/ज़रा याद करो कुर्बानी…

ज़रा याद करो कुर्बानी…

-सिकंदर शैख़||

शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले,वतन पर मरनेवालों का यही बाक़ी निशाँ होगा…..देश की सीमाओं की हिफाज़त करने वाले जवानों की शहादत में लिखी गयी ये पंक्तियाँ आज के इस काल खंड में बेमानी सी लगती है ..कहने को हम हर बार सेना दिवस , विजय दिवस, और  आज़ादी का जश्न मनाते  हैं मगर हम उन शहीदों को भूलते जा रहे हैं जिनकी वजह से हमें ये आज़ादी मिली है…एक तरफ जहाँ पूरा देश सेना की बहादुरी की एक दिवसीय गाथा में डूबा रहता है वहीँ शहीदों के स्मारक और उनके विजयी स्तम्भ भारतियों की बाट जोहते नज़र आ रहे हैं और साथ ही साथ अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहे हैं. जैसलमेर में सन 1971 की भारत-पाक युद्ध की याद दिलाता  विजय स्तम्भ भी उनमे से ही एक है ….अपनी टूटी फूटी व्यथा गाता ये विजय स्तम्भ हम देश वाशियों के लिए शर्म की बात है और उन शहीदों की कुर्बानी को बेजा बता रहा है जो उन्होंने हमारी  आज़ादी की लड़ाई के लिए दी थी…

 

ए मेरे वतन के लोगों , ज़रा आँख में भर लो पानी, जो शहीद हुए हैं उनकी, ज़रा याद करो कुर्बानी….कहते हैं जब स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने ये गीत गाया था तब तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु की आँखों में आंसू आ गए थे….वो आंसू उन शहीदों  की याद में आये थे जिन्होंने इस देश की रक्षा के लिए हँसते हँसते अपने प्राणों की आहुति दे दी थी,  मगर आज जब भी हम अपने देश कोई विजय दिवस, आज़ादी का दिवस या वायु सेना का जश्न मना रहे हैं तब कोई भी भारतीय उन शहीदों की याद में आंसू नहीं बहा रहा है वरण उन शहीदों की याद में भारत सरकार द्वारा बनाये विजय स्तम्भ अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहे हैं. और उनकी तरफ देखने वाला उनकी सार संभाल करने वाला भी कोई नहीं है. कहने को तो हम आजाद हिन्दुतान में सांस ले रहे हैं मगर उन साँसों पर भी उन्ही शहीदों का हक है जिन्होंने हमारी आज़ादी के लिए अपनी जान तक दे दी. मगर हम आज़ादी के 65 साल बाद इतने निष्ठुर हो गए हैं की उनको याद करना तो दूर उनके स्मारकों पर फूल चढ़ाना भी भूल गए हैं.

जैसलमेर में सन 1971 के भारत- पाक युद्ध की गाथा गाता ये विजय स्तम्भ. याद दिलाता है कि किस तरह भारत के 120 जवानों ने पाकिस्तान के 3000 सैनिकों के दांत खट्टे कर दिए थे. किस तरह उन 120 जवानों ने पाकिस्तान के सैनिकों की भारत पर कब्ज़े की मंशा को नेस्तनाबूद कर दिया था. उस विजय की याद में यहाँ स्थापित ये विजय सतम्भ आज टूट फूट चूका है. कोई नहीं है जो इस तरफ भी देख ले. इस पर लिखे उन वीरों के नाम भी वक़्त की बेरहम मार से हट चुके हैं.  मगर ना तो प्रशासन और न ही भारत माता की जय बोलने वाले किसी लीडर की नज़र इस पर पड़ती है की इक बार इस तरफ भी देख ले…ये वही विजय स्तम्भ है जो हमें पाकिस्तान पर हमारी विजय को दर्शाता है. जैसलमेर की जनता से जब बात की गयी तो सभी ने एक स्वर में इसकी भरपूर निंदा की तथा कहा कि हमें इन पर नाज़ होना चाहिए कि हमें आज़ादी इनकी वजह से ही मिली है मगर हम धीरे धीरे इतने स्वार्थी हो गए की जिन्होंने हमें आज़ादी दिलाई हम उनको ही भूलते जा रहे हैं.

दूसरी तरफ जैसलमेर के म्यूजियम में एक तरफ रखे इस लड़ाकू विमान ने दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिए थे, ये विमान रात को उड़ान नहीं भर सकता था, एक तरफ जहां पाकिस्तान के 3000 सैनिकों को भारत के मात्र 120 सैनिक सीमा पर रोक कर इसी विमान का इंतज़ार कर रहे थे सीमा पर सैनिकों को पता था की ये विमान रात को उड़ नहीं सकते हैं अगर हमने उनको रात भर के लिए रोक लिया तो सुबह ये विमान आ जायेंगे और दुश्मनों के टैंकों को नेस्तनाबूद कर देंगे और यही हुआ. 120 भारतीय सैनिकों ने बहादुरी के साथ दुश्मनों को सीमा पर सुबह तक रोके रखा और सुबह होते ही इस विमान ने सीमा पर जाकर दुश्मनों के टैंकों को एक एक कर जमींदोज़ कर दिया साथ ही पाक की इतनी बड़ी सेना को भागने पर मजबूर कर दिया थ. उस 1971 की लड़ाई का ये हीरो आज एक कोने में खड़ा यही सोच रहा है कि मैं आज यहाँ क्यों खड़ा हूँ, लोगों की उदासीनता का जीता जागता उदहारण ये लड़ाकू विमान बात जोह रहा है उन देश भक्तों की जो उसके पास आये उसे छुए उसके साथ फोटो खिंचाये. हर आज़ादी के जश्न में, हर सेना के दिवस में उसे भी शामिल किया जाय. मगर आज कोई भी नहीं है जो इसकी तरफ एक आँख भी उठा कर देखे और इसका शुक्रिया भी अदा करे….

देश की सीमाओं की हिफाज़त करने वाले जवानों की शहादत को आम नागरिकों के साथ पूरा सम्मान मिलना चाहिए  … क्योंकि आम लोगों के सुख चैन की खातिर अपनी जिंदगी न्योछावर करने वाले शहीद भी किसी के बेटे, किसी के पति, किसी के भाई तो किसी के बाप रहे होंगे…कम से कम हम देश पर शहीद हुए जवानों के परिवार वालों को न भूले यही किसी भी जीत के जश्न को मनाने का वाजिब और सही अंदाज़ होगा……………

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.