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सेना में सुरक्षा के लिए खतरा बना पेन ड्राइव..

By   /  October 1, 2012  /  No Comments

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साइबर संकट

  • सैन्य बलों में सुरक्षा चूकों के ७० फीसदी मामलों के लिए पेन ड्राइव जिम्मेदार
  • इस सम्बन्ध में सेना मुख्यालय ने ताजा साइबर सुरक्षा दिशानिर्देश किये जारी

 
पाबंदी के बाबजूद सुरक्षा बलों में पेन ड्राइव मुख्य खतरे के रूप में उभर कर सामने आया है. सेना के तीन अंगों में सुरक्षा चूकों के ७० फीसदी मामलों में यह उपकरण जिम्मेदार रहा है.
एक सैन्य अधिकारी ने बताया कि हाल के दिनों में पेन ड्राइव का इस्तेमाल बढ़ा है. यह सूचना भण्डारण और उन्हें आसानी से कहीं भी ले जाने वाला उपकरण है. आतंरिक रिपोर्टों से पुष्टि हुई है कि सशस्त्र सेनाओं में ७० फीसदी साइबर सुरक्षा चूकें पेन ड्राइव के अनाधिकृत के इस्तेमाल के कारण हुई. उन्होंने कहा कि ये  पेन ड्राइव, जिनमे से अधिकतर चीन में बनी होती हैं. साइबर सुरक्षा प्रणाली के लिए एक बड़ा ख़तरा बनकर उभरी है. इसी को देखते हुए सेना मुख्यालय ने ताजा साइबर सुरक्षा दिशानिर्देश जारी किये हैं. ताकि हैकिंग करने वालों से संवेदनशील सैन्य नेटवर्क की सुरक्षा की जा सके.
सेना के  दो अंगों में भी सुरक्षा बंदोबस्त कड़े कर दिए गये हैं. भारतीय वायुसेना के पदाधिकारियों ने अपने कर्मचारियों को निर्देश जारी कर कहा कि वे अपने कम्प्यूटर और पेन ड्राइव में विभाग से जुडी जानकारी ना रखे. साथ उन्हें अपने पास मौजूद अपने उपकरणों के बारे में बताने को कहा गया. और दिशानिर्देश जारी करते हुए कहा कि साइबर सुरक्षा के नियमों का उल्लंघन करने पर सैन्य जवानों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही की जायेगी. इस  बैठक में विंग कमांडर श्री धाराजीत सिंह और ग्रुप कैप्टन श्री धीरज कृष्ण और अन्य पदाधिकारी मौजूद रहे.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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