/मीडिया पर छा गई, लेकिन कूटनीति पर कितनी खुशरंग रही हिना..

मीडिया पर छा गई, लेकिन कूटनीति पर कितनी खुशरंग रही हिना..

पाकिस्‍तान की नवनियुक्‍त विदेश मंत्री हिना रब्‍बानी खार ने भारत आकर करोड़ों हिन्‍दुस्‍तानियों का दिल जीत लिया। भारतीयों का दिल जीतने के पीछे सिर्फ उनका खूबसूरत चेहरा ही नहीं बल्कि वो मुद्दे भी हैं, जिन पर उन्‍होंने हमारे विदेश मंत्री एसएम कृष्‍णा से बात की। रब्‍बानी और कृष्‍णा के बीच वार्ता दोनों देशों के बीच समग्र वार्ता और बड़े हल निकालने की दिशा में सकारात्‍मक कदम थी, लेकिन अहम सवाल यह है कि क्‍या यह पहल सफल हो पाएंगी?

 

दिल्‍ली के हैदराबाद हाउस में हुई इस वार्ता के बाद हिना रब्‍बानी ने कहा कि दोनों देश इतिहास के झरोखे में झांक कर देखें। आप खुद देखेंगे कि आपसी झगड़ों से आज तक कुछ हांसिल नहीं हुआ है।

 

उन्होंने कहा कि अब ज्‍यादा दिन तक इतिहास के बोझ को लेकर चलना ठीक नहीं है। लिहाजा बेहतर होगा यदि दोनों देश आपसी संबंध मजबूत करें। रब्‍बानी और कृष्‍णा के बीच नियंत्रण रेखा के आर-पार आवाजाही बढ़ाकर व्यापार में बढ़ोत्‍तरी, पर्यटन और धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने पर सहमति बनी। साथ में कश्मीर वार्ता को सकारात्‍मक ढंग से आगे बढ़ाने पर चर्चा हुई, जिस पर दोनों देश सहमत दिखे।

 

 

 

सबसे अच्‍छी बात यह रही कि दोनों देशों ने इस सकारात्‍मक पहल को आगे बढ़ाने के लिए समय अभी से निश्चित कर लिया है, वो है 2012 की पहली तिमाही, जब रब्‍बानी और कृष्‍णा एक बार फिर मिलेंगे।

 

 

 

पाकिस्‍तान से आई इस मिठाई के ऊपर लगी चांदी की परत तो काफी अच्‍छी दिख रही है, लेकिन क्‍या अंदर से यह वाकई में मीठी है? कहीं पड़ोसी देश की नई विदेश मंत्री भारत के ऊपर चलने वाली मीठी छुरी तो नहीं? इन बातों को हमें हमेशा ध्यान में रखना होगा। क्‍योंकि जिस इतिहास को रब्‍बानी भूलने की बात कर रही हैं, उसी इतिहास में पाकिस्‍तान की काली करतूतें दिखाई देती हैं। वही इतिहास कहता है कि पाकिस्‍तान कभी भरोसा करने लायक नहीं रहा है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.