कहा कि ”अब मैं चलता हूँ। काम पर जाना है; कल फिर आऊँगा और फिर से यह खेल खेलेंगे।” उसी वक्त माँ ने डाँटकर मुझे अन्दर बुला लिया। अगले दिन फिर दोपहर में, हमारा वह नीम फली का खेल फिर से आरंभ हो गया। कुछ वृद्ध लोग नीम के चबूतरे पर आराम कर रहे थे। गर्मी से छुटकारे के लिए वे अपने गमछे से पंखा बना हवा कर रहे थे। इसी बीच राजू आ गया और  एक लकड़ी के डिब्बे जैसा कुछ नीचे रखते हुए, हमारे पास आकर बैठ गया और मुस्कुराने लगा। उसकी इस मुस्कान में बहुत भोलापन था, कहीं एक बचपना था जो निकल कर बाहर आ रहा था।

आज हमारे खेल में और मज़ा आ रहा था क्योंकि राजू ने ढ़ेर सारे खुदरा पैसे रख दिए थे। इससे हमारे व्यापार के खेल में नई जान आ गई थी। गर्मी बहुत होने के कारण, हमने स्टील के जग में पानी रखा था। राजू ने कहा कि उसे प्यास लगी है। मैंने उसे गिलास में पानी डालकर दिया तो उसने पहले तो मना कर दिया कि उसे प्यास नहीं है परन्तु थोड़ी देर बाद उसने गिलास का पानी अपने चुल्लु (हाथ के द्वारा) में डालकर पी लिया। खेल खत्म होने पर, जैसे ही वो अपना लकड़ी का डिब्बा उठा कर जाने लगा तब मैंने उससे पूछा कि इस डिब्बे में क्या है ? उसने कहा ”काम का सामान है।” और यह बोलकर वह धीरे से वहाँ से चला गया। राजू में एक आदत थी और वो यह कि वह हरदम पान चबाता रहता था। बालों को बड़े रखने की आदत थी और हाथ से ही कंघी कर लेता था। टूटी-फूटी अंग्रेजी के शब्द भी आते थे उसे और अंग्रेजी गाने भी गुनगुना लेता था यदा-कदा।

हमारे पड़ोस में किसी के यहां शादी थी। अत: हम सारे बच्चों की मंडली पूरे दिन उसी की मस्ती में डूबे हुए थे। कोई कुर्सी लगा रहा है तो कोई टेबल सजा रहा है। लाउडस्पीकर से आती तेज गाने की आवाज़ से हम मस्ती में झूम रहे थे। कोई भी बड़ा किसी भी काम को करने के लिए दे तो हम सारे बाल-मंडली में होड़ लग जाती थी कि इसे मैं करूँगा, मैं करूँगा। बड़ा ही उन्मुक्त होता है बचपन – कोई थकान नहीं, कोई शिकायत नहीं। शाम हो गयी थी, पूरा मुहल्ला रंग-बिरंगी लाईटों से जगमगा उठा था। लोगों की भीड़ लगनी शुरू हो गयी थी। सब नयी वेश-भूषा में तैयार इतरा एवं इठला रहे थे। खाना भी टेबल पर सजने लगा था और सारे मेहमान एवं पड़ोसी कुर्सीयों पर बैठ रहे थे। हम सारे बच्चे, लोगों के अनुसार मिट्टी के कुल्हड़ टेबल पर रख रहे थे। कुछ लोग पानी चला रहे थे तो कुछ पत्तल (पत्ते की थाली) में पकवान डाल रहे थे। सभी चेहरे खाने की ओर झुके हुए थे। ”गंगा-जल, गंगा-जल” कह कर राजू भी पानी पिला रहा था। बच्चों को वैसे भी खाने से ज्यादा `सेवा-भावना` में दिलचस्पी रहती है। सबको खिलाना, पिलाना और हाथ धुलाने में लगे हुए थे। इसी बीच किसी वृद्ध की जोर से चिल्लाने की आवाज़ आई। एक पंडित जी अपनी कुर्सी पर बैठे जोर-जोर से किसी को गाली दे रहे थे। `सब भ्रष्ट हो गया… अछूत के हाथ से पानी पी लिया… राम-राम घोर पाप`। इतना कहते-कहते उस वृद्ध पंडित ने मिट्टी का कुल्हड़ राजू के सिर पर दे मारा। राजू अपने सिर को पकड़े, वहीं सिर झुका कर खड़ा था। उसे यह नहीं पता चल पा रहा था कि उसने क्या गलती कर दी एवं कुल्हड़ से उसका सिर क्यों फोड़ दिया गया। फिर भी वह शर्मसार-सा चेहरा बनाए रोता हुआ वहीं खड़ा था। ऐसा प्रतीत होता था मानो वह वहीं पत्थर का बुत बन गया हो। मैंने उसे वहाँ से ले जाकर उसके घाव को धोया, उस पर मरहम पट्टी लगायी। वह बिना कुछ खाए ही वहाँ से चला गया।

मौसम ने थोड़ी अंगड़ाई ले ली थी। बारिश की फुहार शुरू हो चुकी थी। हमारा खेलना भी बंद हो चुका था क्योंकि गर्मी की छुट्टी खत्म हो गई थी। हम अपने स्कूल में ग्रीष्मावकाश के बाद फिर से जाने लगे थे। एक दिन जब मैं स्कूल से लौट कर घर आ रहा था तो देखा कि राजू वहीं नीम के नीचे, चबूतरे पर सो रहा था। मैंने उसके लकड़ी के डिब्बे को चुपके से खोला और देखा तो उसमें तीन ब्रुश, चार-पांच `बिल्ली` ब्रांड के लाल व काले पॉलिश और एक सफेद क्रीम रखा हुआ था। एक छोटी सी दराज में कुछ खुदरा पैसे एवं दो-दो रुपये के तीन नोट लपेटे हुए रखे थे। मैंने धीरे से उसका डिब्बा बंद किया और जैसा था वैसा ही छोड़ दिया। आज राजू अपनी उम्र से बड़ा दिख रहा था। मैंने उसे धीरे से उठाया। राजू के चेहरे पर वो मुस्कुराहट गायब थी। बातों – बातों में उसने बताया कि उसने तीसरी कक्षा से लेकर आठवीं कक्षा तक एक अंग्रेजी माध्यम स्कूल `सेंट जोन्स एकेडमी` में पढ़ाई की है। उसके पिता एक सरकारी दफ्तर में शाखा अधिकारी के पद पर थे। घर में उसके अलावा उसके पिता जी, माँ एवं छोटे चाचा रहते थे। पिता जी की मृत्यु किसी बिमारी की वजह से हो गयी। माँ इस सदमे  से उबर नहीं पार्इं और बीमार रहने लगीं और परिवार गरीबी में आ गया। अब घर में रकम अर्जित करने वाला कोई भी नहीं था। चाचा भी नशेबाज़ था। गरीबी का चाबुक जब उसके उपर पड़ा तो ह्वदय में संजोए तमाम अरमान धरे-के-धरे रह गए। कहते हैं कि पेट की आग अच्छे-अच्छों को भी घुटने टेकने पर मजबूर कर देती है, शायद यही हुआ था राजू के साथ। उसने छोटे-मोटे काम के लिए हर जगह मिन्नतें कीं, ज़ार-ज़ार आँसू बहाए, हाथ जोड़े, लेकिन उसका कोई फायदा नहीं हुआ। ज़िंदगी जीने की ऊहापोह और परिवार की बढ़ती ज़रूरतों के बीच सामंजस्य बिठाना, राजू के लिए कठिन हो रहा था।

” तो… तुम काम क्या करते हो ?” डिब्बे की ओर देखते हुए मेरे मुंह से अनायास ही यह प्रश्न निकल गया।

”मैं लोगों का जूता पॉलिस करता हूँ।” जवाब थोड़ी देर से मिला, लेकिन राजू गर्वित था।

कहते हैं कि अँधेरे में सूरज की एक किरण भी जीवन की नई ज्योति जगा जाती है। शायद यही हुआ राजू के साथ। वैसे तो राजू साक्षर था, लेकिन जिंदगी के महासमुद्र की उठती-गिरती लहरों से संघर्ष करने के उसके दमखम और धैर्य की वजह से ही उसकी और उसके परिवार वालों की नैय्या किनारे लगी। अब वह बड़े गर्व से सबके जूतों को पॉलिश किया करता था और चार पैसे कमा अपनी माँ एवं चाचा का ख्याल रखता है।

उसने अपनी आँखें नम किये सिर्फ यही पूछा कि ये अछूत क्या होता है? मानवता की जाति क्या है? ईश्वर ने तो उसे भी सामान्य बच्चों की तरह समान शक्ल-सूरत दी थी, फिर भी वह उन बच्चों से अलग क्यों है?

राजू समय के इस दौर में पता नहीं तुम कहाँ होगे? पर इतना जरूर जानता हूँ कि तुम्हारी निश्छल मुस्कान अभी भी बरकरार होगी। आज भी तुम ही मेरे ”शाहरुख़ ख़ान” हो।

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  • Published: 6 years ago on September 28, 2012
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  • Last Modified: September 29, 2012 @ 4:53 pm
  • Filed Under: समाज

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