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“कविता कोष जयंती समारोह 2011” में पूनम तुषामड़ होंगी सम्मानित

By   /  July 30, 2011  /  No Comments

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यह तस्वीर देखकर आपको किसकी याद रही है? दिमाग पर जोर डाले बिना सोचिए। यह हिदी की कवियत्री पूनम तुषामड़ हैं। इन्हें कविता कोष की तरफ से “कविता कोष जयंती समारोह 2011” में 7 अगस्त 2011 को जयपुर में कविता के लिए सम्मानित किया जाएगा।

इनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है:- पूनम तुषामड़ का जन्म दिल्ली में हुआ। राजकीय विद्यालय से स्कूली शिक्षा हांसिल की। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक एवं जामिया मिल्लिया इस्लामिया से हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर की उपाधि हांसिल की। हाल ही में जामिलया मिल्लिया इस्लामिया में पी.एचडी की उपाधि हेतु “हिंदी दलित साहित्य में जनतांत्रिक मूल्यों का अध्ययन” शोध प्रबंध प्रस्तुत किया है। पूनम साहित्य रचनाक्रम में निरंतर सलंग्न हैं।

हिंदी की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाएं लगातार प्रकाशित होती रही हैं। रचनात्मक लेखन के अतिरिक्त विभिन्न सामाजिक, राजनैतिक मुद्दों पर उनका सक्रिय हस्ताक्षेप उनके गहरे सामाजिक सरोकारों का परिचायक है। दलित कविता की नई पीढ़ी के जिन कवियों ने समकालीन साहित्य को प्रभावित किया है उनमें पूनम तुषामड़ का नाम उल्लेखनीय है।

उनकी कविताओं में नए संदर्भों के साथ दलित चेतना का विकसित रूप अपनी विशिष्टता के साथ अभिव्यक्त हुआ है जिसमें, स्त्री चेतना और दलित अस्मिता का गहरा भाव-बोध अपनी तीव्रता के साथ मौजूद है। दलित आंदोलन की इस विकास यात्रा में पूनम तुषामड़ ने बहुत कम समय में अपनी इसी विशिष्टता के साथ पहचान निर्मित की है। इनकी कविताएं भविष्य के प्रति आश्वस्त करती है।

उनके काव्य संग्रह “मां मुझे मत दो” से उन्हें विशेष ख्याति मिली। करनाल स्थित “पाश पुस्तकालय” एवं हिंदी अकादमी, दिल्ली से उनकी कहानी पुरस्कृत है। कवि से “एक मुलाकात” कार्यक्रम में साहित्य अकादमी द्वारा आमंत्रण. लेखन के अतिरिक्त गायन में रूचि। उनका एक कविता संग्रह और कहानी संग्रह शीघ्र प्रकाश्य।

कविता कोष जयंती समारोह 2011 तिथि: 7 अगस्त 2011 (रविवार)

समय: सुबह 11:00 बजे से 2:00 तक

स्थान: कृष्णायन सभागार, जवाहर कला केन्द्र, जयपुर

प्रवेश: निशुल्क

(पोस्ट कैलाश चंद चौहान के फेसबुक वाल से साभार)

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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