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भारत की एक अनोखी करेंसी

By   /  October 4, 2012  /  3 Comments

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क्या आपको पता है हमारे देश एक बहुत ही अनोखे किस्म की कर्रेंसी प्रचलन में है? आज मैं आप लोगो को भारत  की एक अजीब कर्रेंसी के बारे में बताना चाहूँगा । यूँ तो देश में में चलने वाले कर्रेंसी आप सभी अवगत है । हम सभी जानते है की भारत में चलने वाले कर्रेंसी रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया या भारतीय सरकार  द्वारा संचालित की जाती है । लेकिन क्या आप जानते है कि हमारे देश में एक ऐसी भी कर्रेंसी प्रचलन है जिसे न ही भारत सरकार ने संचालित करती है, ना ही भारतीय रिजर्व बैंक । अब आप सोच रहे होंगे की हमारे यहाँ ऐसी कौन सी कर्रेंसी  है, जिसे न भारत सरकार संचालित करती है, ना भारतीय रिजर्व बैंक और न ही इसके बारे में आपको पता है ?

ऐसा नहीं है कि आप इस कर्रेंसी के बारे में नहीं जानते या आपने नहीं देखा है। हाँ ये अलग बात है कि लोग ध्यान नहीं देते । मैं जिस करेंसी की बात कर रहा हूँ, उसे “वन वे” कर्रेंसी भी कह सकते है । जी हाँ सही समझ रहे है, “वन वे” का मतलब होता है एक तरफ़ा ।  अब  आप फिर सोच में पड़ गए होंगे कि ये कौन सी कर्रेंसी है ?  जिसे न भारत सरकार संचालित करती है, ना भारतीय रिजर्व बैंक और एक तरफ़ा से क्या मतलब है ?? आईये मैं बता देता हूँ कि ऐसी कौन सी कर्रेंसी है जिसकी बात मैं कर रहा हूँ। दोस्तों आप जब भी किसी दुकान या मॉल में खरीदारी के लिए जाते है और अगर आपकी रकम 97-98 रुपये या  7-8 की होती है यानि दुकानदार से आपको 2-3 रुपये लेने होते है तो अकसर दुकानदार या मॉल कर्मचारी उन खुदरे पैसों के बजाये टॉफी थमा देते है या कई बार 5-6 रुपये के बदले कोई बिस्कुट का पैकेट थमा देते है ।

जबकि इन चीजों की हमे जरूरत नहीं होती । न ही ऐसा है कि आपसे पैसों के बदले कोई दुकानदार ऐसी चीज ले ले । अगर आप इन चीजों को लेने से मना करते है तो दुकानदार का जवाब होता है, हमारे पास खुदरा नहीं आप ही खुल्ले पैसे दें। अरे भाई तुम दुकानदार हो, तुम्हारा काम ही पैसों का लेन देन करना है, जब तुम्हारे पास खुल्ले पैसें नहीं होंगे तो हमारे पास कहाँ से होगा। यही कह कर हम मज़बूरी में टॉफी और बिस्कुट ले लेते है    इस तरह की घटना लगभग हर रोज हमारे साथ घटती है लेकिन हम ध्यान नहीं देते । ज्यादातर ऐसी घटना बड़े – बड़े मॉल से होती है । छोटे दुकानदारों से तो हम बहस भी कर लेते है, लेकिन बड़े और सुन्दर दिखने वाले मॉल में हम बहस नहीं करते इसकी वजह होता है हमारा स्टेट्स वहां हम 2-4 रुपये के लिए बहस नहीं करते और नाहि  करना चाहते कि लोग क्या कहेंगे ?

अब आप कहेंगे की खुदरा पैसा न होना तो आम बात है मैं इस पर इतना बबाल क्यों कर रहा हूँ ? आपका ये सोचना भी कुछ हद सही है। लेकिन मैं आपको इसके दुसरे पहलू से भी अवगत करना चाहूँगा । दोस्तों 5 रुपये में बिकने वाली बिस्कुट के पैकेट की कीमत थोक बाजार में 4 रुपये से 4.25 रुपये होता है जो कि हमे 5 रुपये के बदले दिया जाता है । यानि हमे 75 पैसे से लेकर 1 रूपये तक का नुकसान ।   इसी तरह जो टॉफी हमे 1 रूपये के बदले में दिया जाता है, उसकी वास्तविक कीमत 40-50 पैसे होती है । यानि हमे 3 रूपये के बदले 3 टॉफी दी गयी तो हमे जबरदस्ती 1.50 रुपये का नुकसान सहना पड़ता है। यानि कि हम जरुरत की जो चीजे खरीदते है उस पर तो दुकानदार मुनाफा कमाता ही है बल्कि जो चीजे हमे जबरदस्ती दी जा रही है उस पर भी वो मुनाफा कमाते है । हम इसे बहुत छोटी बात मान कर ध्यान नहीं देते, लेकिन जरा सोचिये अगर कोई दुकानदार दिन भर में 1000 लोगो को भी 1 रूपये के बदले 50 पैसे की टॉफी देता है तो उसे 500 रुपए का अतिरिक्त लाभ होता है । अगर इन चीजों पर ध्यान दिया जाये तो आपको पता चल जायेगा कि खुदरा पैसा न होना मज़बूरी नहीं बल्कि व्यवसाय का नया और नायाब तरीका है । यही है इंडिया की अनोखी कर्रेंसी ।

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About the author

This is Vikas K Sinha, I am basically from Village + Post Bajitpur kasturi, Anchal - Sahdei Buzurg, District - Vaishali, Bihar. but living in Delhi. I am Working in a private company as a office asst. and also doing some social work with my some friends

3 Comments

  1. महेंद्र जी दुकानदारों की लूट सरकार की लापरवाही से नहीं बल्कि हम जनता के जागरूक न होने और देख कर अनदेखी करने के कारन होता है…. हम ७ रुपये के शब्जी चुप चाप ले लेते है | इस में सरकार क्या कर सकती है | ऐसा तो है नहीं कि सरकार सिक्के नहीं बनाती है | सरकार हर साल सिक्के बना रही है मगर फिर भी बाजार में सिक्को कि कमी ही रहती है |

  2. mahendra gupta says:

    सरकार की लापरवाही और इन दुकानदारों की लूट का आगे जनता मजबूर है.सिक्कों की जमाखोरी पर कोई नियन्त्र न होने के कारण यह हालात बने हैं.भारत की जनता की भी सहन करने की शक्ति की परीक्षा सरकार इस बहाने ले लेती है.इस में लूट का एक पेंच यहभी है की कई बार दुकानदार इस चक्कर में जबरन पैसे पूरे करने के लिए सामान ज्यादा दे देता है , जैसे ७ रुपये की जगह १० रुपये की सब्जी दे दी .

  3. सरकार की लापरवाही और इन दुकानदारों की लूट का आगे जनता मजबूर है.सिक्कों की जमाखोरी पर कोई नियन्त्र न होने के कारण यह हालात बने हैं.भारत की जनता की भी सहन करने की शक्ति की परीक्षा सरकार इस बहाने ले लेती है.इस में लूट का एक पेंच यहभी है की कई बार दुकानदार इस चक्कर में जबरन पैसे पूरे करने के लिए सामान ज्यादा दे देता है , जैसे ७ रुपये की जगह १० रुपये की सब्जी दे दी.

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