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खुद फर्जीवाडा करने वाला दैनिक जागरण कैसी पत्रकारिता करता होगा?

By   /  October 6, 2012  /  2 Comments

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पंजीकरण बगैर लाखों का सरकारी विज्ञापन जारी. उत्तराखण्ड सूचना एवं लोक संपर्क विभाग के नियमानुसार केवल पंजीकृत समाचार पत्र-पत्रिकाओं को ही विभागीय विज्ञापन दिए जाने का प्रावधान है, लेकिन इस नियम के विपरीत विभाग ने लाखों रुपये के विज्ञापन दैनिक जागरण हल्द्वानी को जारी कर दिए….

 

-अयोध्या प्रसाद ‘भारती’||

बड़े लोगों के सामने शासन और प्रशासन हमेशा से झुकता आया है. उनके लिए सरकारें और प्रशासन नियमों, कायदे-कानूनों की धज्जियां उड़ाते हुए लाभ पहुंचाने का प्रयत्न करती रही हैं. उत्तराखण्ड का शासन और प्रशासन भी इसी ढर्रे पर काम कर रहा है. यह नियमों को धता बता कर पिछले करीब 9 सालों से दैनिक जागरण, के अपंजीकृत हल्द्वानी संस्करण पर मेहरबान है, शासन और प्रशासन नियमों की अनदेखी कर इसे लाखों के विज्ञापन दे चुका है और दे रहा है. सरकार का सूचना एवं लोक संपर्क विभाग सूचना आवेदक को पंजीकृत होने की झूठी सूचना दे रहा है.

इस साल जुलाई के अंतिम सप्ताह तक दैनिक जागरण हल्द्वानी में इंप्रिंट लाइन में देहरादून से प्रकाशित होने और हल्द्वानी में मुद्रित होने की जानकारी छप रही थी. बिहार में कई जगहों से अपंजीकृत संस्करणों की खबर मीडिया में आने के बाद हल्द्वानी के अपंजीकृत संस्करण को पंजीकृत कराने की सुधि दैनिक जागरण प्रबंधन को आई होगी, इसलिए 27 जुलाई 2012 से इंप्रिंट लाइन बदलकर छापी जाने लगी और पहले से छप रही देहरादून संस्करण की पंजीयन संख्या की जगह ‘पंजीयन संख्या A/F’ छापी जाने लगी.

उत्तराखण्ड सूचना एवं लोक संपर्क विभाग के नियमानुसार केवल पंजीकृत समाचार पत्र-पत्रिकाओं को ही विभागीय विज्ञापन दिए जाने का प्रावधान है, लेकिन इस नियम के विपरीत विभाग ने लाखों रुपये के विज्ञापन दैनिक जागरण हल्द्वानी को निर्गत किए. इसके अलावा कुमाऊं मंडल के छह जिलों के विभिन्न सरकारी विभागों के लाखों रुपये के विज्ञापन इस संस्करण में छापे गये.

हल्द्वानी संस्करण की वर्षगांठ पर भी हर साल विभिन्न सरकारी विभागों से लाखों रुपये के विज्ञापन दैनिक जागरण हल्द्वानी संस्करण प्रबंधन लेता है. इस संबंध में जब सूचना एवं लोक संपर्क विभाग से सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत यह पूछा गया कि ‘दैनिक जागरण हल्द्वानी संस्करण पंजीकृत नहीं है, ऐसे में उसके खिलाफ क्या कार्यवाही की जाएगी?’ तो दिनांक 03 सितंबर 2012 के पत्र संख्या 404 /सू0एवंलो0सं0वि0(प्रशा0)/2012 (सू.अ.) द्वारा विभाग के लोक सूचना अधिकारी/संयुक्त निदेशक राजेश कुमार ने आवेदक को बताया कि उक्त संस्करण पंजीकृत है और पंजीयन संख्या 08916 बताई, जो कि वास्तव में देहरादून संस्करण की पंजीयन संख्या है.

जबकि स्वयं अखबार अपने आपको 27 जुलाई 2012 से वर्ष 1 अंक के साथ अपंजीकृत प्रदर्शित कर रहा है और भारत के समाचार पत्रों के पंजीयक का कार्यालय, नई दिल्ली के लोक सूचना अधिकारी/सहायक प्रेस पंजीयक श्री शिवदास सरकार ने मिसिल संख्या 612 /412 /2012-13 /आर.एन.आई/एन.पी.सी.एस. दिनांक 04.09.2012 के द्वारा दैनिक जागरण के हल्द्वानी संस्करण को अपंजीकृत बताया गया है.

यह मामला आंख मूंदकर दैनिक जागरण हल्द्वानी को आर्थिक मदद करने का है, जिसमें नियमों की अनदेखी कर सरकारी खजाने को लाखों रुपये का चूना लगाया गया है. उत्तराखण्ड सूचना एवं लोक संपर्क विभाग के अफसरों की अंधेरगर्दी का यह तो मात्र एक नमूना है. इस तरह के तमाम अन्य मामले भी हैं.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 Comments

  1. फर्जी जागरण

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