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आत्म मंथन करे दैनिक जागरण…

By   /  September 29, 2012  /  2 Comments

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-मुकेश भारतीय||
बिहार के मुंगेर से एक बड़े मीडिया हाउस की रीढ़ जला देने वाली खबर आई है. ऐसे सरेआम सड़क पर अब तक किसी राजनीतिक दलों या सामाजिक संगठनों द्वारा अखबार जलाने की सूचनायें मिलती है. शायद देश में एक बार फिर तेजी से उभर रहे बिहार की यह पहली घटना है कि गांव वालों ने अपनी समस्याओं को लेकर किसी बड़े समाचार पत्र ग्रुप के कार्यालय के सामने अखबार की सैकड़ों प्रतियां जलाई हो.
गांव वालों का कहना है कि एक सिगरेट कंपनी के प्रदुषण से वे नाना प्रकार के समस्याओं से जूझ रहे हैं और अखबार इसकी सूचना तक नहीं छापती. जबकि उस अखबार में उल-जलुल खबरों की भरमार रहती है.
इस घटना का विश्लेषण करने के पहले बचपन की वह कहावत यूं ही याद आ जाती है कि ‘बड़ा हुआ तो क्या हुआ-जैसे पेड़ खजुर. पथिक को छाया नहीं-फल लागे अति दूर..’ आज बिहार में कई बड़े मीडिया हाउस अपना कारोबार कर रहे हैं और साम-दंड-भेद की नीति अपना कर करोड़ों का मुनाफा कमा रहे हैं. और इस मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा सरकारी विज्ञापनों का है. जो आम जनता की गाढ़ी कमाई से सरकारी खजाने में जमा होता है. किसी मीडिया हाउस को यह बताने की जरुरत नहीं है कि उसका मूल कार्य सरकार और जनता के बीच एक मजबूत कड़ी बनना है.
लेकिन, यदि हम आज बिहारी मीडिया का आंकलन करें तो उसके प्रायः स्वंयभू कहीं भी खड़े नजर नहीं आते. राजधानी से लेकर गांव गली तक फैले उसके पत्रकार-संवाददाता के झूंड उन तत्वों की झंडागिरी करते नजर आते हैं, जिन्होंनें आज गांवों तक को अपनी शोषण-दमन की चपेट में ले रखे हैं. सच भी है कि आखिर जनता संयम बरते तो कब तक ? इस यक्ष प्रश्न का जबाब तो जनता की गाढ़ी कमाई को लूट कर अपनी तिजोरियों में भरने वाले कॉरपोरेट मीडिया घराने भी अच्छी तरह जानते हैं.
कथार्थ, जब स्थानीय स्तर पर आम जनता की समस्याओं को शासन तंत्र के नुमाइंदे नहीं सुनते. अपनी कान में ठेंठी डाल लेते हैं. तब आज उन्हीं के बीच का एक जागरुक तबका मीडिया के मार्फत अपनी बात सरकार तक पहुंचाने की कोशिश करते हैं. और अगर उसकी यहां भी अवहेलना हो तो मीडिया को लेकर भी एक नया घटना क्रम शुरु होगा ही. जैसा कि मुंगेर की सड़कों पर दैनिक जागरण सरीखे अखबार सरेआम जलाये जाने की घटना है.
सबसे बड़ी बात कि इस घटना में अखबार के प्रति ग्रामीणों का फूटा आक्रोश स्वभाविक है. इसके पीछे किसी संगठन की रणनीति सामने नहीं आई कि दोष कहीं और फेंक कर अखबार अपना दामन बचा ले. अब ऐसे अखबार को खुद चाहिये कि वे खुद इस घटना की जांच-पड़ताल-आत्म मंथन करे .

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 Comments

  1. mahendra gupta says:

    जनता बहुत समझ दार और जागरूक हो गयी है, यदि वक्त की लहर को समझ कर नहीं चलेंगे तो यही होना है,अख़बार के साथ भी, और नेताओं के साथ भी.संभल जाओ चमन वालों अब आ गए हैं दिन बदलाव के.

  2. जनता बहुत समझ दार और जागरूक हो गयी है, यदि वक्त की लहर को समझ कर नहीं चलेंगे तो यही होना है,अख़बार के साथ भी, और नेताओं के साथ भी.संभल जाओ चमन वालों अब आ गए हैं दिन बदलाव के.

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