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जनता को बेवकूफ बना रहे हैं राजनैतिक दल…

By   /  October 1, 2012  /  No Comments

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-डॉ. आशीष वशिष्ठ||

देश का वर्तमान  राजनैतिक माहौल और दलों का आचरण देश और जनहित में नहीं है. मंहगाई, खुदरा बाजार में विदेशी निवेश और डीजल के दामों में वृद्घि के बाद उपजे राजनीतिक वातावरण में केंद्र सरकार और विभिन्न दलों के नेता जिस प्रकार की बयानबाजी और राजनीति कर रहे हैं उससे यह स्पष्टï हो गया है कि जनता की परेशानियों और दु:ख-दर्दे की चिंता किसी को नहीं है. नेता कोरी बयानबाजी से आम आदमी को बहलाने और झूठे हमदर्द बनने की कोशिश में लगे हैं.

यूपीए सरकार के सबसे बड़े घटक दल कांग्रेस के नेता तो अपनी कारगुजारियों को सही साबित करने में प्रयासरत हैं तो वहीं यूपीए में शामिल शेष घटक दल अपने नफे-नुकसान के अनुसार बचकर और संभलकर बयानबाजी कर रहे हैं. विपक्षी दलों में भी सरकार के  निर्णयों के खिलाफ एकमत या आम राय नहीं है. खुदरा बाजार में एफडीआई पर भाजपा में दो मत सामने आ रहे हैं तो वहीं एनडीए के घटक दल भी अपना अलग सुर अलाप रहे हैं.राजनैतिक दलों की वोट बैंक की और तुष्टिïकरण की नीति और राजनीति के मध्य आम आदमी खुद को ठगा-सा अनुभव कर रहा है. वहीं आमजन को यह भी समझ नहीं आ रहा है कि राजनैतिक दलों के इस सियासी व्यायाम और योग से उसे क्या प्राप्त होगा? असल में राजनैतिक दल जनता के सडक़ पर उतरने और आंदोलन से पूर्व ही स्वयं विरोध का नाटक कर वाहवाही तो लूटना चाहते ही हैं वहीं उन्होंने एक तरह सरकार को आम आदमी के क्रोध का शिकार होने से भी बचा लिया. सरकार भी विरोधी दलों के प्रश्नों का उत्तर देने के बहाने व्यक्तिगत मुद्दे और एक-दूजे पर कीचड़ उछाल कर असल मसले को भटका रही है.  सरकार के निर्णय से सीधे तौर पर प्रभावित होने वाले आम आदमी का पक्ष या मत जानने और समझने की आवश्यकता सरकार और विपक्ष दोनों ने ही नहीं समझी.  सत्तासीन और विपक्षी दल आपस मे ही निर्णय-विरोध का खेल-खेल रहे हैं और जनता बेवकूफों की भांति दोनों का तमाशा देखने का विवश है.
सरकार जनविरोधी निर्णय लेती है तो विपक्षी दल सरकार का विरोध करने और सरकार में शामिल दल तेवर दिखाने लगते हैं. हाल ही में मंहगाई और खुदरा व्यापार में एफडीआई के मुद्दे पर सरकार के निर्णय के विरोध में भाजपा समेत तमाम विपक्षी दलों के विरोध का सरकार की सेहत पर रत्ती भर भी असर नहीं हुआ. मंहगाई, रिटेल में एफडीआई और डीजल की कीमतों में बढ़ोत्तरी के मसले पर एक दिन के रस्मी विरोध के बाद विपक्षी दल पुराने ढर्रे पर चलने लगे और सरकार पूरी बेशर्मी, हठधर्मिता से अपने रूख पर कायम है और अपने किये को सही साबित करने पर आमादा है. असल बात यह है कि राजनीतिक दल अपने नफे-नुकसान के अनुसार व्यवहार करते हैं उन्हें आम आदमी के दु:ख-दर्दे ओर परेशानियों से कोई  लेना-देना नहीं है यह बात कई मौकों पर साबित हो चुकी है, और कड़वी और तल्ख हकीकत यह है कि राजनैतिक दल मिलकर देश की जनता को बेवकूफ बना रहे हैं.
यह बात दीगर है कि यूपीए-1 और   यूपीए-2 के आठ वर्षों के कार्यकाल में कई ऐसे अवसर आए जब विपक्ष सरकार को रोल बैक और जनहित के कार्य करने के लिए विवश कर सकता था लेकिन विपक्ष ने रस्म अदायगी और संसद में हो-हल्ला मचाने से अधिक कुछ विशेष नहीं किया. यूपीए सरकार ने भी हठधर्मिता और बेशर्मी की सारी हदें लांघते हुए जनभावनाओं का अनादर किया. विदेशी शक्तियों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के समक्ष नतमस्तक केंद्र सरकार ने वहीं किया जो उनके विदेशी आकाओं ने उन्हें कहा और समझाया. असल में विपक्ष और सरकार में शामिल दल देशहित की बजाय पार्टी लाइन और वोट बैंक की राजनीति में मशगूल हैं इसलिए सरकार को भी विपक्ष के हो-हल्ले और हंगामे से कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ाता. स्वस्थ लोकतंत्र में विपक्ष सक्रिय और सार्थक भूमिका निभाता है और आलोचना के साथ समालोचना भी उसका धर्म होता है. लेकिन बदली लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और परंपराओं में केवल सरकार का विरोध करना ही विपक्ष अपना धर्म मानने लगा है जिसके सापेक्ष सरकार ने भी विपक्ष को हल्के में लेना आरंभ कर दिया है. इस सारे नाटक-नौटंकी में सबसे अधिक आश्चर्य सरकार में शामिल दलों के चरित्र पर होता है. चुनाव में एक दूसरे का विरोध करने, कीचड़ उछालने और एक-दूसरे पर जमकर बरसने वाले नेता और दल चुनाव बाद लोकतंत्र और जनहित की झूठी दुहाई देकर सरकार के गठन में सक्रिय भूमिका निभाते हंै और बेशर्मी से सरकार में शामिल भी हो जाते हैं. निर्दलीय उम्मीदवार भी सत्ता सुख और लाभ उठाने से चूकते नहीं है. मतदाता दल की विचारधारा, प्रत्याशी और अपनी पसंद-नापसंद के अनुसार अपने मत का प्रयोग करते हैं लेकिन जब वही उम्मीदवार मतदाताओं के विचारधारा से विपरित दल या सरकार में शामिल हो जाता है तो मतदाता स्वयं को ठगा महसूस करता है. राजनैतिक दलों के चरित्र, चाल, आचार-व्यवहार को देखकर आम आदमी यह सोचने लगा है कि राजनैतिक दलों की दृष्टिï में आम आदमी मात्र एक वोट बनकर रह गया है.
आजादी के 65 वर्षों के लंबे इतिहास में दर्जनों घोटाले और घपलों का पर्दाफाश हो चुका है,करोड़ों-अरबों रुपये के घोटालों ने देश की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ी है. भ्रष्टïाचार ने आम आदमी के हिस्से को तो छीना ही है वहीं देश विकास को भी अवरूद्घ किया है. सार्वजनिक जीवन में बढ़ते भ्रष्टïाचार ने आम आदमी को परेशान कर रखा है, दर्जनों घोटालों और भ्रष्टाचार के मामले उजागर तो हुए हैं लेकिन तस्वीर का दूसरा पक्ष यह है कि अब तक एक भी नेता या घोटालेबाज पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई है. राजनीति के हमाम में सभी दल नंगे और गुनाहगार हैं ये बात साबित हो चुकी है. वोट बटोरने, राजनीतिक हित और स्वार्थ साधने के लिए तमाम राजनैतिक दल भ्रष्टाचार , मंहगाई और तमाम दूसरी समस्याओं पर रोना-गाना तो जरूर करते हैं लेकिन भ्रष्टाचार पर कोई ठोस कार्रवाई और नकेल कसने के लिए सख्त कानून और दूरगामी फूलप्रूफ नीति बनाने की पहल नहीं करते हैं. असल बात यह है कि राजनीतिक दलों के झण्डे, चुनाव निशान और नीतियां अलग-अलग भले ही हों लेकिन अंदरूनी तौर पर सबका मकसद देश की जनता को अंधेरे में रखकर खुद को मजबूत करना और सत्ता हासिल करना ही है.
नेताओं, रहनुमाओं और राजनैतिक दलों ने सोची-समझी रणनीति के तहत जनता को धर्म, भाषा, जाति के आधार पर बांट दिया है. वोट बैंक और तुष्टिïकरण की राजनीति ने देश का बंटाधार तो किया ही है वहीं आम आदमी को ठगा भी है. राजनीतिक दल केवल अपना मकसद पूरा करने के लिए हर बार नए तरीके से जनता को ऊल्लू बनाते हैं और मतलब निकल जाने पर अगले चुनाव तक जनता को भूल जाते हैं. कमोबेश हर दल की नीति और नीयत एक समान है. देश और जनहित के मुद्दों पर कोई भी दल गंभीर और संजीदा नहीं है. जनता को भरमाने के लिए तल्ख बयानबाजी, हड़ताल, धरना, प्रदर्शन, काम रोको, संसद में हंगामे का नाटक जरूर किया जाता है, लेकिन इस सारे शोर-शराबे और घमासान में आम आदमी कहीं खो जाता है और नतीजा ढाक के तीन पात रहता है. राजनैतिक दलों की कसरत और शोर-शराबे से अगर आम आदमी का भला हो तो इस नाटक का कोई मतलब निकलता भी है, अन्यथा ये साबित होता है कि राजनैतिक दल मिलकर आम आदमी को बेवकूफ बना रहे हैं. राजनीति दलों की जन विरोधी नीतियों, नाटक-नौटंकी, बनावटी बयानबाजी और मानसिकता को जनता समझने-जानने लगी है, जो कि राजनैतिक दलों और नेताओं के लिए खतरे की घंटी है.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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